चुनावी गणित और #भारत जोड़ो यात्रा
राहुल गांधी की #भारत जोड़ो यात्रा अपेक्षा से कहीं अधिक सफल होती नजर आ रही है। वह भी तब जब इस यात्रा को मुख्यधारा की मीडिया पूरी ताकत के साथ अनदेखा कर रही है। प्रश्न लेकिन, यक्ष प्रश्न लेकिन यह है कि क्या इस यात्रा का राजनीतिक लाभ कांग्रेस उठा पाएगी? यह प्रश्न इसलिए क्योंकि कांग्रेस संगठन बेहद बदहाल और दयनीय स्थिति में है। मल्लिकार्जुन खड़गे भले ही पूरी चुनाव प्रक्रिया से गुजर कर कांग्रेस के नए अध्यक्ष बने हैं किंतु इस सच से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि गांधी परिवार की पसंद और सहमति चलते ही इस पद तक पहुंचे हैं। अन्यथा न तो वे राष्ट्रीय स्तर पर जनाधार वाले नेता हैं, न ही करिश्माई छवि वाले। ऐसे में वे किस प्रकार जीर्ण-शीर्ण कांग्रेस संगठन में जान फूंक पाएंगे कहना और समझ पाना बेहद मुश्किल काम है। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के जरिए निश्चित ही सबसे बड़ा लाभ राहुल गांधी को हाल-फिलहाल तक मिलता स्पष्ट दिख रहा है। जिस ईमानदारी और सहजता के साथ वे इस यात्रा में आम भारतीय संग संवाद स्थापित कर रहे हैं, उससे उनकी छवि ‘पप्पू’ से ‘परिपक्व’ नेता की उभरने लगी है। छवि का लाभ लेकिन राजनीतिक रूप से तभी कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है जब जमीनी स्तर पर संगठन को खड़ा किया जाए। भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशंसक यह दावा कितना ही क्यों न करे कि भाजपा को सत्ता के शीर्ष में पहुंचाने का काम प्रधानमंत्री मोदी की करिश्माई छवि का नतीजा है, करिश्मे को कारगर बनाने के पीछे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का मजबूत और विशाल संगठन असल कारक है। संघ सरीखा कैडर आधारित संगठन यदि 2014 में नरेंद्र मोदी के पीछे न खड़ा हुआ होता तो सफलता के जिस शीर्ष पर भाजपा और लोकप्रियता के जिस शीर्ष पर प्रधानमंत्री मोदी आज विराजमान हैं, वह शायद संभव नहीं हो पाता। कांग्रेस के समक्ष सबसे बड़ी समस्या संगठन की आंतरिक कमजोरी है। आज जिस अधोगति में कांग्रेस नजर आती है, यदि उसे दूर करने के ईमानदार और गंभीर प्रयास तत्काल नहीं शुरू किए जाते हैं तो भले ही ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में कितना ही जनसैलाब क्यों न उमड़े, राजनीतिक रूप से इसका कोई लाभ कांग्रेस को मिलने वाला नहीं। मैं निजी तौर पर राहुल गांधी की साफगोई का प्रशंसक हूं। मेरा मानना है कि वे एक नेकदिल और ईमानदार व्यक्ति हैं। लेकिन मैं अभी भी उनमें परिपक्वता का अभाव पाता हूं। 30 अक्टूबर की शाम गुजरात के मोरबी जिले में हुए पुल हादसे में 132 लोगों की मौत हो गई थी। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ उस समय तेलंगाना पहुंच चुकी थी। आरोप-प्रत्यारोप का दौर राजनीतिक दलों के मध्य इस पुल हादसे के तुरंत बाद शुरू हो गया। जब राहुल गांधी से पत्रकारों ने इस बाबत पूछा तो उन्होंने बहुत संजीदा जवाब देते हुए कहा कि ‘दुख की इस घड़ी में, मैं कोई राजनीति नहीं करना चाहता हूं, क्योंकि जो लोग मरे हैं वे भी हमारा परिवार हैं।’ यह बेहद परिपक्व और संजीदा बयान था। लेकिन जब यात्रा महाराष्ट्र पहुंची तो राहुल ने सावरकर पर टिप्पणी कर अपने सहयोगी दल शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के समक्ष राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया। मुझे लगता है कि राहुल को इस व्यर्थ के मुद्दे से बचने का प्रयास करना चाहिए था। सावरकर की देशभक्ति को कटघरे में खड़ा कर राहुल एक तरह से भाजपा के बिछाए जाल में खुद तो फंसे ही, उन्होंने शिवसेना को भी संकट में डाल दिया। इसमें कोई शक नहीं कि उन्होंने सावरकर की बाबत, विशेषकर 1910 में कालापानी की सजा के बाद सावरकर द्वारा लगातार अंग्रेज हुकूमत को भेजे गए माफीनामों की बाबत जो कुछ कहा वह ऐतिहासिक सत्य है। लेकिन ऐसे समय में जब उग्र राष्ट्रवाद का परचम चौतरफा लहरा रहा है, राहुल को चाहिए था कि वे इस प्रकार के मुद्दों से बचें ताकि उनकी यात्रा का असल उद्देश्य भटकाव का शिकार न हो जाए। राहुल अपनी ईमानदारी के चलते पहले भी कुछ ऐसे निर्णय ले चुके हैं जिससे यह ग्रांड ओल्ड पार्टी कमजोर हुई है। उदाहरण के लिए सितंबर 2021 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को बेहद अपमानजनक तरीके से हटाया जाना है। निश्चित ही अमरिंदर सिंह की सरकार बेहद अलोकप्रिय हो चुकी थी और नाना प्रकार के भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर चुकी थी। लेकिन उन्हें हटाए जाने का तरीका जो टीम राहुल ने अपनाया, किसी भी दृष्टि से सही नहीं था। अमरिंदर सिंह को कमजोर करने की नीयत से कांग्रेस आलाकमान ने जिस नवजोत सिंह सिद्दू को मोहरा बनाया, वह ऐसे भष्मासुर निकले जिन्होंने पंजाब मे कांग्रेस को सड़क पर ला खड़ा किया। राहुल और उनके सलाहकार अपनी भूल को जब समझे तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सिद्दू को दरकिनार करने की नीयत से चरणजीत सिंह चन्नी को आगे किया गया लेकिन नतीजा शून्य रहा। कैप्टन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ जैसे पुराने नेताओं ने पार्टी छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया और सत्ता आम आदमी पार्टी के हाथों में आ गई। राजस्थान में तो टीम राहुल ने एक के बाद एक ऐसे निर्णय लिए कि गांधी परिवार के सबसे विश्वस्त अशोक गहलोत तक बागी होने की कगार पर जा पहुंचे। उत्तराखण्ड में भी गत् वर्ष चुनाव से ठीक पहले जिस प्रकार से वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को हाशिए में डालने का काम इस टीम ने किया उसका नतीजा प्रदेश में भाजपा की दोबारा सत्ता वापसी होना रहा। हरीश रावत की हर सलाह को दिल्ली दरबार ने अनसुना तो किया ही, उनकी राह में इतने रोड़े लगाए कि हाथ आती सत्ता फिसल गई।
