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रामदेव की साख पर सवाल, कोरोनिल दवाई पर दो राज्यों ने लगाई पाबंदी तीसरे ने भेजा नोटिस

कहते हैं कि कभी-कभी जल्दबाजी नुकसानदायक साबित होती है । योग गुरु बाबा रामदेव के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। दो दिन पहले उन्होंने कोरोना महामारी में महत्वपूर्ण बताई जा रही एक कोरोनिल दवाई को लॉन्च कर दिया। लॉन्च करने की हड़बड़ी इतनी ज्यादा थी कि बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण में केंद्र के आयुष मंत्रालय से इसकी स्वीकृति तक लेना उचित नहीं समझा।

जिसके चलते आयुष मंत्रालय ने पंतजलि की कोरोनिल दवाई को प्रचार प्रसार बैन कर दिया। यही नहीं बल्कि जिस प्रदेश उत्तराखंड में बाबा रामदेव यह दवाई निर्मित कर रहे हैं उसी में आयुर्वेद विभाग ने बाबा को यह कहकर कटघरे में खड़ा कर दिया कि उन्होंने इम्यूनिटी बूस्टर की दवाई का लाइसेंस लिया और कोरोना की दवाई पेश कर दी।

फिलहाल उत्तराखंड सरकार ने रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को नोटिस थमा दिया और 1 सप्ताह में इसका जवाब मांगा है। वहीं दूसरी तरफ जिस प्रदेश राजस्थान में बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण अपनी दवाई का मरीजों पर टेस्ट करना बताकर 100 प्रतिशत कोरोना बीमारी को सही करने का दावा कर रहे हैं उसी प्रदेश ने इस दवाई की बिक्री पर पाबंदी लगा दी है। और इसके साथ ही रामदेव और आचार्य बालकृष्ण पर मुकदमा दर्ज करने की चेतावनी दे दी है। इसके अलावा महाराष्ट्र सरकार ने भी रामदेव की बहुचर्चित दवाई पर पाबंदी लगा दी है।

इस तरह देखा जाए तो योग गुरु बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण दोनों की ही साख पर सवाल खड़े हो गए हैं। कोरोनिल दवाई के लांच करने के बाद पंतजलि की विश्वसनीयता भी कटघरे में है। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि यह वही बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण है जिन्होंने कभी एड्स की दवाई बनाई थी तो कभी पुत्र प्राप्ति का फॉर्मूला पेश किया था। लेकिन उस दिनों के बाद ही ना तो एड्स की दवाई बाजार में दिखाई दी और ना ही पुत्र प्राप्ति का फार्मूला। जिस तरह आज कोरोनिल दवाई पर विवाद के बादल छाए हुए हैं, इसी तरह पूर्व में एड्स की दवाई और पुत्र प्राप्ति का फार्मूला विवादों के घेरे में रहा।

पिछले ढाई दशक के इतिहास में यह पहला मौका है जब केंद्र सरकार के आयुष मंत्रालय ने बाबा रामदेव को लाल झंडी दिखाकर उनको मनमानी करने से रोक दिया। हालांकि, पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार को उनका विरोधी कहा जाता था। लेकिन फिलहाल कि अगर मोदी सरकार की बात करें तो यह सरकार बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण का सदैव समर्थन करती रही है।

लेकिन अब जब देश में कोरोना महामारी चरम पर है और इस बीमारी के इलाज के लिए दवाई इजाद करने के लिए तरह-तरह के रिसर्च हो रहे हैं। तो ऐसे में पतंजलि की कोरोनिल दवाई के लॉन्च होते ही आखिर केंद्र सरकार ने बाबा रामदेव की तरफ से नजर क्यों टेढ़ी की। यह एक सुलगता हुआ सवाल है। साथ ही यह मोदी और रामदेव के बीच की दूरी भी दर्शाता हुआ नजर आ रहा है ।

कहा जा रहा है कि रामदेव को मोदी सरकार पर पूर्ण भरोसा था कि वह उनकी कोरोना की दवाई के लॉन्च होते ही सरकार वाहवाही करेगी। लेकिन हुआ इसका उल्टा। चौंकाने वाली बात तो यह है कि जिस उत्तराखंड सरकार ने रामदेव के खिलाफ जमीन कब्जाने जैसे मामलों पर कोई एक्शन नहीं लिया गया वहीं सरकार अब रामदेव के लाइसेंस का सच उजागर कर रही है।

आयुर्वेद विभाग के उपनिदेशक बीएस रावत ने कल यह कहा कि उनसे तो इम्यूनिटी बूस्टर का लाइसेंस लिया गया था। जिसमें खांसी जुखाम आदि की दवाई बनाई जाती है। लेकिन उन्हें खबरों से पता चला की पतंजलि ने उनके लाइसेंस के नाम पर कोरोना की दवाई ही बना दी। फिलहाल उत्तराखंड के आयुर्वेदिक विभाग ने पतंजलि को नोटिस दिया है और 1 सप्ताह का समय दिया है। इस दौरान वह अपना पक्ष रख सकते है।