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हाईकोर्ट में 1,078 पुरुष और केवल 81 महिला न्यायाधीश! 

न सड़ी, न गली एक लाश किसी निर्जन नगरी के प्रासाद में पड़ी थी। लाश के रोम-रोम में सूइयां गाड़ी हुई थीं। उन सूइयों को जैसे-जैसे हटाया गया, वैसे-ही-वैसे लाश में चेतना आने लगी। जिस वक्त आंगड़ी सूइयों को निकाल दिया गया, उस वक्त लाश बिलकुल सजीव हो उठ बैठी और बोली ”बहुत सोये।” आज भी नारी का रोम-रोम परतंत्रता की सूइयों से बिंधा हुआ है, जिन्हें पुरुषों के हाथों ने गाड़ा है। किसी को आशा नहीं रखनी चाहिए कि पुरुष उन सूइयों को निकाल देगा।” भारतीय साहित्य में ‘महापंडित’ के नाम से विख्यात राहुल सांकृत्यायन की ये पक्तियां आज के संदर्भ में बेहद सटीक जान पड़ती हैं।

सच्चाई यही है कि उस समय स्‍त्री की देह पर मर्दवाद की जितनी सूइयां बिंधी हुई थीं, उससे थोड़ी ही कम अब हैं और ये सारी सूइयां स्त्रियों को खुद ही निकालनी होंगी।

आज विश्व के हर कोने में महिलाएं अपनी प्रतिभा के कारण अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब हुई हैं। जहाज उड़ाना हो या दुश्मन सेना को देश से बाहर खदेड़ना हो किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से महिलाएं पीछे नहीं हैं। लेकिन जब देश में न्याय मांगने या देने की बात आती है तो पिछड़ जाती है भारत की बेटियां। तब बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं जैसे नारों का अर्थ विहीन नजर आने लगता है।

 

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अब महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सभी क्षेत्रों में आगे आ रही हैं, लेकिन बावजूद इसके तस्वीर यह है कि महिलाओं को देश की न्यायपालिका में बराबरी का प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट की महिला वकील एसोसिएशन ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, ख़ासकर देश के हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के मामले में।

 

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस रोहिंटन फली नरिमन द्वारा भी उम्मीद जताई कि देश को पहली महिला मुख्य न्यायाधीश मिलने में ज्यादा समय नहीं रह गया है। दरअसल, नरिमन द्वारा 26वें जस्टिस सुनंदा भंडारे मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए कहा गया कि एक महिला भारत की राष्ट्रपति रह चुकी हैं। पहली महिला प्रधानमंत्री भी रहीं, लेकिन बड़े दुर्भाग्य की बात है कि अभी तक भारत में पहली महिला मुख्य न्यायाधीश नहीं हुई हैं। हम आज देख सकते हैं कि जस्टिस सुनंदा में देश की पहली मुख्य न्यायाधीश होने की काबलियत थीं।

 

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इतिहास की महान महिलाओं के विषय पर उन्होंने कहा कि चूंकि न्यायपालिका 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आई थी, इसलिए अगले मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना सहित 48 मुख्य न्यायाधीशों में से एक भी महिला नहीं है। वर्ष 1950 से 2020 तक उच्चतम न्यायालय के कुल 247 न्यायाधीशों में से केवल आठ महिलाएँ हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश वी रामसुब्रमण्यन और पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी लोकुर भी शुक्रवार को इस कार्यक्रम में उपस्थित थे।
आंकड़े क्या कहते हैं?

आंकड़े बताते हैं कि देश की न्यायपालिका में पुरुष न्यायाधीशों की तुलना में बहुत कम महिला न्यायाधीश हैं। इसलिए महिला अधिवक्ताओं के संघ ने न्यायपालिका के दरवाजे पर दस्तक दी है।  याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में योग्य महिला वकीलों पर भी विचार किया जाना चाहिए। याचिका की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि अब समय आ गया है कि एक महिला मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्याय करे। ”केवल हाई कोर्ट में ही क्यों? भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश क्यों नहीं? क्यों नहीं अभी ये हो सकता है? कॉलेजियम हमेशा प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर चर्चा करता है।”

 

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इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, वर्तमान में देश में 25 उच्च न्यायालय हैं। हालांकि, केवल 81 महिला न्यायाधीश हैं। दूसरी ओर पुरुष न्यायाधीशों की संख्या 1,078 है। सुप्रीम कोर्ट की माने तो देश के सुप्रीम कोर्ट में कुल 28 पुरुष जजों में से केवल एक महिला जज है। महिला अधिवक्ताओं के संघ ने अंतर को इंगित करते हुए याचिका दायर की है।

उच्च न्यायालय में 661 न्यायाधीशों में केवल 70 महिलाएं

एसोसिएशन ने कहा कि उच्च न्यायालय में स्थायी और अतिरिक्त न्यायाधीशों की स्वीकृत क्षमता 1,080 है। वर्तमान में इसमें 661 न्यायाधीश हैं, जिनमें से केवल 70 (11.04 प्रतिशत) महिला न्यायाधीश हैं। याचिका में कहा गया कि 25 उच्च न्यायालयों में से 5 उच्च न्यायालय मणिपुर, मेघालय, पटना, त्रिपुरा और उत्तराखंड में एक भी महिला न्यायाधीश नहीं है। याचिका में बड़ी संख्या में लंबित मामलों को देखते हुए अस्थायी न्यायाधीशों की नियुक्ति की मांग की गई है।

 

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“महिलाओं का इनकार”

याचिका की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश शरद बोबड़े ने कुछ टिप्पणियों को दर्ज किया। न्यायमूर्ति शरद बोबड़े ने कहा ,उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि “जब महिला अधिवक्ताओं से न्यायाधीश के पद के बारे में पूछा जाता है, तो वे मना कर देती हैं। कारण दिया जाता है घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ। ”

देश के अन्य हिस्सों में अब भी महिलाएं समान अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। तो वहीं यह तस्वीर भी उभर रही है कि महिलाओं को देश की न्यायपालिका में समान अधिकारों के लिए भी स्वयं ही लड़ना होगा।

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