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गांव-गांव पहुंची महामारी : चौतरफा हाहाकार और चीत्कार

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस धीरे-धीरे अपने पैर पसारती जा रही है। अब ऐसा माना जा रहा है की अब कोरोना वायरस शहर को छोड़ गांवो की तरफ बढ़ता जा रहा है। अब ये फिक्र बढ़ती ही जा रही है।

गौरतलब है कि नीचे की तरफ जाता कोरोना का ग्राफ एक बार फिर ऊपर चढ़ गया है। 11 मई को देश में 3 लाख 48 हजार 555 नए केस आए थे। परन्तु यहां अच्छी बात तो यह है कि लगातार नए मरीजों के आने से ज्यादा तो पुराने मरीज ठीक हुए हैं।

देश में 11 मई को 3 लाख 55 हजार 398 कोरोना के मरीज ठीक हुए। परन्तु प्रतिदिन कोरोना केस का अध्ययन करने पर यह पता चलता है कि शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना काफी तेज़ी से फैल रहा है। जिसके कारण फायदे के साथ-साथ नुकसान भी है इससे शहरों में तो केस कम हो रहे हैं परन्तु गांवों और कस्बों में अब भी बढ़ रहे हैं।

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अब हम आपको कुछ आंकड़ों के जरिए अच्छी तरह से समझाते हैं कि किन-किन राज्यों के गांवों में कोरोना केस अधिक हैं। किन राज्यों के गांवों में अभी भी केसो की रफ़्तार रुकने का नाम नहीं ले रहीं है। सबसे पहले हम उन राज्यों की बात करते है जहां कोरोना केस पिछले महीने के मुकाबले काफी अधिक है। 9 अप्रैल को महाराष्ट्र में जो नए केस आए थे, उनमें से 32 फीसदी केस गांवों से आए थे और 68 प्रतिशत केस शहरों के थे।

परन्तु ठीक एक महीने पश्चात् 9 मई को महाराष्ट्र में जितने भी कोरोना मरीजों की पुष्टि की गई, उनमें से 56 प्रतिशत केस गांवों के थे। तो वहीं अब हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां 9 अप्रैल को 49 प्रतिशत कोरोना केस गांवों के थे। परन्तु 9 मई को यह संख्या बढ़कर 76 फीसदी हो गई। यानी की 9 मई को 76 फीसदी केस गांवो के थे। इसी प्रकार आंध्र प्रदेश में 9 अप्रैल को 53 फीसदी केस गांवों से आए थे।

परन्तु 9 मई को 72 फीसदी केस गांवों के आए और शहर के सिर्फ 28 प्रतिशत केस ही थे। अगर हम राजस्थान की बात करे तो 9 अप्रैल और 9 मई के ग्रामीण आंकड़े के बीच केवल 5 फीसदी का फर्क ही दिखाई दे रहा है।

तो वहीं हरियाणा में 9 अप्रैल की तुलना में 9 मई को गांवों से आने वाले कोरोना के केस में केवल 6 फीसदी की बढ़ोतरी होती दिखाई दे रही है। लगातार शहरों से केस कम होते दिखाई दे रहे।

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तो अब छत्तीसगढ़ की बात करते हैं। यहां पर एक महीने में गांवो से आने वाले केस में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। यहां 9 अप्रैल को 56 प्रतिशत केस गांवों से आए थे। लेकिन 9 मई को यहां 89 फीसदी ग्रामीण मरीजों की पुष्टि हुई।

तो वहीं मध्य प्रदेश में भी 9 अप्रैल की तुलना में 9 मई को गांवों से आने वाले केस में 6 फीसदी की ही बढ़ोतरी देखी गई और शहरों में भी इतनी ही गिरावट देखी गई।

बिहार में भी अप्रैल महीने के मुकाबले मई महीने में गांवों में कोरोना मरीजों की संख्या बढ़ी है। यहां 9 अप्रैल को आए केस में 53 फीसदी मरीज गांवों के थे। परन्तु एक महीने बाद डेली केस में इनकी भागीदारी बढ़कर 76 फीसदी हो गई।

झारखंड में 9 अप्रैल को जो नए कोरोना केस आए उनमें से करीब एक तिहाई केस गांवों से थे। परन्तु 9 मई को गांवो से 54 फीसदी केस आए। जम्मू कश्मीर में एक महीने में डेली केस में गांवों की भागीदारी कुल 20 फीसदी बढ़ी है। हिमाचल प्रदेश में भी 9 अप्रैल की तुलना में 9 मई को गांवों से आने वाले कोरोना केसो में 6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

इन राज्यों में डेली केसो की रफ़्तार है तेज

अब उन राज्यों की बात करते हैं, जहां कोरोना के डेली केस ज्यादा तेज गति से बढ़ रहे हैं। कर्नाटक में 9 अप्रैल को कोरोना के 25 फीसदी केस ग्रामीण इलाके से आते है जबकि एक महीना बाद 9 मई को यह बढ़कर 44 फीसदी हो गए। पश्चिम बंगाल में 9 अप्रैल को 35% कोरोना पॉजिटिव मरीज गांव के थे। तो वहीं 9 मई को ये आकंडा बढ़कर 47 प्रतिशत तक पहुंच गया।

