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Editorial

हमाम में सब नंगे

अमेरिका के प्रसिद्ध पत्रकार हन्टर स्टाकटन थाम्पसन् का स्मरण मुझे पिछले दिनों उत्तराखण्ड पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए एक टीवी चैनल ‘समाचार प्लस’ के सीईओ उमेश कुमार के चलते हो आया। थाम्पसन साठ के दशक में एक बेहद चर्चित पत्रकार थे जिन्हें ‘गोन्जो’ जर्नलिज्म का जन्मदाता माना जाता है।
‘गोन्जो’ रिपोर्ट लिखने की एक विशिष्ट शैली है जिसमें लेखक स्वयं के माध्यम से अपनी खबर कहता है। आज हमारे देश में भी इस प्रकार की रिपोर्टिंग का खासा प्रचलन है। बहरहाल, थाम्पसन् का एक कथन बेहद प्रासंगिक है – ‘The TV business is uglier than most things. It is normally perceived as some kind of cruel and shallow money trench through the heart of the journalism industry, a long plastic hallway where thieves and pimps run free and good men die like dogs, for no good reason.’। निश्चित ही वर्तमान समय में हमारे देश का टीवी जर्नलिज्म और कुछ हद तक पिं्रट पत्रकारिता इसी का शिकार हो चली है जहां बकौल थाम्पसन चोर एवं दलालों की बन आई है और मूल्य आधारित पत्रकारिता करने वाला गटर में पड़ा है। उमेश कुमार प्रसंग पर चर्चा से पहले कुछ बात जीवन मूल्यों में आई गिरावट पर ताकि इसे केवल पत्रकारिता तक सीमित मानने की भूल न हो।
आजादी के बाद कुछ बरस नैतिक मूल्यों पर आस्था इस देश की बनी रही। हालांकि भ्रष्टाचार ने नेहरूजी के दौर में ही अपने पांव पसारने शुरू कर दिए थे, अधिकांश राजनेता, नौकरशाह, व्यापारी और समाज का अन्य वर्ग राष्ट्र भक्ति में सराबोर था। देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओं में बहस का स्तर बेहद उम्दा और जनसरोकारों से लबरेज रहता था। तब हमारी संसद और राज्यों की विधानसभा में एक से बढ़कर एक दिग्गज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुआ करते थे। जाहिर है जिन्होंने बरसों अंग्रेजों की जेल में यातनाएं सही थी, उनका जमीर आजाद भारत में सत्ता पाने के बाद जगा रहा था। नैतिक मूल्यों पर तब तक राजनेताओं की आस्था बची हुई थी। धीरे-धीरे लेकिन इसमें कमी आती चली गई। समाजवादी विचारक डॉ राममनोहर लोहिया ने इसे समझते हुए आजादी के मात्र डेढ़ दशक बाद ही लोकसभा में कह डाला था कि ‘हिन्दुस्तान की गाड़ी बेतहाशा बढ़ती जा रही है, किसी गड्ढ़े की तरफ या किसी चट्टान से चकनाचूर होने’। लोहिया का कथन सही साबित हुआ। हमारे नीति-नियंता राष्ट्र के विकास की सही नीति बना पाने में दूरदर्शी साबित न हो सके। राष्ट्र निर्माण का स्वप्न ध्वस्त हो गया। चुनाव जीतना, सत्ता पाना हमारे कर्णधारों का मूल उद्देश्य बन गया जिसे प्राप्त करने के लिए हर प्रकार के समझौतों का दौर शुरू हुआ। वोट की राजनीति ने समाज का विघटन बड़े पैमाने पर कर डाला। पहले हम हिंदू-मुस्लिम, सिख-इसाई  में बंटे थे। आज नाना प्रकार की जातियों, उपजातियों में बंट चुके हैं। तुष्टिकरण का खेल इस पैमाने पर खेला गया कि आज हम सब कुछ हैं पर भारतीय नहीं। लोकतंत्र के चारों स्तंभ आज इस खेल की भेंट चढ़ चुके हैं। सबसे भयावह यह कि नैतिक मूल्यों की इस गिरावट ने पूरे समाज को अपनी जकड़ में ले लिया है। पैसा कमाना अंतिम ध्येय बन चुका है जिसे पाने के लिए हर कोई किसी भी स्तर तक गिरने को तैयार है। कोई भी पेशा ले लीजिए, चाहे वह चिकित्सा सेवा हो, नौकरशाही हो, न्यायपालिका हो, व्यापार