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टूटा Pinjra, पंछी हुए आज़ाद !

pinjra tod
क्या वाकई pinjra टूट गया ? बराबरी के अधिकारों की जब भी बात होती है तो समाज का एक ख़ास वर्ग उसे जेंडर के चश्मे से जरूर देखता है। मसलन लड़का है तो उसके लिए अलग नियम लड़की है तो उसके लिए अलग नियम।ज्यादातर तो लड़कों के लिए कोई नियम होता नहीं है,बेमतलब के नियम होने भी नहीं चाहिए चाहे लड़की हो या लड़का।
ख़ासकर गर्ल्स हॉस्टल में लड़कियों पर अलग ही दुनिया के नियम कानून थोपने को अमादा पितृसत्तात्मक समाज में पले पढ़े लोग लगभग हर जगह नज़र आ जाएंगे। कहीं-कहीं गर्ल्स हॉस्टल की सख़्ती का आलम यह है कि जैसे कोई लड़की यहां रहने नहीं आ रही बल्कि कोई अपराधी जेल में रहने आ रहा हो। कुछ माँ-बाप जिनके माता पिता ने उन्हें आज़ादी नहीं दी और जो अपने बच्चों को भी वैसे ही पालना चाहते हैं जैसे वे घुट घुट कर ख़ुद बड़े हुए, वे भी बात-बात पर अपनी बड़ी होती लड़कियों को गर्ल्स हॉस्टल भेज देने की धमकियां देते रहते हैं।
अब यहां पर कुछ लोग यह भी तर्क देते नजर आएंगे कि माहौल ही ख़राब हैं इसमें माँ-बाप का क्या दोष! तो उनके लिए यही सही है कि वे कुछ दिन ख़ुद बन्द पिंजरे में रह कर गुजारें। गर्ल्स हॉस्टल में लड़कियों को लड़की होने के नाम पर आज भी अजीबोगरीब नियमों का पालन करना पड़ता है। मसलन कोई लड़की 9 बजे के बाद बाहर नहीं रह सकती, आदि।

‘Pinjra Tod’ कैसे आया अस्तित्व में ?

ऐसे में भारत में एक क्रांति की तरह एक समूह अपने अस्तित्व में आया। इस समूह का नाम है ‘Pinjra Tod’। वर्ष 2015 की बात है ,दिल्ली यूनिवर्सिटी में गर्मियों की छुट्टियां खत्म ही हुई थीं। जामिया मिलिया इसलामिया सेंट्रल यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में लड़कियों के लिए एक नोटिस जारी की गई कि अब लड़कियों को 8 बजे तक  हॉस्टल के अंदर आना होगा, अगर बहुत इमरजेंसी हैं तो 8 बजे के बाद बाहर रहने ले लिए उन्हें हॉस्टल अथॉरिटी से परमिशन लेनी होगी।
फिर क्या हॉस्टल की कुछ लड़कियों ने इसका विरोध किया।जिसमें दो प्रमुख लड़कियां रहीं वो हैं देवांगना कलीता और नताशा नरवाल। ये दोनों उस वक़्त पीएचडी की छात्रा थीं।
इन्होंने जो मुहीम शुरू की उसने एक समय के बाद तेजी से रफ़्तार पकड़ी। धीरे -धीरे उनके इस मुहीम में अन्य यूनिवर्सिटी और महाविद्यालयों के छात्रों ने स्वतः भाग लेना शुरू किया।
यहां तक कि दिल्ली कमीशन फ़ॉर वीमेन को भी यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक अधिकारियों से सवाल पूछना पड़ा कि आख़िर उन्हें लड़कियों पर इस तरह के रिस्ट्रिक्शन लगाने के बारे में विचार कहाँ से आया ?
DCW (दिल्ली कमीशन फ़ॉर वीमेन) के इस संज्ञान के मायने थोड़े  विस्तृत थे। दरअसल अब यह मामला सिर्फ जामिया मिलिया इस्लामिया के गर्ल्स हॉस्टल तक ही नहीं सीमित था, अब दिल्ली के अन्य यूनिवर्सिटीज को भी इस बाबत चेताया जा रहा था। गर्ल्स हॉस्टल में लड़कियों के साथ हो रहे बेबुनियाद ,गैर जरूरी इन हरक़तों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए अब महिला संगठनों ने एक मुहीम शुरू कर दी थी। DCW को Pinjra Tod ने  एक याचिका भी भेजी कि इस मामले में वह हस्तक्षेप करे और लड़कियों पर ऐसे अनाप शनाप नियम न थोपे जाने की बात कहे।
Pinjra Tod ने इस मुहीम से जुड़ने के लिए न जाने कितने लोगों को प्रीकॉशन किया ,यहीं पर पिंजरा तोड़ की सफ़लता की कहानी शुरू होती है कि जब भी पिंजरा तोड़ लड़कियों से धरना प्रदर्शन या मार्च के लिए आह्वान करती ,छात्र बड़ी संख्या में जुड़ते।क्योंकि लगभग सभी लड़कियों को उस घुटन से छुटकारा चाहिए था जो उनपर सिर्फ़ इसलिए थोपी गयी क्योंकि वे लड़की हैं। Pinjra Tod के साथ देखते ही देखते मिरांडा हाउस, अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, हिन्दू कॉलेज, लेडी श्रीराम कॉलेज फ़ॉर वीमेन, सेंट स्टीफेंस कॉलेज और दिल्ली टेक्निकल कॉलेज की भी लड़कियां बड़ी संख्या में जुड़ गयीं। यह पहली बार हो रहा था जब राजधानी में इतनी बड़ी संख्या में लड़कियां अपने अधिकारों के किये इकट्ठा हो रही थीं।
स्पष्ट है ऐसे मुहीम समय-समय पर होने भी चाहिए। राजधानी दिल्ली के गर्ल्स हॉस्टल का यह हाल था तो इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती कि राजधानी से इतर गर्ल्स हॉस्टल्स के नियम कितने ज़्यादा सख़्त होंगे।खैर,Pinjra Tod ने उन सभी मुद्दों को बेहद गम्भीरता से उठाया जो राइट टू इक्वलिटी का हिस्सा होना ही चाहिए।पिंजरा तोड़ अब   पितृसत्ता की उन पॉलिसीज को चैलेंज कर रही थी, जिसे पहले कभी नकारा नहीं गया था।

