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19 मार्च:आजाद हिन्द फौज ने पहली बार 19 मार्च को लहराया था राष्ट्रीय ध्वज 

देश की आजादी के इतिहास पर चर्चा करने वक्त यदि ‘आजाद हिन्द फौज’ के योगदान का उल्लेख न किया जाए तो वह चर्चा निरर्थक है। मार्च का महीना आजाद हिन्द फौज के गठन और निर्णायक फैसलों की दृष्टि से अहम  है। 19 मार्च को ‘आजाद हिन्द फौज’के बयानों ने देश में पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। इसके दो दिन बाद ही 21 मार्च को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ‘दिल्ली चलो’ का ऐतिहासिक नारा दिया था। ख़ास बात यह है कि आजाद हिन्द फौज की स्थापना भारत में नहीं बल्कि जापान में हुई थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान में बंदी भारतीय सैनिकों को छुड़ाकर इसका हिस्सा बनाया गया। क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने आजाद हिन्द फौज की स्थापना टोक्यो (जापान) में 1942 में की थी। उन्होंने 28 से 30 मार्च तक फौज के गठन पर विचार के लिए एक सम्मेलन बुलाया और इसकी स्थापना हुई,जिसका उद्देश्य देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना था।

18 मार्च 1944 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज ने बर्मा की सीमा पार की। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेज थलसेना की 14 वीं टुकड़ी ने वर्ष 1943 में बर्मा को जापानी सेना से दोबारा जीत लिया। इस जीत के साथ सेना के साथ गए युद्ध संवाददाताओं के भेजे गए लड़ाई के समाचारों के कारण भारत में अधिकांश जनता ‘आजाद हिंद फौज’ के कारनामों से परिचित हुई। इस वजह से पहली बार अंग्रेजों के ‘आजाद हिंद फौज’ की गतिविधियों पर लगाया हुए सेंसरशिप का पर्दाफाश हुआ। ‘आजाद हिंद फौज’ के निर्माण में जापान ने काफी सहयोग दिया। देश के बाहर रह रहें लोग इस सेना में शामिल हो गये। बाद में सुभाषचंद्र बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’ की कमान संभाल ली। उन्होंने 1943 में टोक्यो रेडियो से घोषणा की, ‘अंग्रेजों से यह आशा करना बिल्कुल व्यर्थ है कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड़ देंगे।

हमें भारत के भीतर व बाहर से स्वतंत्रता के लिए स्वयं संघर्ष करना होगा। उन्होंने आजाद हिन्द फौज से जर्मनी की जेलों में बंद भारतीय सैनिकों को भी शामिल किया नेताजी और हिटलर की मुलाकात के चलते ही ये संभव हो पाया था।  ‘बोस ने फौज की बिग्रेड को नाम दिये- ‘महात्मा गांधी ब्रिगेड’, ‘अबुल कलाम आजाद ब्रिगेड’, ‘जवाहरलाल नेहरू ब्रिगेड’ और ‘सुभाषचन्द्र बोस ब्रिगेड’। 5 जून 1945 को जब अंग्रेज़ सरकार ने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की विफलता के बाद कांग्रेस के नेताओं को देश भर की जेलों से छोड़ा तो राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा परिवर्तन आ चुका था।

दूसरी तरफ, कांग्रेस के नेता, सुभाष चन्द्र बोस के सक्षम नेतृत्व में ‘आजाद हिंद फौज’ के गठन और फौज के साहसिक कारनामों से अनजान थे। शायद यही कारण था कि जेल से अपनी रिहाई के बाद जवाहरलाल नेहरू ने एक सवाल के जवाब में कहा कि अगर नेताजी ने भारतीयों का नेतृत्व करते हुए भारत से लड़ने की कोशिश की तो वे नेताजी के साथ-साथ जापानी सेना के विरूद्ध संघर्ष करेंगे। बोस ने अपने सैनिकों से मार्मिक शब्दों में कहा, ‘हमारी मातृभूमि स्वतन्त्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा। यह स्वतन्त्रता की देवी की मांग है।’ बोस के इन शब्दों ने हर एक भारतीयों को झकझोर दिया। बच्चे-बूढ़े-जवान सभी उनके साथ जुड़ने लगे।

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