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सदमे में ब्रांड मोदी

इस वक्त भारत एक कठिन दौर से गुजर रहा है। देश में कोरोना की दूसरी लहर ने भयानक तबाही मचा रखी है। हर ओर चिताओं से शमशान अटे पड़े हैं। भारत में कोरोना वायरस से उत्पन्न हुआ संकट बेहद खतरनाक मोड़ पर है।  भारत में शवों का अंतिम संस्कार सार्वजनिक पार्कों में किया जा रहा है क्योंकि श्मशान में जगह खत्म हो चुकी है। नौबत ये आ चुकी है कि लोग घरों के पिछवाड़े में रिश्तेदारों को दफना रहे हैं जला रहे हैं।

हर तरफ मचे त्राहिमाम के बीच भले ही भारतीय मीडिया ऐसे तीखे सवाल करने से बचता हो लेकिन बीते कुछ दिनों से अंतरराष्ट्रीय मीडिया में मोदी की काफी किरकिरी हो रही है।

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आप को एक सक्षम प्रशासक के रूप में दुनिया के सामने रखा है। जो बड़ी से लेकर हर छोटी सी बात का भी ध्यान रखते हैं। लेकिन जब भारत में कोरोना महामारी से नए मामलों के रिकॉर्ड बनने लगे तो मोदी बुरी तरह नाकाम हो गए हैं।

राजनीतिक विश्लेषक मिलन वैष्णव कहते हैं कि मोदी की कार्य क्षमता ही उनकी पहचान थी तो अब लोग इस पर सवाल पूछने लगे हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार सिर्फ लडख़ड़ाई या अनुपस्थित दिखी, बल्कि बात ये है कि सरकार ने स्थिति और ज्यादा बदतर कर दी है। मोदी दुनिया के अकेले ऐसे नेता नहीं है जो कोरोना काल में नाकाम हुए हैं। लेकिन वैष्णव कहते हैं कि उन्होंने सबसे ज्यादा रिस्पेक्ट खोई है।

उनके पास चेतावनी के कई संकेत थे फिर भी जो हो रहा है उसे रोकने में वो विफल हो गए। हरिद्वार में उन्होंने कुम्भ मेला होने दिया। जिसमें लाखों लोगों ने हिस्सा लिया और गंगा में डुबकी लगाई। वहीं पश्चिम बंगाल में एक महीने तक चुनाव होते रहे और मोदी रैलियों में बिना मास्क के प्रचार करते रहे। उनकी इन रैलियों में लाखों की भीड़ जुटी जो कोरोना काल में नहीं होना चाहिए था।
भारत में द इकोनॉमिस्ट संवाददाता एलेक्स ट्रावेली का कहना है कि दुनिया की उस हिस्से में जहां हाल ही में लॉकडाउन लगाना पड़ा हो नजर अंदाजी और उल्लंघन का ये प्रदर्शन आश्चर्य जनक था । ये मोदी की ब्रांड इमेज का ज्वलंत स्मारक भी था हिन्दू बहुसंख्यक राष्ट्र के बहुचर्चित नेता मोदी ने जनवरी में ही दबोस में दिए एक भाषण में दावा किया था कि भारत ने कोरोना को शिकस्त दे दी है।
स्टेट यूनिवर्सिटी न्यूयोर्क में एक राजनीतिक विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफेसर क्रिस्टोफ़र क्लेरी कहती हैं कि विदेशी पर्यवेक्षक उनके राष्ट्रवादी आवेग को हमेशा उनकी टेक्नोक्रेटिक क्षमता से जोड़कर देखते थे लेकिन कोविड महामारी की इस लहर में उनकी ये क्षमता पूरी तरह नदारद है। प्रधानमंत्री की चर्चित नेता और बेहतरीन शासक की ब्रैंड छवि को तब झटका लगा था जब अचानक की गई नोटबंदी की घोषणा ने लाखों भारतीयों को कतार में ला खड़ा किया। उस समय मोदी की छवि को बड़ा झटका लगा था।
कोरोना महामारी को रोकने के लिए पिछले साल उन्होंने रातों-रात देशव्यापी लॉकडाउन लगा दिया था लेकिन इस दौरान भी बड़ी संख्या में भारतीय लोगों की नौकरी चली गई। लाखों लोगो को जान गंवानी पड़ी। भारत की अर्थव्यस्था अब भी लॉक डाउन के असर से उबर नहीं पाई है चाहे रातों रात नोट बंदी हो या लॉक डाउन प्रधानमंत्री मोदी हमेशा ऐसे सवालों से बचते रहे और कहते रहे कि उन्होंने जो किया वो भारत के भले के लिए किया।
लेकिन फॉरन पॉलिसी एडिटर एंड चीफ रवि अग्रवाल का मानना है कि अपनी ताजा गलती से अब उनका बच पाना असंभव है। अग्रवाल कहते हैं कि आप किसी के भाई की मौत पर उसे तर्क से नहीं समझा सकते। आप केवल जीडीपी के आंकड़ों पर तो स्पष्टीकरण दे सकते हैं। लेकिन किसी को तर्क से समझा नहीं सकते हैं।
भारतीयों को हमेशा से ऐसी उम्मीद रही है कि मोदी भले ही गलती कर दें लेकिन वो उनके बारे में सोचते हैं और उनके लिए काम करते हैं। लेकिन इस बार लोग मोदी के इरादों पर संदेह कर रहे हैं।

