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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपनी स्थापना के 95 बरस पूरे कर चुका है। इस यात्रा का यह चरम उत्कर्ष काल है। देश के 17 राज्यों में भाजपा की सरकार है और केंद्र की सत्ता में वह पिछले सात बरस से काबिज है। भाजपा संघ के गर्भ से निकली राजनीतिक पार्टी है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि देश के अधिकांश हिस्से पर संघ की हुकूमत है। यह भी कहा जा सकता है कि वर्तमान में संघ की हैसियत ‘राजगुरु’ समान है। अपने जन्मकाल से ही संघ के लक्ष्य और प्रयास भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ में बदलने के रहे हैं। आजादी के तुरंत बाद ही तत्कालीन गृहमंत्री बल्लभ भाई पटेल ने संघ को साम्प्रदायिक संगठन घोषित कर प्रतिबंधित कर दिया था। इतना कठोर कदम उठाने के पीछे महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का संघ कार्यकर्ता होना था। शुरुआती दौर में संघ को अपनी जड़ें जमाने में खास सफलता नहीं मिली तो इसका एक बड़ा कारण 1857 के विद्रोह के दौरान हिंदू-मुसलमान का एक होकर अंग्रेज हुकूमत से टकराना, शहादत देना रहा था। वीर सारवकर, जिन्हें संघ हिंदू राष्ट्रवाद का पिता मान पूजती है, अपनी पुस्तक ‘भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम: 1857’ में 1857 के विद्रोह को भी धर्म के नजरिए से देखते हैं। उनके अनुसार यह हिंदू-मुस्लिम एकता और अंग्रेजी हुकूमत से विद्रोह दरअसल इसाई धर्म के विस्तार का विरोध था। बहरहाल सावरकर की ‘टू नेशन थ्योरी’ और कट्टर कांग्रेसी मोहम्मद अली जिन्ना का 1925 के बाद साम्प्रदायिक हो जाने का लाभ संघ को मिला। 1947 में हुए विभाजन के दौरान बड़े पैमाने पर भड़की हिंसा ने इस संगठन की जड़ों में खाद डालने का काम किया। विस्थापित हिंदू स्वाभाविक रूप से साम्प्रदायिक हो संघ समर्थक बन गए। संघ हालांकि सीधे तौर पर राजनीति में नहीं उतरा, किंतु उसका विस्तार उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और इन महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए बने जनसंघ तथा 1980 में जनसंघ के स्थान पर बनी नई राजनीतिक पार्टी भाजपा ने किया। आज जब चारों तरफ संघ की गूंज सुनाई दे रही हो, राज्यों के विधानसभा चुनावों में केवल धर्म की गूंज सुनाई दे रही हो तब गंभीरता से इस बात पर मंथन-चिंतन आवश्यक हो जाता है कि असल में हिंदुत्व की परिभाषा है क्या और जिन स्वतंत्रता संग्राम योद्धाओं ने बरसों संघर्ष कर, फांसी पर चढ़, गोली खा, महीनों जेल और कालापानी की सजा काट हमें आजादी दिलाई और ऐसा संविधान हमारे लिए बनाया जिसमें धर्म और पंथ निरपेक्षता की बात कही गई हो, उस संविधान को क्या अब बदले जाने और ‘हम’ भारत के लोगों को खुद की पहचान बतौर हिंदू उग्र रूप से स्थापित करने का वक्त आ पहुंचा है? यदि हां तब उन मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं का क्या होगा जो हमारे संस्कारों में, हमारे डीएनए में परमानेंट समाहित हैं?

दरअसल, पूरा खेल धर्म के सहारे सत्ता पाने और उसमें टिके रहने का है। यही कारण है कि हिंदुत्व के नाम पर समाज की सामाजिक समरसता को समाप्त करने का खेल रचा गया, रचा जा रहा है। प्रश्न यह उठता है कि क्योंकर ऐसी सोच को ‘हम’ यानी देश की लगभग अस्सी करोड़ जनता स्वीकार कर रही है? विस्तार दे रही है? स्मरण रहे जो भी इस प्रकार की सोच को विस्तार देने का काम करते आए हैं, कर रहे हैं, वे हमें आजादी दिलाने वाले संघर्ष का हिस्सा कभी नहीं रहे, न ही उन्होंने अंग्रेजों की लाठी खाई। हमारे पूर्वजों ने गोली खाई, फांसी पर लटके तब कहीं जाकर हमें आजादी नसीब हुई। हमें एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मुल्क में सांस लेने का अधिकार मिला। अब इन्हीं मूल्यों को बदलने का प्रयास जब अपने उत्कर्ष काल में पहुंच चुका है, हमें यानी बहुसंख्यक समाज को गंभीरतापूर्वक चिंतन करना होगा कि आखिर ‘हिंदू’ और ‘हिंदुत्व’ का मर्म क्या है? और क्योंकर हमारे धर्म और हमारी संस्कृति को गलत तरीके से परिभाषित कर हमारी सामाजिक समरसता को खत्म किया जा रहा है। मैं लगातार कहता आया हूं कि मेरे लिए हिंदू होने का अर्थ उस महान संस्कृति के डीएनए का हिस्सा होना भर है जो मानवीय सरोकारों से लबरेज है। मेरे लिए छह दिसंबर 1992 की घटना शर्म का कारण है क्योंकि मैं मानता आया हूं कि बाबरी मस्जिद मुसलमानों की धर्मस्थली मेरे लिए कभी नहीं थी लेकिन उससे कहीं अधिक वह हिंदुत्व की, हिंदू संस्कृति की और उसके मानवीय सरोकारों की कसौटी थी। विदेशी आक्रांताओं के तमाम अत्याचार सहने वाले हम कभी भी प्रतिशोध को अपना जीवन मूल्य नहीं मानते थे। यही वह असल कारण है जिसके चलते कभी भी, कोई भी हमलावर ताकत हमें समाप्त न कर सकी। इसलिए बाबरी मस्जिद का गिराया जाना मेरे सरीखे हर उसके लिए बड़ा आघात था जो हिंदू होने का अर्थ सर्वाग्राही होना मानता आया है।

