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बिहार में यात्राओं के सियासी मायने

बिहार में सियासी बदलाव के बाद अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए सियासी बिसात बिछाई जा रही है। राहुल गांधी इन दिनों भारत जोड़ो यात्रा कर रहे हैं तो उसकी सियासी तपिश बिहार में भी दिखने लगी है। बिहार की सियासत में यात्रा निकालने की होड़ मची हुई है। राजनीति में अपने पैर जमाने निकले राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर सुराज यात्रा कर रहे हैं तो कांग्रेस हाथ से हाथ जोड़ो यात्रा बिहार में निकाल रही है। वहीं राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी समाधान यात्रा पर निकल पड़े हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इस कड़ाके की ठंड में नीतीश, पीके और कांग्रेस आखिर क्यों इतना पसीना बहा रहे हैं?

 

नीतीश कुमार को बिहार की सियासत में यात्राओं का बादशाह कहा जाता है। पिछले दो दशक में नीतीश करीब डेढ़ दर्जन यात्राएं राज्य में निकाल चुके हैं,उन्होंने हर बार सियासी यात्राओं के जरिए राजनीतिक फिजा को अपनी ओर मोड़ा है। नीतीश ने जब से भाजपा का साथ छोड़कर महागठबंधन में वापसी की है तब से शराबबंदी से लेकर तमाम मुद्दों पर उन्हें भाजपा ने घेरा है। जहरीली शराब से लगातार हो रही मौत उनकी शराबबंदी की असफलता की दास्तान बताती है। इस असफलता और मुआवजा न देने के मामले को लेकर भाजपा के विरोध प्रदर्शन ने भी उनकी धड़कनें तेज कर दी हैं। ऐसे में कहा जारहा है कि तो क्या शराब नीति ही उनकी सबसे बड़ी समस्या है? क्या वे इस यात्रा के जरिए जनता को समझा पाएंगे शराबबंदी कितना जरूरी है?

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि नीतीश अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले बिहार में ही सियासी माहौल और
अपने खिलाफ बन रहे नेरेटिव को तोड़ने और राजनीतिक फिजा को अपनी ओर मोड़ने के लिए समाधान ‘समाधान यात्रा ‘ कर रहे हैं । इस यात्रा में नीतीश सरकारी कामकाज का जायजा लेंगे और विकास योजनाओं की समीक्षा के साथ वह शराबबंदी को लेकर जागरूकता अभियान भी चलाएंगे। समाधान यात्रा का पहला चरण 29 जनवरी तक चलेगा, जिसके जरिए 18 जिलों को कवर करेंगे। इस तरह से नीतीश ने 2024 के चुनाव से पहले सीधे जनता से करने की कवायद शुरू की है। नीतीश कुमार के समाधान यात्रा में किसी प्रकार की सभा का कार्यक्रम नहीं रखा है। वे इस यात्रा के दौरान किसी प्रकार का भाषण भी नहीं देंगे बल्कि सीधे जनता के बीच जाकर उनकी परेशानी जानने की कोशिश करेंगे और उसका लगे हाथ समाधान करेंगे। नीतीश कुमार पहली बार बिहार की यात्रा पर नहीं निकले हैं। 2005 से लेकर अभी तक वे दर्जन भर से ज्यादा यात्रा कर चुके हैं। 2005 में न्याय यात्रा, 2009 जनवरी में विकास यात्रा, जून 2009 में धन्यवाद यात्रा, सितंबर 2009 में प्रवास यात्रा, अप्रैल 2010 में विश्वास यात्रा, 9 नवंबर 2011 में यात्रा, सितंबर 2012 में अधिकार यात्रा, मार्च 2014 में संकल्प यात्रा, नवंबर 2014 मे संपर्क यात्रा, नवंबर 2016 में निश्चय यात्रा, 2017 में समीक्षा यात्रा, 2019 में जल-जीवन-हरियाली यात्रा, 2021 में समाज सुधार यात्रा और अब समाधान यात्रा के जरिए 2024 का समाधान तलाशेंगे।

कांग्रेस की हाथ से हाथ जोड़ो यात्रा

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा भले ही बिहार से नहीं गुजर रही, लेकिन पार्टी ने यहां हाथ से हाथ जोड़ो यात्रा पिछले एक सप्ताह से जारी है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद के नेतृत्व में यह यात्रा चल रही है। इस यात्रा में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी शिरकत की है। खड़गे बिहार के बांका जिले में सभा को संबोधित किया । इस दौरान करीब 7 किलोमीटर पैदल यात्रा भी की । बिहार में हाथ से हाथ जोड़ो यात्रा 20 जिलों में 1200 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। यह यात्रा पहले चरण में 5 जनवरी से शुरू होकर 10 जनवरी तक चलेगी, जो बांका, भागलपुर और खगड़िया तक जाएगी। कांग्रेस बिहार में भले ही महागठबंधन का हिस्सा है, लेकिन वह अपने सियासी आधार को मजबूत करने में जुट गई है। कांग्रेस बिहार की सियासत में अभी छोटे भाई की भूमिका में है जबकि आरजेडी और जेडीयू बड़े भाई के तौर पर हैं । कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा की वजह से उन्हें बिहार में भी अपनी संभावना दिखने लगी है। सीधे जनता के साथ कनेक्ट होने के लिए यह यात्रा शुरू कर रही है ताकि अपने खोए हुए सियासी आधार को मजबूत कर सकें, ऐसे में देखना होगा कि कांग्रेस इस यात्रा के जरिए महागठबंधन में अपना कितना सियासी वजूद कायम कर पाती है।

पीके की जन सुराज यात्रा

बिहार के सियासत में राजनीतिक राह तलाश रहे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) भी गांधी जयंती के दिन यानी 2 अक्टूबर 2022 से ही जन सुराज यात्रा पर हैं। पिछले तीन महीने से पदयात्रा कर रहे प्रशांत किशोर सबसे ज्यादा हमलावर नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव पर हैं । पीके की यह यात्रा राज्य के सभी जिलों से गुजर रही 3000 किलोमीटर की यात्रा तय करेगी। इस पदयात्रा को पूरा करने में लगभग एक से डेढ़ साल तक का समय लगेगा। कहा जा रहा है कि इस यात्रा के जरिए पीके महागठबंधन के खिलाफ सियासी माहौल बनाने में जुटे हैं ।

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