‘काॅकरोचों’ ने बढ़ाई संघ की बेचैनी

‘काॅकरोचों’ ने बढ़ाई संघ की बेचैनी

‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ ने 4 सितम्बर के अपने अंक में एक समाचार ‘Amid CJP’s school visits, RSS arm slams political interference in education’ शीर्षक से प्रकाशित किया जिसे पढ़ मेरे मन में विचार उठा कि जब सत्ता से जुड़े लोग वर्षों से शिक्षा व्यवस्था को अपने वैचारिक प्रभाव का मैदान बनाने में लगे हों, तब किसी राजनीतिक दल का सरकारी स्कूलों की हालत पर सवाल उठाना अचानक ‘राजनीतिक हस्तक्षेप’ कैसे हो जाता है?
राजस्थान में काॅकरोच जनता पार्टी यानी भाजपा के स्कूल निरीक्षण के बाद उठे विवाद ने यही सवाल फिर सामने ला दिया है। मुझे लगता है कि असली बेचैनी स्कूल में पहुंचे नेताओं से ज्यादा उस सवाल को लेकर दिखाई देती है जो उन्होंने स्कूल की बदहाली पर खड़ा कर दिया है और बरसों से शिक्षा व्यवस्था में हस्तक्षेप कर रहे संघ के मैदान में धावा बोल दिया है।
हरेक जागरूक भारतीय को यह पता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लम्बे समय से समाज के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी वैचारिक उपस्थिति और प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। शिक्षा का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। शिक्षक संगठनों से लेकर विश्वविद्यालयों तक संघ की वैचारिक पहुंच और उससे जुड़े लोगों की नियुक्तियों को लेकर लम्बे समय से राजनीतिक बहस होती रही है। 2014 में दिल्ली और उसके बाद देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा सरकार बनने के बाद से ही विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर से लेकर कुलपति तक की नियुक्तियों में विचारधारा की भूमिका को लेकर विपक्ष और अकादमिक जगत के एक हिस्से की ओर से सवाल उठते रहे हैं।
इसी पृष्ठभूमि में राजस्थान की घटना को देखिए। काॅकरोच जनता पार्टी ने सरकारी स्कूलों की स्थिति को अपना मुद्दा बनाया। पार्टी के लोग एक सरकारी स्कूल में पहुंचे, वहां की परिस्थितियों को देखा और शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं पर सवाल उठाए। इसके बाद गांव के लोगों की ओर से उनका विरोध हुआ, यहां तक कि उनके साथ मारपीट की घटना भी सामने आई लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। राजस्थान सरकार ने उस स्कूल में विकास कार्यों की घोषणा कर दी। यानी जिस दौरे को राजनीतिक स्टंट या हस्तक्षेप बताकर खारिज करने की कोशिश हुई, उसके बाद कम से कम इतना तो हुआ कि सरकारी तंत्र को उस स्कूल की ओर देखना पड़ा। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
अगर किसी सरकारी स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, भवन की हालत खराब है, बुनियादी सुविधाओं का अभाव है और वर्षों से शिकायतें चली आ रही हैं तो वहां किसी राजनीतिक दल का पहुंचना लोकतंत्र में अपराध कैसे हो सकता है? क्या सरकारी स्कूल केवल सरकार के निरीक्षण के लिए बने हैं? क्या वहां विपक्ष नहीं जा सकता? क्या वहां पत्रकार नहीं जा सकते? क्या वहां जनता अपनी समस्या लेकर नहीं जा सकती? सबसे बड़ा सवाल कि क्या वहां जाकर व्यवस्था की कमियां गिनाना शिक्षा में ‘राजनीतिक हस्तक्षेप’ है लेकिन शिक्षा के भीतर वर्षों से चल रही वैचारिक गतिविधियां राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं हैं?