तमिलनाडु में 9 अप्रैल को ग्रामीण इलाकों के 42% कोरोना मरीज थे। जबकि 9 मई के आते-आते ये आंकडा 49% तक पहुंच गया। पंजाब में 9 अप्रैल को 100 में से 40 मरीज ग्रामीण इलाकों से थे, जबकि 9 मई को यह आंकडा 49 पर पहुंच गया। गुजरात में भी 9 अप्रैल को 28 प्रतिशत केस गांवों के थे। जो 9 मई के आते-आते 31 प्रतिशत तक पहुंच गया।

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ऐसे ही उत्तराखंड में 9 अप्रैल को आए केस में से 9% गांवों के थे। जो 9 मई के आते-आते 41 प्रतिशत तक पहुंच गया। आंकड़ों के जरिए आपने देखा कि गांवों में कोरोना की रफ़्तार थमने का नाम ही नहीं ले रही है। अब हम आपको तस्वीरों के जरिए भी वहां का हाल दिखाते हैं। 20 दिन में इस गांव के अंदर 26 लोगों की मौत हुई। यह तस्वीर ग्रेटर नोएडा के खैरपुर गुर्जर गांव की है।

पिछले 20 दिन में इस गांव में 26 लोगों की मौत हो चुकी है। हालात यह है कि दस दिन के अंदर एक ही परिवार ने अपने 2 जवान बेटों को खो दिया है। लेकिन अभी तक इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। जबकि यहां कोरोना के लक्षण आम दिख रहे हैं। यहां जिन लोगों की मौत हुई उनमें से कई लोगों को तेज बुखार और सीने में दर्द था।

लेकिन अब यहां सवाल यह उठता है कि, यदि मरीज संक्रमित थे तो उनका टेस्ट क्यों नहीं कराया गया? तो इसका जवाब यह है कि, देश की राजधानी दिल्ली से महज 40 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में कोई भी डॉक्टर मौजूद नहीं है। जो जागरूक हैं, वो तो नोएडा या दिल्ली जाकर अपना इलाज करवा रहे हैं, परन्तु खैरपुर गुर्जर और उसके आसपास के तमाम गांव के लोग सुविधा के अभाव में घर में ही ठीक होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

अगली भयवाह स्थिति है नोएडा के जेवर की। जिसे देख कर इलाज के आभाव का साफ़ साफ़ पता चल रहा है। यहां के पब्लिक हेल्थकेयर को देखिए और समझिए की यहां क्या हालात है। अब हम आपको गाजियाबाद के भूपखेड़ी गांव की स्थिति भी कुछ ऐसी है। गाजियाबाद शहर से इस गांव की दूरी केवल 30 किलोमीटर की है। यहां पिछले 10-12 दिनों में कुल 15 लोगों की जान गई है।

गांव-गांव पहुंची महामारी, चौतरफा हाहाकार

परन्तु अभी तक इस गांव में स्वास्थ्य विभाग की कोई भी टीम नहीं पहुंची। कोरोना की दहशत के कारण लोगों ने खुद को अपने घरों में ही कैद कर लिया। जो लोग बीमार हैं, वो भी घरों में ही इलाज करवा रहे हैं। भूपखेड़ी गांव के लोगो के लिए दिक्कत ये है कि, यहां कोई भी अस्पताल की सुविधा उपलब्ध नहीं है।

अगर यह शहर में इलाज के लिए जाते भी हैं, तो इन्हें अस्पताल में दाखिला ही नहीं मिलता। अब आप ही सोचिए जिस गांव में हर घर में कोरोना का मरीज हो और इलाज की कोई सुविधा उपलब्ध ही न हो वहां के हालात कैसे होंगे? एक समस्या ये भी है, कि भूपखेड़ी गांव के आसपास कहीं भी वैक्सीनेशन सेंटर भी उपलब्ध नहीं हैं।

अगर घरों में जाकर वैक्सीन लगाई भी जाए तो यहां के अधिकतर लोगो के पास स्मार्ट फ़ोन ही नहीं है तो अगर रजिस्ट्रेशन करे तो कैसे करे। अब हम आपको बुलंदशहर के परवाना की तस्वीर दिखाते है। यहां पिछले 45 दिन में 28 से ज्यादा लोग अपनी जान गवां चुके है। लेकिन यह किसी को मालूम नहीं की जिन लोगों की मौत हुई उन्हें कोरोना था या नहीं।

यह तो वो गांव थे जो देश की राजधानी के बेहद करीब है या महज 100 किलोमीटर की दूरी पर हैं। परन्तु अब हम आपको दूसरे राज्यों के गांवों का हाल दिखाते हैं। यहां लोगो को सरकारी अस्पतालों में इलाज का अभाव और प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी का सामना करना पड़ रहा है।

