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दूर होंगे गिले – शिकवे 

बांग्लादेश अपनी आजादी के 50 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है। 26 मार्च को आयोजित उत्सव में शामिल होने के लिए भारत से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वहां पहुंचेंगे। इसके अलावा नेपाल, श्रीलंका, भूटान और मालदीव के राष्ट्राध्यक्ष और शासन प्रमुख इस समारोह में शिरकत करेंगे। इस दौरान देश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत के पीएम मोदी से वार्ता करेंगी। दोनों देशों के बीच तीन समझौतों पर सहमति भी बन सकती है। हालांकि कहा जा रहा है कि इन समझौतों पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। बांग्लादेश और भारत के बीच आपसी सहयोग का इतिहास बहुत पुराना है। दोनों देश राजनीतिक, सांस्कृतिक और सैन्य मोर्चे पर एक साथ हैं।
इन दोनों देशों के कुछ मुद्दे ऐसे भी हैं जिन्हें लेकर हमेशा विवाद रहता है और ऐसा ही एक मुद्दा है गंगा के पानी के बंटवारे का। बांग्लादेश और भारत के बीच गंगा के पानी के बंटवारे को लेकर एक संधि है जो साल 2026 में खत्म हो जाएगी।

मोदी और हसीना की वार्ता से भारत और बांग्लादेश के बीच तीन महत्वपूर्ण समझौतों पर सहमति की उम्मीदें हैं

बांग्लादेश में इस समझौते का हमेशा से विरोध होता आया है। कई लोगों का मानना है कि समझौता भारत के पक्ष में है। साल 2017 में जब हसीना भारत दौरे पर गई थीं तो उन्होंने प्रेस काॅन्फ्रेंस में कहा था कि जो भी समझौते भारत के साथ हुए हैं वो सभी बांग्लादेश के हित में हैं। दो बड़ी नदियां गंगा और ब्रह्मपुत्र, भारत से बहते हुए बंगाल की खाड़ी में जाकर गिरती है। इन दोनों ही नदियों को बांग्लादेश की जीवन रेखा कह दिया जाता हैं। इन नदियों से निकलने वाली छोटी-छोटी नदियां देश के औद्योगिक विकास में सहायक मानी जाती हैं।
बांग्लादेश में करीब 400 नदियां हैं और यहां के विशेषज्ञों की मानें तो देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था नदियों पर ही निर्भर है। भारत की तरह ही बांग्लादेश भी कृषि उत्पादन पर बहुत हद तक निर्भर है। 54 नदियां ऐसी हैं जो पड़ोसी देश भारत के साथ जुड़ी हैं। इसमें से सिर्फ एक नदी ही ऐसी है जिसकी धारा ऊपर की तरफ बढ़ती है जबकि 53 नदियां दक्षिण दिशा में भारत से बहती हुई आती हैं। बांग्लादेश नेशनल रीवर कंजरवेशन कमीशन की मानें तो ऐसे में भारत के पास पानी के बहाव को रोकने के सभी संसाधन मौजूद हैं।

बांग्लादेश के लिए भी अहम है गंगा

गंगा को बांग्लादेश के लिए पानी का एक अहम स्रोत माना जाता है। बांग्लादेश के उत्तर और उत्तर पश्चिम क्षेत्र में बहने वाली नदियों के जल बहाव को बरकरार रखने के लिए गंगा का पानी सहायक होता है। बांग्लादेश की तरफ से कई बार ये दावा किया गया है कि पड़ोसी भारत संधि की शर्तों को बदलने की कोशिशें कर रहा है।
भारत जो दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है, वह दक्षिण एशिया में भी बड़ी पकड़ रखता है। बांग्लादेश में विशेषज्ञ अक्सर भारत पर आरोप लगाते हैं कि वो उनके देश की चिंताओं को नजरअंदाज कर रहा है। फिलहाल देखना होगा कि इस संधि का भविष्य क्या होता है और इस पर बरकरार तनाव कैसे दूर होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिवसीय बांग्लादेश यात्रा कई मायने में उपयोगी और ऐतिहासिक होगी। बांग्लादेश के अस्तित्व में आने के बाद से ही दोनों देशों के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव तो जरूर आए, लेकिन दोनों एक- दूसरे के लिए महत्वपूर्ण बने रहे। भारत और
बांग्लादेश के संबंध कभी भी चिंताजनक रूप से तनावपूर्ण नहीं रहे। दोनों देशों के बीच अलबत्ता परस्पर हितों और मुद्दों को लेकर समय -समय पर मतभेद पैदा होते रहे हैं। आखिर भारत और बांग्लादेश के बीच किन मुद्दों को लेकर मतभेद रहे हैं। इन 50 वर्षों में बांग्लादेश और भारत के बीच सौहार्द और विवाद की बड़ी वजहें हैं। वर्ष 2019 में दोनों देशों के बीच संबंधों में तब तल्खी देखने को मिली, जब भारत ने नागरिकता संशोधन कानून पारित किया। उस वक्त बांग्लादेश ने इस पर अपना विरोध जताया था। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस कानून को गैरजरूरी बताया था। इसके बाद बांग्लादेश ने दोनों देशों के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय दौरे और मुलाकात कार्यक्रमों को भी रद्द कर दिया था। शेख हसीना ने कई महीनों तक भारत के उच्चायुक्त से भी मुलाकात करने से इंकार कर दिया था। हालांकि, इस कानून को लेकर भारत की शुरू से दलील रही है कि यह उसके देश का आतंरिक मामला है। इसमें किसी अन्य देश को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

तीस्ता नदी के जल बंटवारे को लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद बना हुआ है। वर्ष 2019 में दोनों देशों के बीच वर्चुअल बैठक में व्यापार और निवेश पर चर्चा हुई, लेकिन तीस्ता नदी पर कोई वार्ता नहीं हुई थी। दोनों देशों के लिए तीस्ता नदी जल बंटवारा उतना आसान नहीं है। यह थोड़ा जटिल है। दरअसल, तीस्ता नदी में पश्चिम बंगाल सरकार का भी महत्वपूर्ण किरदार है। पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए तीस्ता नदी जीवन रेखा है। पश्चिम बंगाल का कहना है कि तीस्ता नदी का जल बांग्लादेश के साथ बांटा जाएगा तो फिर पश्चिम बंगाल में सूखे की स्थिति पैदा हो जाएगी। एक खास बात यह है कि दोनों ही देशों में चारों मौसम में फसल लगाई जा रही है। इसके लिए तीस्ता नदी का जल बेहद उपयोगी है। ऐसे में तीस्ता नदी का विवाद आसानी से सुलझता हुआ नहीं दिखता है।

बांग्लादेश के निर्माण में भारत की अहम भूमिका

बता दें कि वर्ष 1971 में बांग्लादेश की आजादी में भारतीय सेना की महत्वपूर्ण भूमिका थी। बांग्लादेश में पाकिस्तान की सेना ने
तत्कालीन भारतीय सेना के जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण किया था। इसके बाद ही बांग्लादेश आजाद हुआ। एक नया देश बांग्लादेश अस्तित्व में आया। इन संबंधों और भारतीय सेना के योगदान को देखते हुए इस वर्ष 26 जनवरी को भारत के गणतंत्र दिवस के मौके पर बांग्लादेशी सेना की एक टुकड़ी ने भी हिस्सा लिया था।

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