मोदी की छवि में दरार आ रही है ये दरार साफ़ तौर पर देखी जा सकती हैं। मोदी नाम का किला अब ढह रहा है।

 

साल 2012 में टाइम मैगज़ीन ने अपने कवर पर लिखा था मोदी का मतलब है बिज़नेस। 13 साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के बाद जब उन्होंने साल 2014 में पीएम पद के लिए दावेदारी पेश की तो इसे भारत की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के तौर पर देखा गया।

प्रधानमंत्री की जीवनी लिखने वाले पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय का कहना है कि गुजरात पर शासन करना तुलनात्मक रूप से आसान था और हम इससे प्रभावित हो गए। गुजरात के मध्यम वर्ग और अमीर मतदाताओं को नई सड़कों, नई बिजली लाइनों, कम नौकरशाही के हस्तक्षेप और बढ़ते निजी निवेश ने अपनी ओर खींचा। मुखोपाध्याय का कहना है कि कम आबादी वाले राज्य में इसे हासिल करना कोई बड़ी बात नहीं थी। एक बात यह भी है कि गुजरात का सामाजिक विकास सूचकांक अभी तक ख़राब श्रेणी  में है।

मोदी की केंद्र से ही देश को शासित करने की नेतृत्व करने की क्षमता पिछले साल से भरोसा दे रही थी लेकिन अब संकट के समय जिम्मेदारी राज्यों पर डाल देना उन्हें लोगों के सवालों के बीच खड़ा कर दे रही है। मोदी ने दूसरे देशों को कोरोना वैक्सीन देने की उदार रणनीति बनाई भारत ने दर्जनों देशों को वैक्सीन भेजी लेकिन अब यही नीति लापरवाही में उठाया गया कदम लग रही है।

क्योंकि भारत ने सबसे बड़े वैक्सीन निर्माता के तौर पर दुनिया में वैक्सीन उपलब्ध कराने में अब खुद को पीछे कर लिया है। इस निर्माता को इन्हीं बाहरी देशों से वैक्सीन बनाने के लिए फंडिंग मिली थी। मोदी के समर्थक उनके कट्टर समर्थक भी इस बात का समर्थन करते हैं लेकिन राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि मोदी इसकी वजह से संकट में समाधान के लिए विपक्ष से भी बात नहीं कर पा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने अंतर राष्ट्रीय तौर पर भी प्रभावशाली छवि गढ़ी है। लेकिन अब उनकी छवि दरकती नजर आ रही है।
एक अख़बार ने अपने शीर्षक में लिखा था कि वह भारत से बाहर अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में होते हैं। रवि अग्रवाल कहते हैं कि उन्होंने अपनी छवि को इस आक्रमकता के साथ गढ़ा था कि वह हाल के दशकों में भारत के सबसे अधिक दिखाई देने वाले नेता बन गए थे। उनके नेतृत्व में भारत को एक उभरती सुपर पावर के रूप में देखा जाने लगा था। रवि अग्रवाल कहते हैं कि लेकिन अब भारतीय ये देख कर निराश हैं कि कोरोना संकट में बांग्लादेश, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों ने भी भारत से अच्छा प्रदर्शन किया है। विदेशों में रह रहे भारतीयों भी शर्मनाक स्थिति का सामना कर रहे हैं। अपने जिस देश को वो सुपर पावर बनता देख रहे थे उसे अब मीडिया रिपोर्ट्स में इस तरह दिखाया जा रहा है।
ऐसे में सवाल सबके मन में उठता है कि क्या मोदी अपनी छवि सुधार पाएंगे। मोदी ने अब तक खुद को एक असाधारण नेता के तौर पर प्रदर्शित किया है जो हर परिस्थिति से उबर जाता है। सरकार भी अब डैमेज कंट्रोल में जुट गयी है। मीडिया में छप रही रिपोर्ट्स पर सरकार प्रतिक्रिया दे रही है। विपक्षी नेताओं से सार्वजनिक टक्कर ले रही हैं। सोशल मीडिया पर अपनी आलोचना करने वालों पर आक्रमण रवैया अपना रही है।
सरकार का कहना है कि विदेशी मीडिया में साजिश के तहत उनकी छवि धूमिल की जा रही है। लेकिन मोदी सामने आकर कुछ भी कहना नहीं चाहते हैं। लोगों के पास अनगिनत सवाल हैं और जवाब एक भी नहीं। इलाज के लिए भटकते लोगों से लेकर सेवा में लगे लोग और खुद मोदी भक्त भी ये नहीं समझ पा रहे हैं कि मोदी ने आखिर ऐसा होने क्यों दिया?

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