कमजोर पड़ती मायावती बिखरता बीएसपी का भविष्य

कभी उत्तराधिकारी घोषित किए गए आकाश आनंद को मायावती ने पहले लोकसभा चुनाव के बीच हटाया, फिर वापस बुलाया, दोबारा बड़ी जिम्मेदारी दी और अब गत सप्ताह उन्हें अपरिपक्व कह इशारा कर दिया है कि अब वह बहिन जी के बाद पार्टी के नम्बर टू नेता नहीं हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान आकाश के खिलाफ कार्रवाई के पीछे उस समय आकाश को हटाए जाने का संदेश ऐसा दलित मतदाताओं के बीच गया था कि मायावती भाजपा के दबाव में आ गई हैं। पार्टी के कुछ नेताओं ने यह तक माना कि आकाश की आक्रामक भाजपा विरोधी राजनीति ने बीएसपी को उसके पुराने ‘भाजपा की बी-टीम’ वाले आरोप से बाहर निकालने की कोशिश की थी और उनके अचानक हटने से पार्टी के कोर वोटर में गलत संदेश गया। मायावती के बदलते फैसलों ने न केवल बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश में जीरो कर दिया है बल्कि स्वयं मायावती का प्रभाव मंडल भी दलित समाज

के बीच पहले जैसा नहीं रहा है

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक समय ऐसा था जब मायावती का नाम सत्ता और बहुजन समाज पार्टी का नाम उनके राजनीतिक प्रभाव का पर्याय माना जाता था। 2007 में उन्होंने उत्तर प्रदेश में अपने दम पर बहुमत की सरकार बनाई थी और पार्टी को करीब 30 प्रतिशत वोट मिले थे लेकिन इसके बाद कहानी लगातार बदलती गई। 2012 में सत्ता हाथ से गई, 2017 में विधानसभा में पार्टी की ताकत और घट गई, 2022 में बीएसपी सिर्फ एक सीट पर सिमट गई और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी उत्तर प्रदेश में एक भी सीट नहीं जीत सकी। अब अगस्त 2026 में बीएसपी के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी का कोई विधायक भी नहीं है। जिस पार्टी ने कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सरकार बनाने और सरकार गिराने की क्षमता दिखाई थी, वह आज अपने अस्तित्व और राजनीतिक आधार को बचाने की लड़ाई लड़ रही है। इसी दौर में मायावती ने अपनी राजनीति की अगली पीढ़ी तैयार करने के लिए अपने भतीजे आकाश आनंद को आगे किया था लेकिन पिछले तीन वर्षों में आकाश आनंद के साथ उनके फैसलों में जिस तरह का उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, उसने अब मायावती के नेतृत्व और बीएसपी के भविष्य दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आकाश आनंद को राजनीति में आगे बढ़ाने की प्रक्रिया अचानक शुरू नहीं हुई थी। वह मायावती के भाई आनंद कुमार के बेटे हैं और विदेश से पढ़ाई पूरी करने के बाद धीरे-धीरे बीएसपी की गतिविधियों में सक्रिय हुए। 2019 में उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया और दिसम्बर 2023 में मायावती ने उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। उस समय संदेश बिल्कुल साफ था कि मायावती अपने बाद पार्टी की कमान आकाश आनंद को सौंपने की तैयारी कर रही हैं। आकाश युवा थे, अपेक्षाकृत आधुनिक राजनीतिक भाषा में बात करते थे और बीएसपी के उस पारम्परिक वोट बैंक से आगे नई पीढ़ी को जोड़ने की कोशिश करते दिखाई दे रहे थे, जो पिछले कुछ चुनावों में पार्टी से दूर हुआ था। खासकर दलित युवाओं के बीच चंद्रशेखर आजाद जैसे नए चेहरे के उभार ने मायावती के सामने यह चुनौती खड़ी कर दी थी कि अगर बीएसपी को भविष्य में प्रासंगिक बनाए रखना है तो उसे नई पीढ़ी का नेतृत्व तैयार करना होगा। इसलिए आकाश आनंद को उत्तराधिकारी बनाना मायावती के लिए केवल पारिवारिक फैसला नहीं बल्कि राजनीतिक आवश्यकता के रूप में भी देखा गया लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान आकाश आनंद ने जिस तरह भाजपा पर सीधे और बेहद तीखे हमले शुरू किए, उसके बाद घटनाक्रम अचानक बदल गया।

