प्रिय अजय भट्ट जी,
 
पहले सोचा यह पत्रनुमा संपादकीय या संपादकीयनुमा पत्र आपकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जी अथवा प्रधानमंत्री मोदी जी को संबोधित कर लिखूं फिर अपनी लघुता का स्मरण हो आया। विश्व की सबसे विशाल पार्टी के अध्यक्ष तक भला हमारी क्या पहुंच, आप ही जब सांसद बनने के बाद इतने व्यस्त हो चले हों कि दूरभाष तक में वार्ता मुश्किल से हो पाए तो शाह जी  और मोदी जी तक पहुंचाना लगभग नामुमकिन है। इसलिए प्रिय अग्रज आप को अपनी आवाज पहुंचाने का विनम्र प्रयास कर रहा हूं। वैसे भी जो आप तक पहुंचाना चाहता हूं उसका रिश्ता देवभूमि से है इसलिए कृपया कुछ क्षण अपने व्यस्त शेड्यूल से निकाल इसे बांचिएगा जरूर। अपेक्षा और अनुरोध तो कर ही सकता हूं जैसा पिछले कई दिनों से आपके सहायक श्री गोविंद और श्री पवन से कर रहा हूं कि आपसे दूरभाष पर वार्ता करा दें। खैर…
अजय जी, आपको स्मरण होगा भारतीय जनता पार्टी और उसकी तीन धरोहर-‘अटल, आडवाणी और मुरली मनोहर’ हमेशा इसके चाल-चरित्र और चेहरे की बात कहा करते थे। जाहिर है 1980 में भाजपा भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे आदर्शों के साथ जन्मी जिनका क्षरण आपातकाल के दौरान कांग्रेस में होता देखा गया। यहां मैं उस उद्देश्य या लक्ष्य की बात नहीं कर रहा जो आपके संगठन के कोर या नींव में है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की हिन्दुत्व की अवधारणा को मूर्त रूप देने का आपका लक्ष्य एक अलहदा मुद्दा है जिस पर बहुत कुछ कहा जा चुका है, बहुत कुछ कहा-सुना और देखा जाना बाकी है। मैं आपसे देवभूमि उत्तराखण्ड, जो आपकी और मेरी जन्मभूमि भी है, के संदर्भ में कुछ कहना चाहता हूं। अजय जी, मैं बहुत व्यथित हो आपसे जानना चाहता हूं कि क्या कभी राजनीति की आपाधापी से कुछ क्षण विराम लेकर आपने यह सोचा है, चिंतन-मंथन किया है कि सत्ता पाने की जद्दोजहद में आप अपने साथ ऐसों को जोड़ रहे हैं जिनका चरित्र, जिनकी चाल और जिनका चलन किसी भी दृष्टि से आपकी पार्टी की घोषित आचरण नियमावली के अनुकूल नहीं?
उदाहरण राज्य में आपकी सरकार के मंत्री हरक सिंह रावत जी का ले सकते हैं। ‘जैनी प्रकरण’ शायद आपको तब याद नहीं रहा होगा जब कांग्रेस की हरीश रावत सरकार को येन-केन-प्रकारेण  गिराने में भाजपा लगी थी। आप  तब ना केवल प्रतिपक्ष के नेता बल्कि यदि मैं गलत नहीं हूं तो प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी थे। भट्ट जी, ये हरक सिंह वे ही हैं जिन्हें आपने पानी पी-पी कर कोसा था। जैनी स्वयं आपके समक्ष रोई थी, अपने ऊपर हुए अत्याचार को बताया था, जब आप विधानसभा की समिति के सदस्य बतौर उससे मिले थे। हालांकि आप कह सकते हैं कि हरक सिंह जी पर आरोप सिद्धू नहीं हुआ। यह सेफ डिफेंस आपके पास उपलब्ध है। ठीक वैसे ही जैसे आप अपने इन दिनों  के सखा विजय बहुगुणा जी के लिए कह सकते हैं। 2013 में आई भीषण आपदा के बाद आप पहले अकेले ऐसे नेता थे जो पैदल केदारधाम पहुंचे। आपने विजय बहुगुणा सरकार के झूठ का पर्दाफाश करते हुए भाजपा के दिल्ली स्थित मुख्यालय से स्वयं की खींची तस्वीरें जारी की थी जिसमें चारों तरफ लाशों का ढे़र यहां- वहां बिखरा स्पष्ट नजर आ रहा था। आपने तब बहुगुणा जी के इन दावों को बेनकाब करने का काम किया कि मृतकों के शवों का अंतिम संस्कार और डीएनए करा दिया गया है। शायद आप भूल गए हों, लेकिन मुझे याद है कि आप कितने आक्रोशित थे बहुगुणा सरकार के झूठ पर। मुझे यह भी स्मरण है कि मैंने कितना आपको सराहा था और आप पर गर्व हुआ था कि कोई तो ऐसा है, वह भी आपने रानीखेत का, जो राज्य के लिए अपने प्राण तक जोखिम में डाल सकता है। मेरे अग्रज, कृपया थोड़ा चिंतन करें कि कैसे आज यही बहुगुणा जी आपके इतने करीब हो गए। क्या आपने इन पर जो भ्रष्टाचार के, काहिली के आरोप लगाए थे, वे झूठे और राजनीति से प्रेरित थे या फिर गंगा रूपी भाजपा में स्नान करने के बाद से धुल गए हैं? इस पर चिंतन करते समय केदारनाथ की त्रासदी को जेहन में अवश्य रखियेगा। हरीश रावत की सरकार पर आपके तेवर सबसे आक्रमक रहते थे। आप गिरधारी लाल