खुद की बात करूं तो मैं बहुत धार्मिक नहीं हूं। मेरे लिए धर्म से पहले इंसान और इंसानियत है। इसके बावजूद मैं हिंदू परिवार में जन्म लेने पर गर्व करता हूं। मैं कर्मकांडों पर खास आस्था नहीं रखता लेकिन आत्मा के अस्तित्व पर, उसके अजर-अमर होने पर और पुनर्जन्म के काॅन्सेप्ट पर पूरा यकीन करता हूं। इसलिए नहीं कि हमारे धर्मग्रंथों में ऐसा कहा गया है, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं मानता हूं कि कोई शक्ति या ऊर्जा है जो न केवल हमें वरन पूरे ब्राह्मांड को संचालित करती है। इन दिनों एक पुस्तक पढ़ रहा हूं ‘Many Lives many Masters’। इसके लेखक एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त डाॅक्टर हैं। उनके अनुभवों ने मेरे इस विश्वास को शक्ति दी है कि विज्ञान अभी तक इस ब्राह्मांड के पंाच प्रतिशत तक को नहीं समझ-भेद पाया है। विज्ञान दरअसल, सबसे तर्कहीन है। वह बात तो तर्कशास्त्र की करता है लेकिन अपने से विपरीत तर्कों को सुनने तक को तैयार नहीं रहता। बहरहाल, मुझे हिंदू होने पर गर्व इसलिए है क्योंकि इससे मुझे शक्ति मिलती है कि मैं प्रतिशोध और हिंसा के सहारे अपनी श्रेष्ठता न प्रमाणित करूं, मुझे शक्ति मिलती है इस धर्म की पहली पुस्तक ‘ऋग्वेद’ से जो कहती है ‘‘एकं सत् विप्रा बहुधा वदंति।’’ इसलिए आज जब हिंदू की नई परिभाषा गढ़ी जा रही हो, ‘हिंदुत्व’ के नाम पर हिंदू राष्ट्र को बढ़ावा दिया जा रहा हो तो ‘एकं सत् विप्रा बहुधा वंदति’ का क्या होगा? यह समझा- समझाया जाना जरूरी है कि हिंदू और हिंदुत्व एक नहीं है। यह शब्द या इस विचार के जन्मदाता विनायक दामोदर सावरकर ने भले ही अपनी किताब ‘हिंदुत्वः हिंदू कौन है’ में मायाजाल रचकर दोनों को एक साबित करने का प्रयास किया हो, भले ही आज उनका यह विचार अपनी जड़ें गहरी कर पाने में सफल हो चुका हो, मेरा स्पष्ट कहना है कि ‘हिंदुत्व’ दरअसल, एक राजनीतिक शब्द है जिसे अंग्रेजों की काल कोठरी में रहते, अत्याचार सहते वीर सावरकर ने अपनी नस्ली सोच को विस्तार देने के लिए ईजाद किया, कुतर्क दिए, खुद की कही बातों का ही खंडन किया। उदाहरण के लिए कालापानी की सजा पाने से पहले सावरकर ने पुस्तक लिखी ‘भारत का पहला स्वतंत्रता संग्रामः 1857’। यह पुस्तक 1907 में मराठी भाषा में प्रकाशित हुई थी जिसका बाद में अंग्रेजी और हिंदी में अनुवाद आया। इसमें सावरकर हिंदू-मुस्लिम एकता को भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक मानते हुए कहते हैं ‘जिस देश में अपने अतीत की चेतना न हो उसका कोई भविष्य नहीं हो सकता। इसी तरह यह भी महत्वपूर्ण है कि राष्ट्र अपने अतीत को प्राप्त करने की न सिर्फ क्षमता विकसित करे, उसे यह भी जानना चाहिए कि अपने भविष्य को पाने के लिए अतीत का कैसे उपयोग किया जाए। राष्ट्र को अपने इतिहास का मालिक होना चाहिए, उसका गुलाम नहीं, क्योंकि यह निहायत मूरखपन होगा कि कुछ चीजें अब भी की जाएं, क्योंकि वे अतीत में कभी की गई थी। शिवाजी के वक्त में मुसलमानों से नफरत ठीक और जरूरी थी। लेकिन अब ऐसी भावना रखनी मूर्खतापूर्ण होगी।’ यह मेरा नहीं उन वीर सावरकर का विचार है जिनके हिंदुत्व को आधार बना आज हम अपनी ही जड़ों में मट्ठा डालने का काम कर रहे हैं।

स्मरण रहे यदि आपको हिंदू होने पर गर्व है, तो आपको हिंदू कौन है भी जानना होगा। हिंदू जीवन जीने की, सबको समाहित कर, आगे बढ़ने की, कायर हिंसा से बचने, प्रतिक्रिया और प्रतिशोध जैसी बीमारियों से कोई वास्ता न रखने वाली शैली का, संस्कृति का नाम है। इसलिए आज जब धर्म के नाम पर विभाजन रेखाओं के मकड़जाल में हमें फंसाया जा चुका है। सत्तालोलुपता के शिखर पुरुषों की चालबाजियों से बाहर निकलने, इस चक्रव्यूह को तोड़ने की सबसे ज्यादा आवश्यकता है। यदि हम ऐसा कर पाने में विफल रहे तो याद रखिएगा हम न तो हिंदू हो सके हैं, न ही मनुष्य।

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