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म्यांमार में तख़्त पलट क्यों हुआ ?

म्यांमार की सेना ने 1 फरवरी 2021 को देश के राष्ट्रपति बिन बिन मिन्त और सर्वोच्च नेता श्रीमती आंग सान सू की को नजरबंद कर दिया गया है और फौज ने देश पर कब्जा कर लिया है। यह फौजी तख्ता-पलट सुबह-सुबह हुआ है जबकि अन्य देशों में यह प्रायः रात को होता है।

क्या है पूरा मामला

 

दरअसल पिछले वर्ष 2020 के नवम्बर माह में देश में चुनाव हुए थे जिसमें आंग सान सू की की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेटिक पार्टी ने ससंद के सदनों के 476  सीटों में से 396 सीटों पर जीत हासिल कर सत्ता पर आसीन होने वाली थी और 1 फरवरी को पार्टी अपने पदों का भार आधिकारित रूप में संभालने वाली थी लेकिन इसी बीच सेना के कमांडर इन चीफ मिंग आन लाइन के नेतृत्व में विपक्षी पार्टियों ने आंग सान सू की पर चुनाव में धांधली करने का आरोप लगा कर देश में आपातकाल लगाते हुए आंग सान सू की के साथ-साथ उनके अन्य समर्थक नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया। कार्यकारी राष्ट्रपति मीएन स्वे ने हस्ताक्षर कर देश में एक वर्ष तक आपातकाल लगाए रखने की घोषणा कर दी है।

‘आंग सान सू की ‘कौन है ?

 

हिरासत में ली गई ऑन्‍ग सान सू की के पिता ऑन्‍ग सान ने ही म्‍यांमार आर्म्‍ड फोर्स का गठन उन्‍होंने देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिए कड़ा संघर्ष किया था लेकिन आजाद देश को देखने से छह माह पहले ही उनकी हत्‍या कर दी गई थी। उन्‍होंने आधुनिक म्‍यांमार का पिता कहा जाता है। एक समय था जब म्‍यांमार दक्षिण-पूर्व एशिया के धनी देशों में से एक था।

ये दुनिया का सबसे बड़ा चावल-निर्यातक तो था ही साथ ही कई तरह की लकड़ियों का भी बड़ा उत्पादक था। यहां पर टिन, सीसा, तेल, चांदी, टंगस्टन आदि प्रचुर मात्रा में उपलब्‍ध थे। लेकिन दूसरे विश्‍व युद्ध में जापानियों के हमले में इनकी अधिकतर खदानें नष्‍ट कर दी गईं। आजादी के बाद सरकार की गलत नीतियों की बदौलत इसकी अर्थव्‍यवस्‍था लगातार गिरती चली गई और आज ये दुनिया के सबसे गरीब देशों की गिनती में आता है।

यहां के इतिहास पर नजर डालें तो कभी यहां पर भी अंग्रेजों का ही राज था। 1937 से पहले भारत की ब्रिटिश हुकूमत ने इसको भारत का ही एक राज्‍य घोषित किया था। लेकिन बाद में इसको भारत से अलग कर अपना उपनिवेश बना दिया था। 80 के दशक से पहले इसका नाम बर्मा हुआ करता था लेकिन बाद में इसका नाम म्‍यांमार कर दिया गया। ये 4 जनवरी 1948 को ब्रिटिश शासन से मुक्‍त हुआ था। 1962 तक यहां पर लोकतंत्र के तहत देश की जनता अपनी सरकार चुनती थी। लेकिन 2 मार्च, 1962 को सेना के जनरल ने विन ने सरकार का तख्‍तापलट करते हुए देश की सत्‍ता पर कब्‍जा कर लिया था।

म्यांमार का इतिहास

बर्मा के नाम से जाना जाने वाले म्यांमार में साल 1962 से लेकर साल 2011 तक सैन्य शासन था।  जिस भी जनरल ने इस देश की कमान संभाली उसने विरोधियों को कुचल दिया। वहीं, विपक्ष की नेता और नोबल पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची को नज़रबंद रखा गया। सैन्य शासन वाले इस देश में उदारीकरण की प्रक्रिया साल 2010 से शुरू हुई ।   2016 में सरकार बदलने के बाद इस देश ने एक बड़े बदलाव को देखा ।

ताजा मामले पर कार्यकारी राष्ट्रपति ने कहा

 

म्यांमार के कार्यकारी राष्ट्रपति मीएन स्वे ने अपने बयान में कहा, “चुनाव आयोग 8 नवंबर को हुए आम चुनाव में वोटर लिस्ट की बड़ी गड़बड़ियों को ठीक करने में असफ़ल रहा है.”लेकिन इस आरोप को साबित करने के लिए उनके पास पुख़्ता सबूत नहीं थे ।

मिन आंग ह्लाइंग इस साल जुलाई महीने में कमांडर इन चीफ़ के पद से रिटायर होने वाले थे क्योंकि वह 65 वर्ष की आयु को पार कर चुके हैं । लेकिन उन्होंने अब स्वयं को एक और साल दे दिया है ।   लेकिन म्यांमार में सैनिक शासन लौटने की वजह से ह्लाइंग संभवत: लंबे समय के लिए पद पर बने रह सकते हैं ।  

एक और बात है जो बेहद अहम है कि आखिर क्यों म्यांमार की सत्ता में लगातार सेना का हस्तक्षेप बना रहता है। वह इसलिए क्योंकि 2008 में उसने जो संविधान बनाया था, उसके अनुसार संसद के 25 प्रतिशत सदस्य फौजी होने अनिवार्य थे और कोई चुनी हुई लोकप्रिय सरकार भी बने तो भी उसके गृह, रक्षा और सीमा- इन तीनों मंत्रालयों को फौज के पास रखना अनिवार्य है।

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