ये बाड़मेर के जिला अस्पताल की तस्वीर है जहां एक ही बेड पर दो-दो तीन-तीन मरीजों को रख रखा हैं। बुखार से तपड़ते मरीजों से अस्पताल भरा पड़ा है। इस अस्पताल में करीब 70 फीसदी मरीज तो गांवों के हैं। क्योंकि बाड़मेर में 2000 गांवों पर कोरोना अपना कहर बरपा चुका है। व्यवस्था केवल बाड़मेर में ही खराब नहीं हुई है, इसी सूबे के झालावाड़ जिले में भी स्थिति भयावह है।

एक शख्स तड़प रहा है। दो महिलाएं उसके सीने पर मालिश कर रही हैं और दूसरे परिजन खुद ऑक्सीजन लगाने की कोशिश में लगे हैं। यह देखकर आप खुद अंदाजा लगा सकते है की इस महामारी ने कितना भयावह रूप ले लिया है। अब जरा देश के सबसे बड़े सूबे की तस्वीर देखिए। जहां गांवों में संक्रमण की मनो सुनामी ही आ गयी हो। ये रायबरेली का एक गांव हैं। पिछले 40 दिनों में एक ही परिवार के 4 लोग अपनी जान गवां चुके है। मरने वालों में तीन सगे भाई हैं।

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अब मरीजों से इलाज के लिए काफी रकम तो वसूली जा रही हैं, परन्तु इलाज का अभाव है। जिसके विरोध में मरीजों के रिश्तेदार और बीजेपी के नेता अनिश्चितकाल के लिए धरने पर बैठ गए है।

गांवों में कोरोना की रफ़्तार थमने का नाम ही नहीं ले रही है और एंबुलेंस के कर्मचारी ड्यूटी को सूली पर टांगकर अपनी मनमानी कर रहे हैं। यहां खुर्द गांव में एक आदमी काफी बीमार है, उसकी पत्नी ने एंबुलेंस को फोन किया। एंबुलेंस तो आईं। परन्तु कोरोना रिपोर्ट न होने पर मरीज को ले जाने से साफ़ इनकार कर दिया। फिर SDM के दखल के बाद उसे भर्ती कराया गया। यूपी के जौनपुर के गांव पिछलिका में अब तक 30 दिनों में 25 लोग मर चुके हैं। गांव में लोग एक-दूसरे के घर आन-जाना बंद कर चुके हैं। चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ है।

देश में महामारी की विकराल स्थिति ने अब लोगों के हौसले को तोड़ दिया है कोई अपनों की मौत में टूट चुका है तो कोई अब भी उम्मीद में हैं कि शायद उसका परिजन जल्दी ठीक हो जाएगा। कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने देश की बदहाल हालत और शासन प्रशासन की सच्चाई सबके सामने ला दी है। पहले ही देश में लोग ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ रहे हैं तो अब सरकार के पास वैक्सीन भी उपलब्ध नहीं है।

कोरोना की पहली लहर थी तब विश्व के कई देशों लॉकडाउन करके पूरा ध्यान हेल्थ सिस्टम को मजबूत करने में लगा दिया। लेकिन भारत में तो मान लिया गया कि हमारे यहां दूसरी लहर ही नहीं आने वाली है। इसी सोच का नतीजा है कि आज हमारा देश कोरोना की दूसरी लहर की ऐसी चपेट में है कि कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में वैक्सीन ही एकमात्र ब्रह्मास्त्र साबित हो सकती है। देश में ऑक्सीजन नहीं था और अब वैक्सीन भी नहीं है।

भारत का स्वास्थ्य सिस्टम कोरोना मरीजों को इलाज देने में विफल साबित हो रहा है। बिस्तर, ऑक्सीजन व जरूरी दवाओं के लिए मची मारामारी के बीच अब कोरोना से बचाव के लिए वैक्सीन भी खत्म हो चुकी है।

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हालात इतने खराब हैं कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार आपस में इस बात पर केवल बयान बाजी करने में आगे हैं। न केंद्र सरकार के पास कोई जवाब है न राज्य सरकार के पास। एक मई से पूरे देश में 18 वर्ष से अधिक आयु के लोगों का टीकाकरण शुरू करना था। लेकिन कोविन वेबसाइट क्रैश हो जाना, कोविड सेण्टर उपलब्ध न हो पाना ऐसी परेशानियां लोगों में डर पैदा करने लगी हैं।

देश में कोरोना वैक्सीन की तीव्र कमी को देखते हुए, कई राज्य अब वैक्सीन बनाने वाली विदेशी कंपनियों से सीधे खुराक खरीदने की तैयारी कर रहे हैं। तेलंगाना, दिल्ली और कर्नाटक सहित कई राज्यों का कहना है कि वे वैक्सीन खरीदने के लिए एक वैश्विक निविदा शुरू करने की योजना बना रहे हैं। महाराष्ट्र इस दिशा में पहल करने वाला पहला राज्य है। देश में 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए कोरोना वैक्सीन 1 मई से शुरू हुआ। लेकिन कई राज्यों में टीकों की भारी कमी है।

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