[gtranslate]
Country Poltics

क्या ‘कपड़े उतारे बगैर यौन मंशा से शरीर को छूने’ को यौन उत्पीड़न नहीं माना जायेगा ?

वर्ष 2012 में निर्भया के बलात्कार के बाद पीड़ितों के हितों को ध्यान में रखते हुए कई कानूनों की प्रक्रियाओं में सुधार किये गए और ऐसी न्याय प्रणाली का वातावरण बनाया गया जहां पीड़िता के साथ किसी भी तरह का भेदभाव न हो और उत्पीड़न, रेप आदि के दंड और कड़े किए गए।

लेकिन हाल ही में एक मामले को लेकर बॉम्बे हाइकोर्ट की नागपुर बेंच की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला ने ऐसा फैसला सुनाया जिसके बाद क़ानून की जानकारी रखने वाले लोगों ने और नारीवादी एक्टिविस्ट्स ने खासकर सोशल मीडिया पर अपनी आपत्ति जताई और पुष्पा गनेडीवाला के कथन का जमकर विरोध किया जाने लगा।

दरअसल बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला ने अपने उस फ़ैसले में लिखा, “सिर्फ वक्षस्थल को जबरन छूना मात्र यौन उत्पीड़न नहीं माना जाएगा, इसके लिए यौन मंशा के साथ स्किन टू स्किन कॉन्टेक्ट होना ज़रूरी है।”

 

सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई हाई कोर्ट की नागपुर बेंच के फ़ैसले पर लगाई रोक

 

फै़सले में यौन उत्पीड़न को परिभाषित करते हुए कहा गया कि वक्षस्थल को जबरन छू लेने मात्र को यौन उत्पीड़न की संज्ञा नहीं दी जा सकती। हालाँकि अब सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई हाई कोर्ट की नागपुर बेंच के उस फ़ैसले पर रोक लगा दी है जिसमें एक अभियुक्त को यौन उत्पीड़न के अपराध से इसलिए बरी कर दिया गया क्योंकि बेंच ने ‘कपड़े उतारे बगैर शरीर को छूने’ को यौन उत्पीड़न नहीं माना था।

भारत के एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों के लिए, “हाई कोर्ट का ये फ़ैसला परेशान करनेवाला है, और ग़लत उदाहरण तय करता है।”

 

क्या है पूरा मामला ?

 

ये मामला सबसे पहले निचली अदालत में सुना गया।  सुनवाई में 39 वर्षीय आदमी को 12 साल की लड़की के यौन उत्पीड़न का दोषी पाया गया और सज़ा सुनाई गयी।  नागपुर सत्र न्यायालय ने आईपीसी सेक्शन 354 के तहत व्यक्ति को एक साल की और पोक्सो के तहत तीन साल की सज़ा सुनाई थी।  ये दोनों सजा एक साथ दी जानी थी।  लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद तीन साल की सजा वाला फ़ैसला अब निष्क्रिय हो गया। जोकि पूर्णता ऐसे मामलों को बढ़ावा देने की ओर एक बढ़ते कदम की तरह है।

ये तीन साल की न्यूनतम सज़ा वाले पॉक्सो क़ानून के सेक्शन सात के तहत यौन उत्पीड़न है या एक साल की न्यूनतम सज़ा वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत ‘महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से किया हमला’ है इस पर फैसला होना था पर हाईकोर्ट ने इसे यौन उत्पीड़न नहीं माना और कपड़े न हटाए जाने की बिनाह पर एक निचली अदालत के फ़ैसले में दी गई सज़ा कम कर एक साल तय कर दी।

 

न्यायपालिका की ज़िम्मेदारी होती है क़ानून को सुधारवादी रवैये से लागू करना

 

