आस अभी बाकी है

उत्तराखण्ड की धामी सरकार द्वारा जमरानी व सौंग बांध परियोजाओं की समय सीमा तक किए जाने के बाद एक बार फिर यह आशा बंधी है कि आने वाले समय में हल्द्वानी व देहरादून के आस-पास के क्षेत्रों की जनता को पेयजल की सुचारू आपूर्ति हो पाएगी, साथ ही विद्युत उत्पादन में बढ़ोतरी व किसानों को सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता भी सुनिश्चित हो सकेगी। अभी सरकार ने इन बांध परियोजनाओं के लिए जो समय सीमा तय की है उसके अनुसार जमरानी बांध परियोजना को मार्च 2029 तक पूर्ण करने का लक्ष्य रखा है तो वहीं सौंग परियोजना का कार्य मार्च 2030 तक पूर्ण हो जाना है। इन दोनों परियोजना कार्यों में तेजी लाने के लिए धामी सरकार ने संबधित विभागों के अधिकारियों को निर्देश भी जारी किए गए हैं। मुख्यमंत्री धामी की तत्परता को देखते हुए जनता यह आशा कर रही है कि देर-सवेर यह परियोजनाएं धरातल पर उतर पाएंगी

विस्थापन व पुनर्वास के मुद्दे पर चर्चा करते ग्रामीण

उत्तराखण्ड के लिहाज से जमरानी, सौंग, लखवाड़ परियोजनाएं पेयजल, विद्युत व सिंचाई के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही हैं। सरकार व जनता की उम्मीद भी इन्हीं परियोजनाओं पर टिकी हुई है। फिलहाल इन परियोजनाओं को गति देने के लिए जमरानी बांध परियोजना हेतु 710 व सौंग परियोजना के लिए 300 करोड़ रुपए के बजट का प्राविधान किया गया है। लेकिन जिस कछुवा चाल से ये परियोजनाएं आगे बढ़ रही हैं, वह समय पर इनके पूरा होने पर संदेह भी पैदा करती हैं।

डूबते गांव को निहारती महिला

गर्मी पड़ते ही हल्द्वानीवासी कहने लगते हैं कि जमरानी तुम बहुत याद आते हो। पिछले 50 सालों से हल्द्वानी की जनता को इस परियोजना के बनने का इंतजार है। हर बार ऐसा लगता है कि आने वाले कुछ समय में यह शहरवासियों की प्यास बुझाने में सहायक बनेगी। लेकिन यह परियोजना एक इंच आगे खिसक कर वर्षों तक पीछे की तरफ सरक जाती है। वर्ष 1975 से अब वर्ष 2025 तक की यात्रा सम्पन्न हो गई लेकिन जमरानी बांध अभी भी आश्वासनों पर ही टिका है। विगत वर्ष केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में इसे वित्तीय स्वीकृति मिली तो लगा कि अब जल्द ही यह बांध बन जाएगा। बांध की आस में साल गुजर गया लेकिन कागजी कार्यवाही अभी भी बनी हुई है, जबकि वन भूमि अधिग्रहण, बैराज, कार्यालय, कालोनी और नहरों आदि के निर्माण में अब तक 126 करोड़ रुया खर्च हो चुके हैं। कारण जो भी रहा हो लेकिन उत्तराखण्ड की अभी तक की सरकारें इस बांध को नहीं बना पाई। जबकि हर चुनाव में यह एक बड़ा मुद्दा होता है। यह बांध 1975 में प्रस्तावित हुआ था, यानी 50 वर्षों बाद भी यह परियोजना धरातल पर नहीं उतर पाई। पहले कहा जा रहा था कि इस परियोजना से 2600 परिवारों को विस्थापित किया जाना है। 821 खाताधरकों की जमीन इस बांध से प्रभावित हो रही है। विस्थापितों के पुनर्वास हेतु 600 करोड़ रुपयों की जरूरत होगी। अब कहा जा रहा है कि इस परियोजना में 6 गांवों के 1267 परिवार प्रभावित हो रहे हैं। विस्थापन के लिए 500 करोड़ रुपए की जरूरत होगी। 3638 करोड़ की इस परियोजना पर अब तक 678 करोड़ रूपए खर्च किए जा चुके हैं। इस परियोजना की अब तक की कार्य रिपोर्ट यह है कि बांध के लिए पर्यावरणीय मंजूरी मिल चुकी है। प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंट यूनिट का गठन हो चुका है। विभिन्न सर्वे कार्यों के लिए विशेषज्ञों की नियुक्ति हो चुकी है। एमआईएस रिपोर्ट शासन के पास पहुंच चुकी है। जमीनों की नापजोख हुई है। इसके लिए एशियन विकास बैंक ने पहले फंडिंग भी की थी। पुनर्वास नीति का ड्राफ्ट भी सरकार के पास है। इस परियोजना का एक बड़ा परिसर हल्द्वानी के दमवाढंुगा में बना है। कई इंजीनियर और कर्मचारी यहां सेवाएं देने के बाद रिटायर भी हो चुके हैं। आशा थी कि यह परियोजना तराई-भाबर में व्याप्त पानी के संकट दूर करेगी। अगर यह परियोजना अपने तय समय पर जमीन में उतरती है तो इससे हल्द्वानी नगर के साथ ही आस-पास के क्षेत्रों को 117 एमएलडी(मिलियन लीटर डेली) पानी उपलब्ध हो पाएगा। इसके अलावा 57 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई हेतु पानी उपलब्ध होगा।