अप्रैल 2024 में चुनाव प्रचार के दौरान आकाश ने भाजपा सरकार को लेकर बेहद आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने भाजपा सरकार को आतंकवादियों की सरकार और गद्दारों की सरकार तक कहा, भाजपा के चुनाव चिह्न कमल पर तीखा हमला किया और सीतापुर की सभा में भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ जूता-चप्पल और डंडे वाली टिप्पणी भी कर दी। उनके भाषण को लेकर मामला दर्ज हुआ और इसके बाद 7 मई 2024 को मायावती ने अचानक उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक के पद से हटा दिया और अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने का फैसला भी वापस ले लिया। मायावती ने इसकी वजह आकाश में राजनीतिक परिपक्वता की कमी बताई लेकिन उस समय एक दूसरा सवाल भी तेजी से उठा था कि क्या आकाश के भाजपा पर सीधे हमले ही उनके लिए भारी पड़ गए?
आकाश ने अपने चुनाव प्रचार में भाजपा को अपना सबसे बड़ा निशाना बनाया था, उनकी सीतापुर की सभा के बाद उनके खिलाफ मामला दर्ज हुआ और इसके कुछ ही दिनों बाद मायावती ने उन्हें हटा दिया। उस समय बीएसपी के भीतर से ही यह चर्चा सामने आई थी कि आकाश को हटाए जाने का संदेश दलित मतदाताओं के बीच ऐसा गया कि मायावती भाजपा के दबाव में आ गई हैं। पार्टी के कुछ नेताओं ने यह तक माना कि आकाश की आक्रामक भाजपा विरोधी राजनीति ने बीएसपी को उसके पुराने ‘भाजपा की बी-टीम’ वाले आरोप से बाहर निकालने की कोशिश की थी और उनके अचानक हटने से पार्टी के कोर वोटर में गलत संदेश गया। यानी
भाजपा के दबाव की बात प्रमाणित तथ्य नहीं थी लेकिन यह राजनीतिक चर्चा उस समय इसलिए मजबूत हुई क्योंकि कार्रवाई का समय सीधे आकाश के भाजपा विरोधी अभियान से जुड़ा दिखाई दे रहा था।  मायावती का यह फैसला बहुत लम्बे समय तक कायम नहीं रहा।

लोकसभा चुनाव में बीएसपी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। इसी के बाद जून 2024 में मायावती ने एक बार फिर आकाश आनंद को वापस बुलाया, उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक बनाया और दोबारा अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। यहां एक और दिलचस्प बात सामने आई। बीएसपी के भीतर यह आकलन सामने आया कि आकाश को हटाने के बाद पार्टी के पास मायावती के अलावा कोई बड़ा युवा चेहरा नहीं बचा और दूसरी तरफ नगीना से चंद्रशेखर आजाद की जीत ने दलित राजनीति में एक नए युवा विकल्प को मजबूत कर दिया। ऐसे में आकाश की वापसी को बीएसपी के लिए राजनीतिक जरूरत के रूप में भी देखा गया। सवाल फिर वही था कि अगर आकाश अपरिपक्व थे तो कुछ ही सप्ताह में ऐसा क्या बदल गया कि वही आकाश फिर मायावती के उत्तराधिकारी बन गए।

इसके बाद मार्च 2025 में मायावती ने आकाश को एक बार फिर पार्टी की बड़ी जिम्मेदारियों से हटा दिया और उन्हें बीएसपी से भी बाहर कर दिया। इस बार विवाद का केंद्र आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ थे। मायावती का आरोप था कि आकाश अपने ससुर के प्रभाव में आकर पार्टी के हितों के बजाय पारिवारिक हितों को प्राथमिकता दे रहे थे। आकाश ने इसके बाद अपनी गलती स्वीकार की, मायावती के प्रति निष्ठा जताई और अप्रैल 2025 में उनकी पार्टी में वापसी हो गई। वापसी के बाद मायावती ने एक बार फिर उन पर भरोसा किया और उन्हें पहले चीफ नेशनल कोर्डिनेटर बनाया गया और फिर राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी भी दी गई। यानी आकाश की राजनीतिक यात्रा में एक बार फिर वही क्रम दोहराया गया, पहले बाहर, फिर माफी, फिर वापसी और उसके बाद पहले से बड़ी जिम्मेदारी।

2026 में ऐसा लगा कि अब शायद मायावती ने आकाश आनंद को लेकर अपना फैसला कर लिया है। आकाश को पार्टी के कार्यक्रमों में आगे किया गया और अगस्त में हाथरस तथा जेवर में उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं की सभाओं को सम्बोधित किया। 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा में भी वह सक्रिय दिखाई दिए और ऐसा संकेत मिल रहा था कि बीएसपी अब उन्हें उत्तर प्रदेश में अपना प्रमुख युवा चेहरा बनाकर मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है लेकिन सितम्बर 2026 में एक बार फिर कहानी बदल गई है। लखनऊ में पार्टी की महत्वपूर्ण बैठक के बाद मायावती ने साफ संकेत दे दिया है कि आकाश को अभी और राजनीतिक परिपक्वता की जरूरत है और उन्हें फिलहाल कोई बड़ी जिम्मेदारी देना उचित नहीं होगा। आकाश बैठक में मौजूद नहीं थे और उनके छोटे भाई ईशान आनंद वहां प्रमुखता से दिखाई दिए। इससे स्वाभाविक रूप से यह सवाल भी उठने लगा कि क्या मायावती परिवार के भीतर आकाश के विकल्प की तलाश कर रही हैं, हालांकि अभी इस बारे में कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