हो या फिर हमारे मुल्क की राजनीति हो, सेवा भाव हर क्षेत्र से गायब हो चुका है। चारों तरफ एक प्रकार का कोहराम है। ऐसे में पत्रकारिता भला कैसे अछूती रह सकती थी? पत्रकार भी तो इसी समाज, इसी व्यवस्था का अंग है। रही होगी पत्रकारिता कभी श्रेष्ठ मूल्यों की वाहक, आज तो वह खालिस व्यापार है। ऐसा व्यापार जहां मुनाफा कमाना ही एकमात्र लक्ष्य बन चुका है। एक उद्योग का रूप इसने ले लिया है। बड़े टीवी चैनल हों या फिर अखबार, सभी का नियंत्रण बड़े औद्योगिक घरानों के हाथों में जा चुका है। संपादक नाम की संस्था अब पूरी तरह बाजार की शक्तियों के हाथों में खेलने लगी है। नतीजा इस विकृति ने पवित्र कहे जाने वाले इस मिशन को पूरी तरह से ध्वस्त कर डाला है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि गांव-कस्बे के पत्रकार हों या फिर महानगरों के बड़े मीडिया घरानों से जुड़े दिग्गज चेहरे, सभी कोयले की दलाली में अपना मुंह काला कर रहे हैं। देश के एक बड़े चैनल के मालिक, संपादक और एक शीर्ष उद्योगपति के मध्य हुए विवाद को पूरे देश ने देखा। अभी कुछ अर्सा पहले सहारा समूह से ताल्लुक रखने वाले उपेन्द्र राय की गिरफ्तारी भी हमारे सामने है। समस्या के मूल में राजनेता नौकरशाह और पत्रकार का वह नापाक गठजोड़ है जो जब तक एक-दूसरे के स्वार्थ की पूर्ति करता रहता है तब तक पर्देदारी बनी रहती है, जब इसमें रूकावट आती है तो जो भारी पड़ जाए वही दूसरे को बेनकाब करने का काम कर देता है। उत्तराखण्ड के संदर्भ में यदि बात करूं तो राज्य गठन के साथ ही इस प्रकार के नापाक गठबंधन ने काम करना शुरू कर दिया था। पहली निर्वाचित सरकार के मुखिया एनडी तिवारी ने मीडिया मैनेजमेंट की बुनियाद रखी जिसका अनुसरण उनके बाद की सरकारों ने किया। यही कारण रहा कि राज्य में विशेषकर राजधानी देहरादून में ऐसे पत्रकार और संपादक बन बैठे जिन्हें कलम पकड़नी तक नहीं आती। यदि आज राज्य सरकार ऐसे सभी की निष्पक्ष जांच करा लें तो यकीन मानिए अस्सी प्रतिशत फर्जी पाए जाएंगे। प्रदेश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का तो हाल सबसे खराब है। जिसकी सरकार उसका यशोगान करना, पूरी बेशर्मी के साथ, यहां चलन बन चुका है। जनसरोकारों के मुद्दे उठाना, सरकारी भ्रष्टाचार को उजागर करने का दायित्व हम सरीखे साप्ताहिक अखबारों अथवा सोशल मीडिया तक सिमट गया है। इससे मैं इंकार नहीं करता कि सत्ता और मीडिया के बीच स्वाभाविक रूप से निकटता स्थापित हो जाती है। यह स्वभाविक इसलिए है क्योंकि दोनों लोकतंत्र के स्तंभ हैं जिनमें सही समन्वय समाज के हित को सुनिश्चित करता है। निजी तौर पर मेरी राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी संग बहुत घनिष्ठता थी। लेकिन यह समाचार पत्र उनका सबसे बड़ा आलोचक था। हमने लगातार उनकी सरकार के वित्तीय अनुशासन पर लिखा। कितने ही घोटालों से पर्दा उठाया। भाजपा की सरकार के मुखिया जनरल खण्डूड़ी संग भी मेरी मित्रता थी। इस मित्रता के बावजूद हमने खण्डूड़ी सरकार के हर उस फैसले का विरोध किया जो हमारी समझ से जनविरोधी था। निशंक सरकार के दौरान हमारा सत्ता संग संघर्ष चरम पर तब पहुंचा जब हमने उनके एक फैसले को चुनौती देते हुए जनहित याचिका का सहारा लिया। मेरे निजी संबंध कभी भी सत्ता संग हमारे संघर्ष में आड़े नहीं आए। खण्डूड़ी जब दोबारा मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मेरी सलाह को स्वीकारा और टीम अन्ना संग मिल राज्य में कठोर लोकपाल एक्ट