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मसलन उनके कुछ सवाल इस तरह हैं :

UGC (यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन) के गाइडलाइंस (2006) के अनुसार भारत के सभी यूनिवर्सिटी में सेक्सुअल हरासमेंट कमिटी   बनना आवश्यक है।ये कमिटीज़ अपना काम सही से कर रही हैं या नहीं, इसे कौन सुनिश्चित कर रहा है? लड़कियों पर नियम कानून थोपने के बजाय यह क्यों नहीं किया जाता कि यूनिवर्सिटी और महाविद्यालयों के कैम्पस में लड़कियों के लिए भयमुक्त वातावरण बना रहे ? इंटरनल कंप्लेंट कमिटी बनें जिससे लड़कियों के साथ हो रहे शारिरीक और मानसिक शोषण को रोका जा सके। बजाय इसके यूनिवर्सिटी अथॉरिटी ग़ैर ज़रूरी नियम थोपने में लगी है।
ऐसे न जाने कितने सवाल जो लड़का-लड़की के बीच जबरन पैदा किये गए भेदों को कटघरे में खड़ा करते हैं, पूछे गए। 10 अक्टूबर 2015 को इन लड़कियों ने DCW को सामूहिक पत्र लिखा था। साथ ही दिल्ली यूनिवर्सिटी के नार्थ कैंपस में नाईट मार्च भी निकाला गया।

FYI Smriti Irani यानी कि फ़ॉर योर इन्फॉर्मेशन, स्मृति ईरानी

इस मामले में तत्कालीन केंद्रीय ह्यूमन रिसोर्स डिवेलपमेंट मिनिस्टर स्मृति ईरानी ने भी इससे सम्बंधित एक बयान दिया था , उन्होंने कहा था कि,’ भारत में स्त्रियों को यह न बताया जाए कि उन्हें क्या पहनना चाहिए, क्या खाना चाहिए, किससे मिलना चाहिए या कहां जाना चाहिए।’
इस बयान को लेकर पिंजरा तोड़ ने 24 अक्टूबर 2015 को उनके मंत्रालय के कार्यालय के सामने भी प्रोटेस्ट करते हुए वो रूल बुक दिखाई जो विभिन्न गर्ल्स हॉस्टल से लाई गई थी जिसमें न जाने कितने नियम जो बिल्कुल अजीब थे लड़कियों के लिए, वह भी लिखे थे। इस प्रोटेस्ट को Pinjra Tod ने नाम दिया था, FYI Smriti Irani यानी कि फ़ॉर योर इन्फॉर्मेशन, स्मृति ईरानी।
16 दिसम्बर 2012 को हुए दिल्ली गैंग रेप की याद में 16 दिसम्बर 2015 को Pinjra Tod ने दिल्ली के विभिन्न शहरों में ‘बस तेरी मेरी, चल सहेली’ , नाम से एक व्यापक प्रोटेस्ट किया। इस प्रोटेस्ट का उद्देश्य था कि रात में महिलाएं भय मुक्त होकर पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग कर सकें उन्होंने हाथों में बैनर लिए थे जिसपर लिखा था, पब्लिक स्पेस इस डेंजर टू वीमेन। फरवरी 2016 में JNU (जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी ) में एक ऐसी घटना हुई जिसने फिर दिल्ली का माहौल ख़राब कर दिया ,एक बार फिर एक लड़की को एहसास दिलाया गया कि तुम्हारे साथ कभी भी कुछ भी भयानक हो सकता है।
Pinjra Tod लगातार अपना काम करती रही। एक सुबह 2 मई 2016 को UGC ने द गेजेट ऑफ इंडिया में एक पत्र प्रकाशित कराया जिसमें यूनिवर्सिटी में सभी महिला कर्मचारियों और छात्रों के लिए सेक्सुअल हरासमेंट प्रीवेंशन को लेकर कई बड़ी घोषणाएं की गई थीं। इसी आधार पर 7 मई 2016 को DCW ने 23 विश्वविद्यालयों को एक साथ नोटिस भेजा।
महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई बड़े सार्थक बदलाव हुए, यह Pinjra Tod की ही मेहनत थी जिसने देश भर की उन लड़कियों की लड़ाई लड़ी जिन्हें एक बन्द पिंजरे में अनायास अपने पंखों को सिकोड़ कर रहना पड़ रहा था।
सितंबर 2015 में तो ऐसा हुआ कि दिल्ली में ख़ासकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के नार्थ कैंपस में जगह-जगह  दीवारों पर ,गेटों पर ऐसे पिक्चर और ग्रेफिटी बनाये गए थे जिसमें लिखा हुआ था, हैशटैग Pinjra Tod , नो मोर केजज । हालांकि बाद में इस समूह को लेकर कई विवाद भी हुए।किसी ने कहा कि यह समूह सिर्फ़ सवर्ण महिलाओं द्वारा ही चलाया जा रहा  है और यह अब अपने उद्देश्य से भटकता हुआ अन्ह ग़ैर जरूरी गतिविधियों में लिप्त हो रहा है।

