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नस्लीय हिंसा से सरोबार इथोयोपिया में 30 की हत्या, संयुक्त राष्ट्र संघ पर संकट की अनदेखी का आरोप

विश्व को शांति का संदेश देने वाला अफ्रीकी देश इथोयोपिया खुद भारी नस्लीय हिंसा का शिकार हो चुका है। यहां के प्रधानमंत्री 2018 में तब चर्चा में आए थे, जब उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया। लगातार नस्लीय हिंसा से ग्रस्त इथोयोपिया की अबी अहमद सरकार को कल एक बड़ा झटका तीस नागरिकों की हत्या के चलते लगा है। गौरतलब है कि पहले ही अहमद सरकार नस्लीय हिंसा की रोकथाम का जिम्मा सेना को सौंप चुकी है। इसके बाद भी यहां हिंसा का तांडव रुकने का नाम नहीं ले रहा है।

इथियोपिया के ओरोमिया क्षेत्र में अज्ञात बंदूकधारियों ने एक गांव में हमला करके 30 लोगों को मार डाला। 50 वर्षीय किसान वोसन एंडेज ने कहा बताया कि उनके पड़ोसी ओरोमिया के वेस्ट वोलेगा जोन में मंगलवार को हुए हमले में मारे गए। मरने वालों की पहचान अम्हार जाती के रुप में हुई है। वोसन ने बताया कि हमने तीस लोगों की ब़ॉडी को कार में डाला और उन्हें दफनाया। उन्होंने कहा कि उन्होंने और उनके परिवार ने गोलियों की आवाज सुनी और पास के एक सरकारी कार्यालय में भाग गए। बाबो-गेम्बेल जिले के निवासी ने एएफपी समाचार एजेंसी को बताया कि रात 9 बजे के बाद बंदूकधारियों ने गांव पर हमला किया, पहले उन्होंने निवासियों को एक समूह में बाहर इकट्टा होने के लिए मजबूर किया और बाद में उन्हें गोली मार दी।

अबी अहमद अली के शासन में जमीन और संसाधनों को लेकर जातीय हिंसा के मुद्दे लगातार सामने आते रहे हैं। अबी अप्रैल 2018 में इथोपिया के प्रधानमंत्री बने थे। नवंबर अंत में सरकारी बलों द्वारा क्षेत्रीय राजधानी मेकेल पर नियंत्रण हासिल करने के बाद टीपीएलएफ (टाइग्रे पीपल्स लिबनेशन फ्रंट) के खिलाफ उन्होंने जीत की घोषणा की थी। अबी को 2019 में नोबेल शांति पुरस्कार मिल चुका है। उन्हें यह पुरस्कार इरिट्रिया के साथ के सीमा विवाद को खत्म करने में पहल के लिए सम्मानित किया गया था। इन्हें इथियोपिया का नेल्सन मंडेला कहा जाता है। दिसंबर में इथोपिया में हुई एक जातीय हिंसा के दौरान कथित तौर पर हुए नरसंहार में कम से कम 102 सामान्य नागरिक मार दिए गए थे। यह हमला प्रधानमंत्री की वहां यात्रा के एक दिन बाद हुआ था। जिन्होंने विद्रोहियों से निपटने के लिए सेना को कार्रवाई करने की अनुमति दे दी थी। लेकिन अब सेना और विद्रोही ग्रुप आपस में हर रोज भिड़ रहे है। इथोयपियो के टिग्रे क्षेत्र में सेना और विद्रोहियों के बीच लड़ाई पिछले काफी समय से चल रही है। पिछले तीन दशको से इथोयोपिया पर टीपीएलएफ राज कर रही थी। लेकिन 2018 में अबी अहमद के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने टीपीएलएफ के कई बड़े चेहरों को सरकारी पदों से हटा दिया था। अबी ने सभी क्षेत्रिय पार्टियों को राष्ट्रीय पार्टियां बना दिया था। लेकिन टीपीएलएफ ने इस मीटिंग में हिस्सा नहीं लिया था।

क्यों भिड़ रहे है टिग्रे विद्रोही और इथियोपिया सेना?

टीपीएलएफ और इथियोपिया की सरकार में मतभेद तब ज्याद हिंसक हो गया, जब टिग्रे क्षेत्र में चुनाव हुए। हालांकि कोरोना महामारी के कारण चुनावों पर रोक लगा दी गई थी, और प्रधानमंत्री ने इन्हें गैरकानूनी करार दिया था। जिसके बाद लड़ाई और ज्यादा बढ़ गई। अहमद अली ने टीपीएलएफ पर सैन्य टिकानों पर हमले और हथियार चोरी का आरोप लगाया। प्रधानमंत्री अबू ने अपने एक बयान में कहा कि उन्हें टिग्रे क्षेत्र के लोगों से कोई समस्या नहीं, उन्हें केवल वहां के राजनीतिक नेताओं से समस्या है। उनका मकसद केवल धर्म और जाति के नाम पर हिंसा फैलाना है, जिसमें देश में अराजकता फैल जाए। वहीं टीपीएलएफ के नेता ने जवाब में कहा था कि टिग्रे उनके दुश्मनों के लिए नर्क है। टिग्रे के लोग कभी भी घुटने नहीं टेकेंगे।