आकाश आनंद को लेकर मायावती का यह बार-बार बदलता फैसला अब केवल एक नेता की व्यक्तिगत राजनीतिक यात्रा नहीं रह गया है। यह बीएसपी के भीतर नेतृत्व के संकट को सामने ला रहा है। मायावती को यह अच्छी तरह पता है कि पार्टी को नई पीढ़ी के बीच ले जाने के लिए युवा नेतृत्व की जरूरत है लेकिन दूसरी तरफ पार्टी की पूरी राजनीतिक संरचना आज भी उनके व्यक्तिगत नियंत्रण पर टिकी हुई है। वह किसी ऐसे नेतृत्व को तैयार करना चाहती हैं जो उनके बाद पार्टी की कमान सम्भाल सके लेकिन जब वही नेतृत्व अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश करता दिखाई देता है तो मायावती पीछे हटती नजर आती हैं। आकाश के मामले में यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। उन्हें उत्तराधिकारी बनाया गया क्योंकि बीएसपी को नई पीढ़ी चाहिए थी लेकिन बार-बार हटाया गया क्योंकि शायद मायावती को लगता है कि वह अभी पार्टी और आंदोलन को सम्भालने के लिए पर्याप्त परिपक्व नहीं हैं।

यहां कांशीराम की विरासत का सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है। मायावती अब आकाश को बड़ी जिम्मेदारी से पीछे करने के लिए कांशीराम की उस सोच का हवाला दे रही हैं जिसमें परिवार के लोगों को आंदोलन में सहयोग करने की अनुमति तो थी लेकिन उन्हें चुनाव लड़ाने या सत्ता में महत्वपूर्ण पद देने की बात स्वीकार नहीं थी लेकिन यही बात एक बड़ा राजनीतिक सवाल पैदा करती है कि अगर यह सिद्धांत इतना महत्वपूर्ण था तो फिर 2023 में आकाश आनंद को राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित करने का फैसला क्यों किया गया? अगर आकाश उस समय उत्तराधिकारी बनने के योग्य थे तो फिर कुछ महीनों बाद उन्हें अपरिपक्व बताकर हटाने की जरूरत क्यों पड़ी? बार-बार बदलते इन फैसलों से यही संदेश जाता है कि बीएसपी के भविष्य को लेकर स्वयं मायावती की रणनीति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

सबसे बड़ी चुनौती अब 2027 का विधानसभा चुनाव है। उत्तर प्रदेश में कभी 206 विधायक देने वाली बीएसपी आज शून्य पर है, 2024 के लोकसभा चुनाव में वह एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट आधार भी लगातार घटा है। दूसरी तरफ दलित राजनीति में चंद्रशेखर आजाद जैसे नए चेहरे अपनी जगह बना रहे हैं। ऐसे समय में बीएसपी को एक मजबूत संगठन, नया राजनीतिक संदेश और ऐसा चेहरा चाहिए जो मायावती की विरासत को आगे बढ़ा सके लेकिन अगर उत्तराधिकारी को बार-बार आगे करके फिर पीछे कर दिया जाएगा तो पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच भरोसा कैसे बनेगा, यह बड़ा सवाल है।

आकाश आनंद की कहानी इसलिए सिर्फ यह नहीं है कि मायावती अपने भतीजे से नाराज हैं या उन्हें पर्याप्त परिपक्व नहीं मानतीं। असली सवाल यह है कि क्या मायावती बीएसपी के लिए अपने बाद का नेतृत्व तैयार कर रही हैं या पार्टी की पूरी कमान अपने हाथ में रखते हुए केवल सम्भावित उत्तराधिकारियों को आजमा रही हैं? कभी उत्तराधिकारी, फिर बाहर, फिर वापसी, फिर बड़ी जिम्मेदारी और अब दोबारा किनारे,आकाश आनंद के साथ हुआ यह पूरा घटनाक्रम दरअसल मायावती की उसी राजनीतिक दुविधा को सामने लाता है जिसके बीच बीएसपी अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने की कोशिश कर रही है। अब 2027 के चुनाव से पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि मायावती के बाद बीएसपी का चेहरा कौन होगा,आकाश आनंद, ईशान आनंद या फिर कोई ऐसा नया नेता जिसकी अभी तस्वीर सामने ही नहीं आई है?

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