सोच में बदलाव की जरूरत-2
हिंदू समाज की सोच भले ही वर्तमान में धर्म की गलत अवधारणा के मुखर होने चलते संकुचित नजर आती हो, हिंदुत्व बेहद व्यापक सोच और सभी को साथ लेकर चलने वाला दर्शन रहा है। समलैंगिक संबंधों की बाबत भी कुछ ऐसा ही हमारे पुराने ग्रंथों, पौराणिक कथा-कहानियों में देखने को मिलता है। महर्षि वात्स्यायन रचित ‘कामसूत्र’ इस बात की पुष्टि करता है कि पौराणिककाल में समलैंगिक संबंधों को स्वीकारा जाता था। हमारे कई धर्मशास्त्रों में भी ऐसे संबंधों की बाबत उदाहरण दिए गए हैं। हालांकि कई पौराणिक पुस्तकों में इसे अप्राकृतिक मानते हुए पाप की श्रेणी में भी रखा गया है। कौटिल्य रचित ‘अर्थशास्त्र’ और ‘मनुस्मृति’ ऐसे संबंधों को पूरी तरह अस्वीकार्य मानते हैं। इसके बावजूद हमारे समाज में भले ही ढके-छिपे बतौर ही सही, ऐसे संबंधों की उपस्थिति लगातार बनी रही है। सेक्स पर यूं भी हम खुले तौर पर बातचीत करने वाला समाज कभी नहीं रहे हैं। हमारे लिए सेक्स की बात करना, सेक्स पर बात करना पाप की परधि में रखा जाता रहा है। यही कारण है सेक्स संबंधित कमजोरी अथवा बीमारी को ‘गुप्त रोग’ कह पुकारा जाता रहा है। समलैंगिक प्रकृति के लोगों को तिरस्कार की नजरों से देखना इसी सोच का प्रतिफल रहा है। मेरा बचपन एक शांत और प्राकृतिक सुंदरता से लबरेज कस्बेनुमा शहर रानीखेत में बीता। आज जब मैं समलैंगिकता पर लिखने बैठा हूं तब मुझे अतीत के कुछ किस्से याद हो आए हैं। हमारे छोटे से शहर में एक बड़े राजनेता की बाबत दबी जुबान से ऐसा कहा-सुना जाता था जिससे उनकी छवि मेरे मन-मस्तिष्क में खासी निगेटिव हो गई थी। शहर के एक गणमान्य परिवार का नवयुवक इन राजनेता को खासा प्रिय था। हम तब सुनते थे कि दोनों के मध्य ‘गलत संबंध’ हैं। यह ‘गलत संबंध’ क्या और किस प्रकार के हैं, इसकी न तो हमें समझ थी और न ही समझाने वाला कोई था, क्योंकि सेक्स पर बातचीत करना भी पाप था। मेरे एक रिश्तेदार भी अपने एक मित्र के प्रति शायद ऐसी ही कुछ भावना रखते थे। हमारे परिवार में उन दोनों को लेकर खासी खुसुर-फुसुर हुआ करती, जो तब हमें समझ नहीं आती थी, इतना अवश्य समझ आता कि इन दोनों के मध्य कुछ न कुछ गलत जरूर है। उन्हें हमारे यहां ‘दो बैलों की जोड़ी’ कह बहुत हेय दृष्टि से देखा जाता था। जब मैं ग्यारहवीं कक्षा में था तब का एक वाकया भी इस समलैंगिकता से जुड़ा मुझे याद आ रहा है। मेरे एक करीबी मित्र के एक रिश्तेदार ने नई-नई कार खरीदी थी। छोटे से कस्बेनुमा शहर में कार होना एक बड़ी उपलब्धि उन दिनों मानी जाती थी। पूरे इलाके में शायद आठ-दस ही ऐसे परिवार रहे होंगे जिनके पास अपनी कार थी। मुझे उन दिनों कार सीखने का भूत सवार था। मित्र के रिश्तेदार सहर्ष मुझे कार सिखाने के लिए राजी हो गए। एक दिन जब मैं उनसे कार चलाने का प्रशिक्षण ले रहा था तब चलती गाड़ी में उन्होंने मेरे साथ कुछ ऐसा करने का प्रयास किया जिसे आज तो मैं यौन दुराचरण कह पुकारा सकता हूं, तब लेकिन इतनी समझ नहीं थी, पता लेकिन था कि जो कुछ ये महाशय कर रहे हैं, वह गलत है। मैं दोबारा कभी उनके साथ कार सीखने नहीं गया। जब तक रानीखेत में रहा उनके प्रति घृणा भाव लिए रहा। बहुत बाद में जब मैं लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज, लखनऊ से ग्रेजुएशन कर रहा था, मैंने यह बात अपने मित्र संग साझा कर अपना मन हल्का किया था। तब मुझे पता चला था कि उसके उक्त रिश्तेदार कइयों को अपना ‘शिकार’ बनाने का प्रयास कर चुके हैं। बहरहाल यह अलग मुद्दा है चूंकि तब मैं भी अन्यों की तरह समलैंगिकता को ‘पाप’ मानता था इसलिए मेरे मन में उक्त व्यक्ति के प्रति घृणा का भाव पैदा हो गया था। बाल्यवस्था के इस अनुभव का एक परिणाम हर समलैंगिक के प्रति मेरे भीतर तिरस्कार का, घृणा का, लिजलिजेपन का भाव पैदा होना रहा। मैं भी इसे लंबे अर्से तक अप्राकृतिक कृत्य मानता आया था। शायद आज भी कहीं गहरे, भीतरी तल पर मैं समलैंगिकता को प्रकृति के नियमों के विपरीत आचरण मानता हूं। अब जबकि मैं स्वयं विचारों के तल पर बदलाव की बात कर रहा हूं और विवेक काटजू को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखे उनके आलेख पर सलाम भेज रहा हूं, तब मुझे महसूस होता है कि बचपन में समाज द्वारा रोपित धारणाएं जिन्हें ‘संस्कार’ कह पुकारा जाता है, ने मुझे समलैंगिकता को समझने और उसे सहजता से स्वीकारने से रोक दिया था। मैं इसे मानसिक बीमारी, मानसिक विकलांगता कहता था। पहली बार इस बाबत सोच को, समझ को व्यापक बनाने का काम मेरी बेटी ने किया। वह भी तब जब वह मात्र 13-14 बरस की थी। वह बचपन से ही विद्रोही प्रवृत्ति की रही है। उसी ने मुझे प्रेरित किया कि मैं अपने नाम के आगे से जाति को हटा लूं। उसने जिद पकड़ ली थी कि वह अपना नाम बदलवाना चाहती है। हमने उसका नाम एक देवी के नाम पर ‘कात्यायनी’ रखा था। उसने एक रोज यह ऐलान करा कि वह अपना नाम बदलना चाहती है और नए नाम के आगे ‘जोशी’ उपनाम नहीं लगाना चाहती क्योंकि वह जाति व्यवस्था में विश्वास नहीं करती। हमें उसकी बात माननी पड़ी। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद उसका नाम उसकी पसंद अनुसार बदला गया जिसमें उपनाम नहीं है। बाद में उससे प्रेरणा लेकर मैंने भी अपने नाम के आगे से जाति सूचक उपनाम हटाने का फैसला लिया था। एलजीबीटी (#LGBT) समुदाय की बाबत, समलैंगिक की बाबत भी उसके तर्कों ने मुझे मेरी समझ में बदलाव के लिए दिशा दी। ऐसा ही नौकरशाह विवेक काटजू के साथ भी हुआ। पर चलिए देर आए-दुरुस्त आए।