बनाया। हरीश रावत सरकार संग भी हमारी तनातनी रही। हमने उनकी शराब नीति पर सबसे जबर्दस्त प्रहार किया। उनका महत्वाकांक्षी गैरसैंण विधानसभा सत्र हमारी इस खबर की भेंट चढ़ गया। मुझे यह स्वीकारने में कतई संकोच नहीं कि हरीश रावत संग मेरे बेहद करीबी रिश्ते रहे हैं, आज भी हैं। इसके बावजूद यदि हमने अपनी कलम की धार को कुंद नहीं होने दिया तो इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ एक कारण है। किसी भी सरकार से मैंने या मेरे किसी सहयोगी ने कभी किसी निजी स्वार्थ की पूर्ति का न तो प्रयास किया न ही अपेक्षा। यह हमारी सबसे बड़ी शक्ति है जिसका बड़ा खामियाजा हमें लगातार आर्थिक संकट के रूप में उठाना पड़ता रहा है। दूसरी तरफ हमारी इन सत्रह साल की यात्रा के दौरान हमने अपने कई पत्रकार बंधुओं का चमत्कारी उत्थान होते देखा। सत्ता संग उनकी जुगलबंदी का परिणाम रहा कई करोड़पति हो गए तो कुछेक ने स्वयं के न्यूज चैनल स्थापित कर डाले। ‘समाचार प्लस’ के उमेश कुमार इसका एक उदाहरण मात्र हैं। उनकी गिरफ्तारी के पीछे की पटकथा  से अभी पर्दा उठना बाकी है। राज्य सरकार खुद कुछ नहीं बता रही है। उमेश कुमार के खिलाफ उनके ही चैनल के एक साहब ने एफआईआर दर्ज कराई है। आरोप संगीन हैं। जो कुछ बजरिए इन महाशय सामने आया है वह ब्लैकमेल के किसी बड़े खेल की तरफ इशारा करता है। कहा-सुना जा रहा है कि उमेश कुमार स्टिंग ऑपरेशन के जरिए सरकार को अस्थिर करने का षड्यंत्र रच रहे थे। यह भी सुनने में आ रहा है कि उन्होंने सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े कुछेक महत्वपूर्ण लोगों का स्टिंग कर भी लिया था। प्रश्न उठने लाजिमी हैं कि यदि ऐसे स्टिंग सरकार के हाथों लग चुके हैं तो क्या वह उन लोगों के खिलाफ कार्यवाही करेगी जिनका नाम शामिल है। बहुत चर्चा है कि सीएम के सबसे करीबी एक नौकरशाह का स्टिंग हुआ है। यदि उमेश कुमार इस प्रकार के स्टिंग ऑपरेशन कर सरकार को ब्लैकमेल करने का काम कर रहे थे तो निश्चित ही उन पर हुई कार्यवाही जायज है। लेकिन कार्यवाही तो उन पर भी उतनी ही बनती है जिनका स्टिंग सफलतापूर्वक उमेश कुमार ने कर डाला था। पूरी संभावना है इस प्रकार की रिकॉर्डिंग में किसी डील, बड़े लेन-देन की बातचीत होगी। इसलिए उमेश कुमार के साथ-साथ वे सब भी उतने ही गुनहगार हैं। इस पूरे प्रकरण में भाजपा के चाल-चरित्र और चेहरे पर भी प्रश्न-चिन्ह लगता है। उमेश कुमार ने हरीश रावत सरकार को अपदस्थ करने की भाजपाई मुहिम में खुलकर पार्टी का साथ दिया था। बतौर इनाम उन्हें केंद्रीय सुरक्षा और सत्ता प्रतिष्ठान का लाडला बनकर मिला। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत अपवाद थे, अन्यथा भाजपा के दिग्गज नेताओं संग उमेश कुमार की प्रगाढ़ता के किस्से देहरादून से दिल्ली तक सुनने को मिलते रहते थे।
बहरहाल इस प्रकरण का जो सच बताया जा रहा है, मामला उससे कहीं अधिक है। जिस गुपचुप तरीके से पूरी कार्यवाही को अंजाम दिया गया उससे स्पष्ट है कि उमेश कुमार बड़ा खेल खेलने का प्रयास कर रहे थे लेकिन जैसी कहावत है काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती, त्रिवेंद्र रावत उन पर भारी पड़ गए। इस पूरे प्रकरण का एक चिंताजनक पहलू यह है कि पत्रकारों को दलाल और ब्लैकमेलर कह चिन्हित करने वालों का हाथ ऊपर हो गया है और इसका खामियाजा उन सबको भी भुगतना पड़ेगा जो इस कीचड़ से खुद को बचाए हुए हैं।

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