यहीं से संघ की बेचैनी को समझने की जरूरत है। राजस्थान के इस विवाद पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षक महासंघ को भारी नाराजगी है। यह संगठन सीजेपी के स्कूल निरीक्षण को शिक्षा व्यवस्था में राजनीतिक हस्तक्षेप करार दे रहा है। संगठन का तर्क है कि सरकारी स्कूलों को राजनीतिक गतिविधियों का अखाड़ा नहीं बनने दिया जाना चाहिए और शिक्षक राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहें। सुनने में यह तर्क बेहद स्वाभाविक लगता है। आखिर स्कूल राजनीति का मंच नहीं होना चाहिए लेकिन सवाल यह है कि इस सिद्धांत की सीमा क्या है? और इसका पालन सभी पक्षों पर समान रूप से होता है या नहीं? क्योंकि शिक्षा को राजनीति से मुक्त रखने की बात तब बहुत अच्छी लगती है, जब शिक्षा को विचारधारा से भी मुक्त रखने की मांग साथ में की जाए।
अगर राजनीतिक दलों का स्कूलों में जाना गलत है तो फिर किसी वैचारिक संगठन की स्कूलों में मौजूदगी पर भी वही सवाल उठना चाहिए। अगर शिक्षकों को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखना जरूरी है तो उन्हें किसी खास विचारधारा के प्रचार से दूर रखने की बहस भी उतनी ही गम्भीर होनी चाहिए। अगर स्कूल में किसी राजनीतिक दल का कार्यक्रम ‘राजनीतिक हस्तक्षेप’ है तो पाठ्यक्रम, शिक्षक प्रशिक्षण, सांस्कृतिक गतिविधियों और शैक्षणिक संस्थानों के भीतर विचारधारा की मौजूदगी को लेकर भी समान कसौटी होनी चाहिए।
लोकतंत्र में असली समस्या यह नहीं है कि विपक्ष स्कूल में क्यों पहुंचा। असली समस्या तब पैदा होती है जब स्कूल की हालत ऐसी हो कि विपक्ष को वहां पहुंचकर सरकार को उसकी जिम्मेदारी याद दिलानी पड़े। काॅकरोच जनता पार्टी के स्कूल दौरे के बाद अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षक महासंघ ने अपने बयान में स्कूलों की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार, शिक्षकों, अभिभावकों और समाज के सहयोग की बात भी कही है। संगठन ने शिक्षकों की रिक्तियों, आधारभूत ढांचे और दूसरी समस्याओं की ओर भी ध्यान दिलाया। यही बात इस विवाद को और दिलचस्प बना देती है क्योंकि यदि समस्याएं वास्तव में मौजूद हैं तो फिर उन पर सवाल उठाने वाले राजनीतिक दल को सिर्फ इसलिए खारिज क्यों किया जाए कि वह राजनीतिक दल है? राजनीतिक दलों का तो काम ही सरकार से सवाल पूछना है। अगर सरकार के स्कूलों में समस्याएं हैं तो उनका राजनीतिक मुद्दा बनना कोई अस्वाभाविक बात नहीं है। बेरोजगारी राजनीतिक मुद्दा है, स्वास्थ्य राजनीतिक मुद्दा है, सड़क राजनीतिक मुद्दा है, महंगाई राजनीतिक मुद्दा है तो फिर शिक्षा राजनीतिक मुद्दा क्यों नहीं हो सकती? आखिर स्कूलों पर खर्च होने वाला पैसा जनता का है, शिक्षक जनता के बच्चों को पढ़ाते हैं और शिक्षा की गुणवत्ता का असर पूरे समाज पर पड़ता है।
दरअसल, इस विवाद का सबसे असहज सवाल यही है कि सरकारी स्कूलों की बदहाली पर चर्चा शुरू होते ही बहस स्कूल से निकलकर ‘किसे स्कूल में आने का अधिकार है’ पर क्यों पहुंच गई है? राजस्थान की इस घटना में एक और तथ्य ध्यान देने लायक है। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षक महासंघ  का दावा है कि संगठन लम्बे समय से सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की रिक्तियों और बुनियादी सुविधाओं जैसे सवाल उठाता रहा है और ‘हमारा विद्यालय, हमारा तीर्थ’ जैसे अभियान भी चलाता रहा है। दूसरी तरफ सीजेपी का कहना है कि वह वर्षों से चली आ रही समस्याओं को सामने ला रहा है। यानी दोनों पक्ष शिक्षा सुधार की भाषा बोल रहे हैं। फिर टकराव किस बात का है? टकराव शायद इस बात का है कि शिक्षा की समस्या कौन उठाएगा और शिक्षा के विमर्श पर किसका नैतिक अधिकार माना जाएगा। अपने मैदान में जेनरेशन जी की ‘घुसपैठ’ संघ की बेचैनी