साहू सरीखे अपराधियों की तत्कालीन सीएम संग निकटता पर यदा-कदा अफसोस-क्रोध प्रकट करते थे। आपसे प्रेरणा लेकर जब हमने साहू के काले कारनामे और उनकी पत्नी की बेनामी संपत्ति पर प्रहार किया तो बजाए उनके खिलाफ मुखर होने के, आपने उन्हें भाजपा में शरण दे डाली। आज रेखा जी आपकी सरकार में मंत्री हैं और साहू जी सुपर पावरफुल। शायद बात यहीं तक सीमित रहती तो आपके संग अपने निजी संबंधों के चलते मैं संकोचवश चुप रहता। लेकिन बात बहुत आगे बढ़ आपकी पार्टी के राज में हम पर प्राणघातक हमलों तक आ पहुंची है। हमारे राज्य प्रभारी दिव्य सिंह रावत की हत्या के उद्देश्य से सुपारी किलर्स हल्द्वानी पहुंचते हैं, गोली भी चलती है जो दिव्य सिंह के धोखे में हमारे सहयोगी मनोज बोरा को मारी जाती है। आप पूरे प्रकरण से अच्छी तरह वाकिफ होंगे ही क्योंकि लोकसभा चुनावों के दौरान हुए इस गोलीकांड की गूंज पूरे राज्य में सुनी गई। घायल मनोज बोरा से मिलने कई राजनेता अस्पताल पहुंचे जिनमें आपके खिलाफ चुनाव लड़ रहे कांग्रेस प्रत्याशी व पूर्व सीएम हरीश रावत, नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश भी पहुंचीं। शहर के प्रथम पुरुष भाजपा नेता यानी मेयर डॉ. जोगेन्द्र रौतेला और रेणू अधिकारी भी आईं, लेकिन एक घायल पत्रकार, वह भी उस अखबार का पत्रकार जिसके जन सरोकारी तेवरों के आप घोषित तौर पर प्रशंसक रहे हैं, की मिजाजपुर्सी के लिए आप नहीं पहुंचे। मुझे याद नहीं पड़ता कि आपने इस घटना की निंदा तक की हो।
गजब भाई साहब गजब। आपको रानीखेत विधानसभा से विश्वासघात कर हराने वाले भाजपा कार्यकर्ता प्रमोद नैनवाल की इस गोलीकांड में संलिप्तता रही। उसके भाई सतीश नैनवाल को पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए सुपारी किलर्स ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष इकबालिया बयान में मुख्य साजिशकर्ता बताया, लेकिन आप खामोश रहे। खामोश ही नहीं बल्कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष होने के बावजूद आपने प्रमोद नैनवाल की पार्टी में वापसी होने दी। होंगे आपके पास लाख कारण, सच यही है कि आपकी पार्टी और सरकार एक फरार अपराधी सतीश नैनवाल को पूरी तरह न्यायिक दृष्टि से संरक्षण देने में जुटी रही। हालात इतने खराब कि जिस मामले में अपराधी वांछित हो, गैरजमानती वारंट जारी हो चुका हो, उसे नैनीताल पुलिस गिरफ्तार नहीं कर रही। आपको हराने के खेल का खलनायक आपकी पार्टी में वापसी कर इतना सक्षम हो गया है कि उसने मामले को दबाने के लिए सीएम कार्यालय की मदद से प्रकरण को सीबीसीआईडी के पास भिजवा डाला है। अब सतीश नैनवाल हल्द्वानी शहर में खुलेआम रहा है। गैरजमानती वारंट होने के बावजूद।
सोचिएगा अवश्य मान्यवर कि क्या इसी चाल-चरित्र और चेहरे की बात आपकी तीन धरोहर करते थे? और इतना ही काफी नहीं था कि आपके ‘शूरवीर’ विधायक कुंवर प्रणव चैंपियन का एक अद्भुत वीडियो सामने आ गया। देवभूमि की बाबत उनके ‘उच्च स्तरीय’ विचार आपने भी इस वीडियो के जरिए सुने होंगे। इससे पूर्व भी यह माननीय अपनी उदंडता और गैर जिम्मेदाराना व्यवहार के चलते खासी प्रसिद्धि पा चुके हैं। कुछ अर्सा पहले ही आपने इन्हें तीन माह के लिए निलंबित किया था। तब ये एक पत्रकार संग मार-पीट पर उतारू थे। भट्ट जी जब रावत सरकार को गिराने के लिए पूरी राज्य भाजपा जुटी थी जब यह माननीय भी उसी पैकेज का हिस्सा थे जो विजय बहुगुणा जी संग आपका हुआ था। चिंतन अवश्य कीजिएगा कि ऐसे ‘शूरवीरों’ को आश्रय दे यदि आप सत्ता पा भी गए लेकिन कितनी भारी कीमत पर। मेरे आपसे बेहद निजी, पारिवारिक और प्रगाढ़ संबंध हैं। आप हमेशा मेरे सुख-दुख में साथ रहते आए हैं। इसके बावजूद यदि मैं आपको यह पत्र लिखने को मजबूर हुआ हूं तो अवश्य ही आप समझने का प्रयास करेंगे कि क्या वाकई आपके और आपकी सरकार के नेतृत्व में देवभूमि की शासन व्यवस्था रामराज्य की आपकी परिकल्पना की मूर्त रूप देने की दिशा में अग्रसर है या फिर सत्ता पाने के लिए रामराज्य का सपना जनता को दिखाया गया छलावा मात्र।
सादर आपका­­­

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