जमरानी बांध बनने की पहले समय सीमा 2028 थी, अब एक साल आगे खिसका कर इसे मार्च 2029 कर दिया गया है। रामगंगा नदी की सहायक नदी गोला के जमरानी गांव में बनने वाले इस बांध में 2584 करोड़ रुपए खर्च होने हैं। इससे 57065 हेक्टेयर भूमि में सिचाई के साथ हल्द्वानी नगर को पेयजल की आपूर्ति भी होनी है। जमरानी बांध विस्थापितों की भी अपनी मांगें हैं। जिनमें उचित मुआवजा, पुर्नवास, विस्थापित परिवारों को 1 एकड़ खेती योग्य भूमि व 200 वर्ग मीटर आवासीय भूमि आदि शामिल है। इसके अलावा वह चाहते हैं कि उन्हें भूमिधरी का अधिकार प्राप्त हो ताकि वह अपनी आजीविका को चला सकें। इसके अलावा विस्थापितों का यह भी आरोप है कुछ लोगों ने विस्थापितों की सूची में अपना नाम गलत तरीके से दर्ज करा रखा है, उन्हें इससे अलग किया जाए।

उम्मीदों की सौंग

यह परियोजना भी स्वीकृति के बाद से लम्बे समय तक लम्बित रही। जनपद देहरादून के सौंग नदी पर बनने वाली यह परियोजना पेयजल व सिंचाई के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जाती रही है। अगर यह अमल में आती तो उम्मीद यह थी कि राजधानी देहरादून की 11 लाख की जनसंख्या के साथ ही आस-पास के लोगों की प्यास बुझाने मंे यह सफल होगी। इससे देहरादून की जनता को हर रोज 150 मिलियन लीटर प्रतिदिन पानी उपलब्ध होना था। इस बहुउद्देश्यीय परियोजना को जल आपूर्ति, सिंचाई, जल विद्युत उत्पादन व भूजल स्तर को बढ़ाने में मददगार माना जा रहा है। परियोजना के तहत 148 मीटर बांध बनना है, जिससे 6 मेगावाट बिजली का भी उत्पादन होना है। कभी बजट तो कभी पर्यावरणीय स्वीकृति के चलते यह परियोजना अधर में लटकती रही। वर्ष 2022 में धामी कैबिनेट ने इसे मंजूरी दी। पहले इस परियोजना को वर्ष 2029 में पूर्ण होना था लेकिन अब इसे एक वर्ष आगे खिसकाकर 2030 कर दिया है। सौंग नदी पर पांच किमी. दायरे में झील बननी है। इस झील में सौंधना, धड़साल व प्लेड गांव के 30 परिवार विस्थापित होने हैं। इस परियोजना से कुल 275 परिवार प्रभावित हो रहे हैं, जिनका विस्थापन होना है। वर्ष 2022 में इस परियोजना की पुनर्वास एवं पुनविस्थापन की नीति को मंजूरी मिली। इस नीति के अनुसार इसमें दो जिले टिहरी व देहरादून प्रभावित हो रहे हैं। इसमें देहरादून का एक गांव व टिहरी के 4 गांव यानी कुल 5 गांव प्रभावित हो रहे हैं। शुरुआती दौर से ही प्रभावितों की सहमति, उनके लिए भूमि उपलब्ध कराना, विस्थापन व पुर्नवास एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है। उत्तराखण्ड प्रोजेक्ट डेवलपमेंट एंड कंस्ट्रक्शन काॅरपोरेशन लि. द्वारा इसका निर्माण किया जा रहा है। इस परियोजना का अनुमानित बजट 2500 करोड़ रुपए है।