लेकिन यौन हिंसा के ख़िलाफ़ बने क़ानूनों में उत्पीड़न तय करने के लिए कपड़ों के उतारे जाने या शरीर के शरीर से छूने की कोई शर्त का उल्लेख नहीं है ऐसे में अटार्नी जनरल ने इसमें हस्तक्षेप करने का सही निर्णय लिया है। क्योंकि हर कोई हाईकोर्ट के फैसले से हैरान था। खास तौर पर इसलिए क्योंकि न्यायपालिका की ज़िम्मेदारी होती है क़ानून को सुधारवादी रवैये से लागू करना जो इस केस में बिल्कुल नहीं हुआ।

क़ानून, अपराध तय करने के लिए कपड़ों के होने या न होने को ज़रूरी नहीं मानता, बल्कि यौन हिंसा की मंशा को तवज्जो देता है। तो जो क़ानून में है ही नहीं उसे फ़ैसले की बुनियाद बनाना पीड़िता के लिए बहुत ही नकारात्मक कदम है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के मुताबिक, “अगर कोई व्यक्ति ज़बरदस्ती एक महिला पर उसकी लज्जा भंग करने के इरादे से हमला करे तो उसे न्यूनतम एक साल और अधिकतम पाँच साल की सज़ा दी जा सकती है।”

 

‘पोक्सो एक्ट’ के तहत कौन-कौन सा प्रावधान है ?

 

पॉक्सो क़ानून बच्चों के हित को सबसे ऊपर रखने के इरादे से लाया गया था और ये उसके दिशा-निर्देश में साफ़ लिखा भी गया है। पॉक्सो क़ानून की धारा सात के मुताबिक, “अगर कोई व्यक्ति यौन मंशा से बच्चे के गुप्तांगों या छाती को छूता है, या बच्चे को अपने या किसी और व्यक्ति के गुप्तांगों या छाती को यौन मंशा से छूने पर मजबूर करता है, या कोई और ऐसा काम करता है जिसमें पेनिट्रेशन के बिना किसी तरीके का शारीरिक संबंध बनाया जाए, तो उसे यौन उत्पीड़न का दोषी माना जायेगा।”

 

POCSO (प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड फ्रॉम सेक्सुअल ओफ्फेंसेस एक्ट) 

 

वर्ष 2012 में पारित किया गया POCSO(प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड फ्रॉम सेक्सुअल ओफ्फेंसेस एक्ट) क़ानून ख़ास नाबालिगों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के अपराधों की परिभाषा, न्यायिक प्रक्रिया और दंड तय करता है। पॉक्सो क़ानून की धारा 42 के मुताबिक अगर कोई यौन अपराध बच्चे के खिलाफ़ हो और पॉक्सो क़ानून में पहले के क़ानूनों से कोई अलग बात हो तो पॉक्सो के प्रावधानों को ही मान्य माना जायेगा।

लेकिन इस मामले में मुंबई हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने पॉक्सो की जगह आईपीसी की धारा 354 को इस्तेमाल करना सही समझा और अपराध को यौन उत्पीड़न मानने से इनकार कर दिया।

अहम सवाल यह है कि इस मामले में बॉम्बे हाइकोर्ट का जो फैसला आया है क्या उससे यह जाहिर नहीं होता है कि अपराधी की दृष्टि को तरजीह दी गयी है ? 

फैसले में दी गई जानकारी के मुताबिक अभियुक्त ने खुद से 25 साल छोटी लड़की को बहलाया और एक कमरे में ले गया।  उसके कपड़े उतारे बगैर उसकी छाती छूने की कोशिश की और सलवार उतारने के लिए बढ़ा। पीड़िता के चिल्लाने पर अपने हाथ से उसका मुंह भींचा और फिर कमरा बाहर से बंद कर दिया। बेटी की चीखें सुन कर मां उसे ढूंढने लगीं और उस कमरे तक पहुंच उसे आज़ाद करवाने में कामयाब हुई।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी है साथ ही  महाराष्ट्र सरकार को नोटिस भी जारी किया है।  एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा है कि,’वो हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ 28 जनवरी 2021 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर करेंगे।

You may also like

MERA DDDD DDD DD