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इथियोपिया अफ्रीका का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है,और सबसे तेजी से उभरने वाली अर्थव्यवस्था है। इथियोपिया की हिंसक लड़ाई का असर उसके पड़ोसी देशों सोमालिया, युगांडा, सूडान, कीनिया पर भी पड़ रहा है। टिग्रे विद्र्हियों के साथ लड़ाई में इरिट्रिया सेना की भी एंट्री हो चुकी है। इरिट्रिया की सेना इथियोपिया सेना के साथ मिलकर टिग्रे क्षेत्र पर हमले कर रही है। सूडान ने टिग्रे क्षेत्र के साथ लगती अपनी सभी सीमाएं बंद कर दी है। इरिट्रिया की एंट्री के बाद अब यह लड़ाई अंतर्राष्ट्रीय लेवल तक जा पहुंची है। सेना और टिग्रे विद्रोहियों के बीच चल रहे संघर्ष में अब तक सैकड़ों लोग मारे गए हैं। दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति सीरिल रामापूसा ने, बतौर अफ़्रीकी यूनियन के अध्यक्ष, इस संघर्ष को ख़त्म करने के लिए बातचीत को लेकर तीन पूर्व राष्ट्रपतियों के नामों की घोषणा की। लेकिन इथियोपिया सरकार ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था, क्योंकि वह सेना के इस ऑपरेशन को क़ानून अमल में लाने के मिशन के तौर पर देखता है।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार ने क्या कहा

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी ( यूएनएचसीआर) ने बताया है कि इथियोपिया से लोग शान्ति की तलाश में सूडान में पहुँच रहे हैं और मौजूदा संकट शुरू होने के बाद से सूडान पहुँचने वाले इथियोपियाई शरणार्थियों की संख्या 40 हज़ार से भी ज़्यादा हो गई है। ऐसे में मानवीय सहायता की ज़रूरतें वहाँ मौजूद सहायता मुहैया कराने की क्षमता से ज़्यादा हो रही हैं। यूएन शरणार्थी ऐजेंसी के प्रवक्ता बाबर बलोच ने जिनीवा में पत्रकारों को जानकारी देते हुए बताया कि एजेंसी जीवन-रक्षक सामग्री ज़रूरत वाले स्थानों पर पहुँचाने और लोगों में वितरित करते रहे हैं, जिसमें भोजन भी शामिल है। लेकिन मानवीय सहायता कार्यों में ढाँचागत चुनौतियाँ सामने आ रही हैं और माँग ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ गई है। बढ़ती ज़रूरतें पूरी करने के लिये रहने के ठिकाने मुहैया कराने की क्षमता मौजूद नहीं है।

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प्रवक्ता बाबर बलोच ने टिगरे क्षेत्र में आम लोगों, विस्थापितों और सहायताकर्मियों की हालत के बारे में भी चिन्ता जताई है। उन्होंने तमाम सम्बद्ध पक्षों से पुकार दोहराई कि जो लोग सुरक्षा और सहायता की तलाश में बेहतर स्थानों की तरफ़ जा रहे हैं, उन्हें सुरक्षित और मुक्त रास्ता दिया जाए, चाहे वो देश के भीतर ही विस्थापित हो रहे हैं या अन्तरराष्ट्रीय सीमा पार, और चाहे उनकी जातीय पृष्ठभूमि कुछ भी हो। संयुक्त राष्ट्र ने यह भी कहा कि इथियोपिया के टिग्रे में 500 से अधिक रेप के मामले दर्ज किए गए हैं। 5 मेडिकल सेंटर्स से रेप के 500 से ज्यादा मामलों हो सकते है। महिलाओं का कहना है कि सैनिकों द्वारा उनका रेप किया गया है, परिवार के सदस्यों के सामने रेप किया गया और हिंसा की धमकी देते हुए अपने ही परिवार के सदस्यों से रेप कराने के लिए मजबूर किया गया।

वहीं सूडान से भी इथियोपिया के साथ लंबे समय से सीमा विवाद चल रहा है। यहां दोनों देश पुनर्जागरण बांध को लेकर अपना-अपना दावा कर रहे हैं, जिससे यहां के नील नदी के पानी को रोका जा रहा है। इससे मिस्र और सूडान दोनों देश चिंतित हैं कि 4 बिलियन डॉलर के बांध से उनकी जल आपूर्ति को खतरा हो सकता है। वहीं इस सप्ताह मिस्र और सूडान द्वारा संयुक्त युद्ध अभ्यास किया जा रहा है, जो टिगरायन संघर्ष से पहले ही शुरू हो गया था।

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