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अयोध्या मामला: क्या इतिहास रचेगी देश की सर्वोच्च अदालत

ब्रिटिश काल से चल रहा अयोध्या का केस में सर्वोच्च अदालत का फैसला आने के बाद 160 साल से भी ज्यादा पुराने समय से चल रहे इस ऐतिहासिक मुकदमे का समाधान हो जाने की उम्मीद है। पहली बार यह मामला ब्रिटिश काल में फैजाबाद के तत्कालीन कमिश्नर के सामने में 1855 में आया था। सुप्रीम कोर्ट में कल 16 अक्टूबर बुधवार को 40 दिन की बहस और दलीलों के साथ ही अयोध्या मामले में सुनवाई पूरी हो गई है । सुप्रीम कोर्ट इस मामले में 23 दिन में अपना फैसला सुनाएगा। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं और कहा जा रहा है कि उनके सेवानिवृत्त होने से पहले यह  अयोध्या मामले में फैसला आ जाएगा।

सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ अब दशकों पुराने इस मामले का फैसला सुनाएगी। उम्मीद जताई जा रही है कि इस मामले पर एक महीने के अंदर फैसला आ सकता है, हालांकि अदालत की ओर से फैसले की कोई तारीख निश्चित नहीं की गई है। दोनों पक्षों की ओर से अपील के दौरान जो गुहार लगाई गई है क्या इससे भी इतर आगे-पीछे क्या कुछ गुंजाइश बनती है? पक्षकारों को लिखित रूप में यह बताने के लिए कहा गया है। हालांकि यह देखने वाली बात होगी कि इस मामले में मोल्डिंग ऑफ रिलीफ सिद्धांत किस हद तक लागू किया जा सकता है। इसके अलावा पीठ ने सभी पक्षों से तीन दिनों के भीतर मोल्डिंग ऑफ रिलीफ पर अपना-अपना लिखित पक्ष पेश करने का निर्देश दिया है। पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि अब कोई मौखिक बहस नहीं होगी।

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने 17 नवंबर को सेवानिवृत्ति से पूर्व होने वाले अपने विदेश दौरे को रद्द कर दिया है। अयोध्या मामले की सुनवाई कर रही संविधान पीठ के अध्यक्ष सीजेआई गोगोई को दक्षिण अमेरिका के कुछ देशों, मध्यपूर्व सहित कुछ अन्य देशों की आधिकारिक यात्रा पर जाना था। सूत्रों के मुताबिक सीजेआई ने प्रस्तावित विदेश यात्राओं को अंतिम रूप मिलने से पहले इन्हें रद्द कर दिया। गोगोई ने पिछले साल तीन अक्तूबर को 46वें प्रधान न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी।

कब-कब हुई अयोध्या विवाद में सुलह-समझौते की कोशिश

40 दिनों तक चली अयोध्या मामले की सुनवाई इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि यह सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में केशवानंद भारती मामले के बाद दूसरी लंबी सुनवाई थी। केशवानंद मामले में 68 दिन चली जिरह के बाद सुप्रीम कोर्ट की 13 सदस्यीय पीठ ने 31 अक्तूबर, 1972 को फैसला सुनाया था।संविधान पीठ अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर बांटने के  इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुनवाई कर रही है। शीर्ष कोर्ट ने हाईकोर्ट के 30 सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ 14 अपीलों पर सुनवाई की।

अयोध्या मामले में गठित मध्यस्थता पैनल ने कल 16 अक्टूबर बुधवार को सीलबंद लिफाफे में दूसरी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी। सूत्रों के मुताबिक, मुस्लिम पक्ष ने प्रस्ताव दिया है कि विवादित स्थल पर मंदिर बनाने की से  इजाजत दी जा सकती है। इस बीच, पांच सदस्यीय संविधान पीठ के सदस्य आज 17 अक्टूबर बृहस्पतिवार को चैंबर में मिलेंगे। इस दौरान रिपोर्ट और इसे सार्वजनिक करने पर चर्चा हो सकती है।

दोनों पक्ष पूजास्थल कानून-1991 के तहत समझौते के लिए राजी हैं। इसके तहत ऐसे किसी मस्जिद या धर्मस्थल को लेकर कोई विवाद नहीं होगा जो 1947 से पूर्व मंदिर गिराकर बनाए गए हैं। इस कानून के दायरे में अयोध्या विवाद नहीं है।मुस्लिम पक्ष ने सुझाया कि सरकार विवादित जमीन का अधिग्रहण कर सकती है। बोर्ड एएसआई के अधिग्रहण वाली कुछ चुनिंदा मस्जिदों की सूची सौंप सकता है, जहां नमाज पढ़ी जा सके। सुन्नी बोर्ड के अध्यक्ष ने यह प्रस्ताव दिया है कि अगर राज्य सरकार अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए कोई और उचित जगह दे और पुरानी मस्जिदों का जीर्णोद्धार करवाए तो वह हिंदुओं को विवादित स्थल पर मंदिर बनाने की इजाजत दे सकते हैं।सुन्नी बोर्ड इस मामले में मुस्लिम पक्षकारों का प्रतिनिधित्व कर रहा है लेकिन छह अन्य पक्षकार भी हैं। लिहाजा अन्य पक्षकारों का रुख देखना होगा। इस बीच, सुप्रीम सुनवाई से जुड़े एक वरिष्ठ वकील ने कहा कि सुनवाई पूरी होने के बाद ऐसी रिपोर्ट का औचित्य नहीं है।संविधान पीठ अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर बांटने के आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट आदेश के खिलाफ सुनवाई कर रही है। शीर्ष कोर्ट ने हाईकोर्ट के 30 सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ 14 अपीलों ,सुनवाई की।

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