परियोजनाओं को गति देने के लिए समीक्षा बैठक की गई है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि विस्थापित होने वाले परिवारों को सभी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। प्रभावित परिवारों की सहमति से सामुदायिक भवन, मंदिर, सड़क निर्माण की आवश्यकता हो तो उन सुविधाओं को भी जुटाया जाए।

पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

सौंग परियोजना के भले ही कई फायदे हों लेकिन इसकी पर्यावरणीय क्षति भी कम नहीं है। इस परियोजना में बनने वाले वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के लिए एक हजार पेड़ों की बलि चढ़नी है। माल देवता के पास 4 हेक्टेयर वनभूमि पर वन विभाग पेड़ों की गिनती कर चुका है। पहले यह पेड़ खलंगा क्षेत्र में कटने थे लेकिन भारी विरोध के चलते वन विभाग ने यह भूमि देने से मना कर कर दिया था। लोग विरोधस्वरूप पेड़ों से चिपके। कटने वाले पेड़ों में धागे बांधे। इस परियोजना में विस्थापित होने वाले कहां बसेंगे, इसकी स्पष्ट तस्वीर अभी साफ नहीं है। सूचनाओं के मुताबिक सरकार विस्थापितों को रानीपोखरी में बसाने की तैयारी में है। इसके लिए 11 हेक्टेयर वन भूमि भी चिन्हित की गई है। यह भूमि उद्योग व रेशम विभाग की है। कहा जा रहा है कि इस भूमि पर बसने में विस्थापित होने वाले लोगों ने अपनी सहमति प्रदान की है। विस्थापित परिवारों को मुआवजे के तौर पर आधा एकड़ भूमि व 200 वर्ग फीट आवासीय भूमि या फिर दो करोड़ की राशि का विकल्प रखा गया है। इन सबके बीच भी विस्थापित होने वाले ग्रामीण अपने भविष्य को लेकर आशंकित भी हैं। कई ग्रामीण जिला प्रशासन व बांध बनाने वाली कार्यदायी संस्था पर झूठे आश्वासन देने का आरोप भी लगाते रहे हैं। विस्थापित परिवार पुर्नवास के साथ ही जल, जंगल, जमीन की समुचित व्यवस्था चाहते है।

लखवाड़ की कछुवा चाल

इस परियोजना को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का ड्रीम प्रोजेक्ट माना जा रहा है। लखवाड़ बांध देहरादून जिले के यमुना नदी पर बनना है। इसे पेयजल, सिंचाई व विद्युत उत्पादन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह यमुना बेसिन के छह राज्यों उत्तराखण्ड, उत्तर-प्रदेश, दिल्ली, हिमांचल, हरियाणा व राजस्थान को कवर करता है। इस परियोजना के तहत 204 मीटर ऊंचा बांध, 33,780 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई होनी है। 6 राज्यों को 78.83 मिलियन क्यूबिक लीटर पेयजल की आपूर्ति होनी है। इस राष्ट्रीय परियोजना में 90 प्रतिशत धनराशि केंद्र सरकार को खर्च करनी है। इस परियोजना में बांध व भूमिगत बिजलीघर उत्तराखण्ड के लोहारी गांव में बनना है। वर्ष 1976 में इसे मंजूरी मिली थी लेकिन तब से लेकर अब तक यह परियोजना भी धरातल में नहीं उतर पाई। वर्ष 1987 में जेपी समूह ने इसका निर्माण शुरू किया। वर्ष 1992 तक इस परियोजना का 35 प्रतिशत कार्य भी पूरा गया था लेकिन बजट व अन्य कारणों से इस परियोजना को बीच में ही रोक दिया गया। जेपी समूह भी इससे अलग हो गया। जबकि उत्तराखण्ड के लोहारी गांव के 1 किमी. उपर लखवाड़ गांव में बांध का काम भी शुरू हो गया था। लोहारी गांव जल समाधि भी ले चुका था। इसके बाद वर्ष 2012 में फिर से बांध पुर्नवास व सुधारीकरण योजना के तहत इसके काम की शुरूआत हुई, लेकिन फिर से यह मामला लटक गया। वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित कैबिनट की बैठक में इसे फिर से मंजूरी मिली। इस परियोजना के तहत विस्थापित होने वाले लोग उचित मुआवजा, पुर्नवास के लिए भूमि, रोजगार आदि को लेकर आशंकित रहे हैं। कुलमिलाकर परियोजनाओं की लेटलतीफी के चलते जहां इनकी लागत में बढ़ोतरी हो रही है तो एक भारी-भरकम धनराशि इन परियोजनाओं पर व्यर्थ में बरबाद हो रही है। वहीं दूसरी तरफ लोगों की उम्मीदों पर भी पानी फिर रहा है।