गैंती-फावड़ों के शोर से जागा प्रशासन

गैंती-फावड़ों के शोर से जागा प्रशासन

चमोली के सकण्ड गांव में एक दशक से सड़क का इंतजार कर रहे ग्रामीणों ने गैंती-फावड़े उठाकर खुद सड़क काटनी शुरू की तो प्रशासन गांव पहुंचा और तीन महीने में सड़क निर्माण शुरू कराने का लिखित आश्वासन दिया

पहाड़ में पलायन रोकने के सरकारी दावों के बीच चमोली के सकण्ड गांव की कहानी व्यवस्था की जमीनी हकीकत सामने रखती है। गांव को सड़क से जोड़ने की मांग करीब एक दशक से लम्बित है। सड़क के अभाव में दो दर्जन से अधिक परिवार गांव छोड़ चुके हैं जबकि गांव में रह रहे लोगों के लिए आज भी आवागमन और रोजमर्रा की जरूरतें बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।

कर्णप्रयाग विकासखंड के दूरस्थ सकण्ड गांव को बौंला-सिंद्रवाणी से जोड़ने वाली करीब 9.5 किलोमीटर सड़क के लिए ग्रामीण लम्बे समय से शासन-प्रशासन के चक्कर काट रहे थे। मांग और आश्वासनों के बावजूद जब सड़क निर्माण की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई तो ग्रामीणों ने खुद ही रास्ता बनाने का फैसला किया। 11 सितम्बर से ग्रामीण गैंती- फावड़े लेकर सड़क कटिंग में जुट गए। सरकारी व्यवस्था के इंतजार से थक चुके ग्रामीणों का यह कदम अपने आप में व्यवस्था के सामने बड़ा सवाल बन गया। ग्रामीणों के इस अभियान को स्थानीय स्तर पर भी समर्थन मिला। कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष मुकेश नेगी और यूकेडी के केंद्रीय नेता आशीष नेगी गांव पहुंचकर श्रमदान किया। सामाजिक कार्यकर्ता विक्रम सिंह बिष्ट कहते हैं कि लम्बे समय तक मांग की अनदेखी होने के बाद ग्रामीणों को स्वयं गैंती-फावड़े उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

ग्रामीणों के सड़क कटिंग शुरू करने के पांचवें दिन प्रशासन हरकत में आया। एसडीएम कर्णप्रयाग, डीएफओ और लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों ने गांव पहुंचकर ग्रामीणों के साथ बैठक की। बैठक में अधिकारियों ने सड़क निर्माण को लेकर तीन महीने का लिखित आश्वासन दिया है। इसके बाद ग्रामीणों ने फिलहाल स्वयं सड़क काटने का काम रोक दिया है। ग्राम प्रधान शिवानी चौधरी के अनुसार अधिकारियों ने तीन महीने के भीतर सड़क निर्माण की दिशा में कार्य शुरू करने का भरोसा दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित अवधि में काम शुरू नहीं हुआ तो ग्रामीण दोबारा अपने स्तर पर सड़क कटिंग शुरू करेंगे।

अब सकण्ड गांव के ग्रामीणों की नजर प्रशासन के इस लिखित आश्वासन पर है। सड़क निर्माण के लिए विभागीय और वन सम्बंधी प्रक्रियाएं पूरी करना जरूरी है लेकिन ग्रामीण यह देखना चाहते हैं कि इन प्रक्रियाओं के बाद फाइलें वास्तव में जमीन तक पहुंचती हैं या नहीं।

सकण्ड गांव की सड़क अब केवल 9.5 किलोमीटर सड़क का सवाल नहीं है। यह उस भरोसे की परीक्षा भी है जो ग्रामीणों ने वर्षों के इंतजार और अपने श्रम के बाद प्रशासन के लिखित आश्वासन पर किया है। सड़क के अभाव में गांव से पलायन कर चुके परिवार इस समस्या की गम्भीरता बताते हैं। अब तीन महीने की समयसीमा तय हो चुकी है। इस दौरान यदि सड़क निर्माण की ठोस शुरुआत होती है तो ग्रामीणों का संघर्ष परिणाम में बदलता दिखाई देगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो गैंती-फावड़े फिर उठेंगे और सकण्ड गांव का सवाल एक बार फिर व्यवस्था के सामने खड़ा होगा।

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