बढ़ा रहाा है। जब तक सरकारी स्कूलों की समस्याएं फाइलों, विधानसभा के सवालों और विभागीय बैठकों तक सीमित रहती हैं, तब तक वे एक प्रशासनिक विषय हैं लेकिन जैसे ही कोई राजनीतिक संगठन कैमरा लेकर स्कूल के भीतर पहुंचता है, बच्चों की हालत दिखाता है, खाली पदों की बात करता है और सवाल को जनता के बीच ले जाता है, शिक्षा एक राजनीतिक मुद्दा बन जाती है। राजनीतिक मुद्दा बनते ही उन ताकतों को असुविधा होने लगती है, जिन्होंने लम्बे समय से शिक्षा के क्षेत्र को अपने प्रभाव के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण माना है।
मेरा व्यक्तिगत मत है कि सरकारी स्कूलों में किसी भी राजनीतिक दल की अनियंत्रित गतिविधियों का समर्थन नहीं किया जा सकता। शिक्षक अगर खुलकर पार्टी राजनीति करने लगें, स्कूल राजनीतिक सभाओं के केंद्र बन जाएं या बच्चों को किसी दल के प्रचार के लिए इस्तेमाल किया जाए तो उस पर रोक होनी चाहिए लेकिन इसी सिद्धांत का इस्तेमाल सरकार से सवाल पूछने और विपक्ष को सार्वजनिक संस्थानों की वास्तविक स्थिति देखने से
रोकने के लिए नहीं किया जा सकता।
स्कूल जनता के हैं। सरकार उनकी संरक्षक है, मालिक नहीं और शिक्षक किसी संगठन के नहीं, संविधान और समाज के प्रति जवाबदेह हैं। इसलिए बहस यह होनी चाहिए कि राजस्थान के सरकारी स्कूलों में कितने शिक्षक पद खाली हैं? कितने स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं? कितने स्कूल वर्षों से मरम्मत की प्रतीक्षा कर रहे हैं? बच्चों की पढ़ाई का स्तर क्या है? सरकार ने इन समस्याओं को दूर करने के लिए क्या किया? अगर इन सवालों के जवाब संतोषजनक हैं तो किसी भी राजनीतिक दल का स्कूल दौरा अपने आप बेमानी हो जाएगा लेकिन अगर जवाब असहज हैं तो स्कूल का दौरा करने वाले को कठघरे में खड़ा करने के बजाय उन सवालों का जवाब देना चाहिए। स्मरण रहे विपक्ष का स्कूलों में पहुंच जाना बड़ी समस्या नहीं है। सबसे खतरनाक स्थिति वह है जब स्कूल की बदहाली पर सवाल उठाना ही अपराध समझ लिया जाए। रही बात राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ या उससे जुड़े किसी भी संगठन की तो मैं समझता हूं उनकी बेचैनी या बौखलाहट का असली कारण उनकी सोच है जो यह मानती है कि उनके नजरिए वाला ‘हिंदुस्तान’ ही असली भारत है। शिक्षण संस्थाओं में संघ का बढ़ता प्रभाव, प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालयों तक की नियुक्तियों में उसका हस्तक्षेप तथा इतिहास को बदलने का उसका एजेंडा जगजाहिर है। कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों की वनिस्पत संघ को खतरा जनरेशन जी नजर आने लगा है।
वह समझ  चुका है कि उसके एजेंडे को यदि कोई बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है तो वे है ‘काॅकरोच’। यही कारण है कि देश और इन दिनों विदेश दौरे पर गए संघ प्रमुख की भाषा युवाओं के प्रति सहृदयता का पुट लिए हुए है तो दूसरी ओर उनका संगठन अभी से इस नई चुनौती को थामने के लिए कमर कसने लगे हैं। संघ नई पीढ़ी के तेवरों से किस कदर घबराया हुआ है इसे संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयानों के साथ-साथ भाजपा शासित राज्यों में सरकारी स्कूलों में मीडिया व अन्य लोगों के प्रवेश पर लगा दिए गए प्रतिबंध से समझा जा सकता है। इन दिनों उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश समेत अनेक राज्यों में विद्यालयों की दुर्दशा से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया में रोज अपलोड हो रहे हैं जिनसे त्रस्त राज्य सरकारों ने अब सरकारी विद्यालयों में मीडिया के प्रवेश पर रोक लगा दी है लेकिन शायद ये सरकारें अभी तक समझ नहीं पाई हैं कि अब ‘काॅकरोच’ रूकने वाले नहीं हैं।

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