नताशा नरवाल, आसिफ इकबाल तन्हा और देवांगना कालिता को मिली जमानत

अभी हाल ही पिंजरा तोड़ की सदस्य , नताशा नरवाल और कालीता फिर सुर्खियों में छाई रहीं। उन पर सीएए(CAA) के विरोध के दौरान ,दिल्ली दंगो में सम्मिलित होने का आरोप लगा। उन पर दिल्ली में CAA/NRC को लेकर हुए प्रदर्शनों के दौरान दंगा भड़काने की साजिश में भी शामिल होने के आरोप थे।
फ़िलहाल दिल्ली दंगे के आरोपी कहे जा रहे नताशा नरवाल,कलिता  समेत तीन आरोपियों की जमानत हो गयी है।
लेकिन इस ज़मानत के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।पुलिस ने अदालत से मामले में पुनर्विचार की मांग की है।बीते मंगलवार को तीनों यूनिवर्सिटी छात्रों को 5प हज़ार के निजी मुचलके पर हाईकोर्ट ने जमानत दे दी थी। जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस अनूप जे भंभानी की बेंच ने यह फैसला सुनाया था।
नरवाल के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
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अब नताशा नरवाल, आसिफ इकबाल तन्हा और देवांगना कालिता को मिली जमानत के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।याचिका में पुलिस ने दिल्ली हाईकोर्ट की तरफ से सुनाए गए फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है।  
नरवाल और कालिता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रिसर्च स्कॉलर्स हैं। जबकि, तन्हा जामिया मिल्लिया इस्लामिया का छात्र है।नरवाल को दिल्ली पुलिस ने बीते वर्ष मई में गिरफ्तार किया था।साथ ही तीनों को यह आदेश दिए गए हैं कि वे जांच में सहयोग करेंगे और बगैर इजाजत के देश के बाहर नहीं जाएंगे। इस उपर्युक्त पूरे मामले न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता का एक व्याख्यान पढ़ना बेहद ज़रूरी है,जिसे उन्होंने 24 फरवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में दिया था।
कुछ अंश यहाँ उदधृत हैं,
यदि कोई व्यक्ति प्रश्न नहीं पूछता है और सदियों पुरानी प्रणालियों पर संदेह नहीं करता है, तो कोई नई प्रणाली विकसित नहीं होगी और मन के क्षितिज का विस्तार नहीं होगा। बुद्ध, महावीर, ईसा मसीह, पैगंबर मोहम्मद, गुरु नानक देव, मार्टिन लूथर, कबीर, राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, कार्ल मार्क्स या महात्मा गांधी न होते तो नए विचार स्थापित नहीं होते। उन्होंने अपने विचारों को प्रस्तुत किया था और मौजूदा प्रथाओं, विश्वासों और अनुष्ठानों पर सवाल उठाया था।
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असहमति का महत्व

लोकतंत्र में असहमति जरूरी है। यदि किसी देश को समग्र रूप से विकसित होना है, जहां न केवल आर्थिक अधिकार बल्कि नागरिक के नागरिक अधिकारों की भी रक्षा की जानी है, तो असहमति और असहमति को अनुमति दी जानी चाहिए, और वास्तव में, प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। चर्चा, असहमति और संवाद होने पर ही हम देश को चलाने के बेहतर तरीकों पर पहुंच सकते हैं।
असहमति के बिना लोकतंत्र नहीं हो सकता। हाल ही में, मेरे भाई न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपने भाषण में इस मामले को बहुत संक्षेप में रखा। उसने कहा: “असहमति को राष्ट्र विरोधी या लोकतंत्र विरोधी के रूप में लेबल करना संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और जानबूझकर लोकतंत्र को बढ़ावा देने की हमारी प्रतिबद्धता के केंद्र में है”।

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