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चीन क्यों नहीं समझ रहा, वीगर मुसलमानों का दर्द !

चीन और तुर्की ने वर्ष 2017 में प्रत्यर्पण को लेकर एक द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किया था।इस प्रत्यर्पण के तहत ‘कुछ शरणार्थियों’ और उन ‘वीगर मुसलमानों’ को चीन वापस भेजने की बात कही गयी है जिन पर ‘आतंकवादी गतिविधि में शामिल’ होने का शक चीन को है। लेकिन तुर्की और चीन के इस समझौते पर कई देशों ने कड़ी आपत्ति जताई है। क्योंकि यूरोपीय संघ और सदस्य देशों को यह आशंका है कि अगर वीगर मुसलमान शरणार्थियों को वापस भेजा जाता है तो वो भी चीन के शिनजियांग प्रांत में हो रहे ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ का शिकार हो जायेंगे।

चीन, वीगर मुसलामानों को निशाना बनाना चाहता है !

आपको बता दें कि 26 दिसम्बर 2020 को चीन की संसद ने इस समझौते को स्वीकार कर  लिया है जबकि तुर्की की संसद ने इसका अभी तक अनुमोदन नहीं किया है। मानवाधिकार संगठन नोर्डिक मॉनिटर ने भी समझौते के मसौदे को लेकर चिंता जताई है। इस समझौते से चीन उन वीगर मुसलामानों को निशाना बनाना चाहता है जो तुर्की में निर्वासित होकर रह रहे हैं या नहीं इस पर अभी संशय बना हुआ है। जानकारों की माने तो चीन के लिए इस समझौते के कई मायने हैं।

 

दस लाख वीगर मुसलमानों को ‘डिटेंशन कैम्प’ में रखे हुए है चीन

हालाँकि चीन पर कई बुद्धजीवियों ने यह आरोप लगाया है कि शिनजियांग प्रांत में रह रहे लगभग दस लाख वीगर मुसलमानों को वो ‘डिटेंशन कैम्प’ में रखे हुए है और उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित कर रहा है जिसमें धर्म पर प्रतिबन्ध से लेकर महिलाओं की जबरन नसबंदी और जबरन मज़दूरी के आरोप शामिल हाँ।

तुर्की के विदेश मंत्री मेव्लुत कावुसोग्लू ने क़यासों को ख़ारिज करते हुए कहा है कि अभी तक उनके देश ने वीगर मुसलमानों के चीन प्रत्यर्पण के बारे में कोई फ़ैसला नहीं किया है। इस समझौते को तुर्की की संसद ने अभी तक अनुमोदित नहीं किया है जहां इसको लेकर काफ़ी विरोध देखा गया है।

वहीं चाइना ह्यूमन राइट्स डिफ़ेंडर्स के प्रवक्ता लियो लेन ने ब्रिटेन से प्रकाशित अख़बार ‘द गार्डियन’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि,’ समझौते से दूसरे देशों में शरण लिए हुए वीगर मुसलामानों के चीन भेजे जाने का डर बढ़ गया है जहाँ लौटने के बाद उनके नज़रबंद होने और उन पर अत्याचार शुरू हो जायेंगे।’ जर्मनी और स्वीडन वर्ष 2018 में की सरकारों ने अलग-अलग प्रस्ताव पारित कर नीतिगत फ़ैसला लिया कि वो अपने देश में रह रहे वीगर शरणार्थियों को वापस चीन नहीं भेजेंगे।

यूरोपीय संसद ने इसी तरह  दो प्रस्ताव पारित कर यूरोपीय संघ के सदस्य देशों से अनुरोध किया कि वो भी निर्वासन में रह रहे वीगर मुसलमानों को चीन वापस ना भेजें। उसी तरह मलेशिया ने भी इसी तरह का प्रस्ताव पारित किया है। पूरे विश्व में अगर वीगर मुसलमान शरणार्थियों की तादाद सबसे ज़्यादा किसी देश में है तो वो तुर्की ही है। तुर्की हमेशा से वीगर और चीन के रहने वाले तुर्क मुसलामानों के मामले को लेकर गंभीर रहा है।

 

तुर्की और वीगर मुसलामानों का सम्बन्ध,ऐतिहासिक है

दिल्ली स्थित थिंक टैंक विवेकानंद इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन के यथार्थ कचियार के अनुसार, ‘तुर्की और वीगर मुसलामानों का सम्बन्ध ऐतिहासिक है, यह तब शुरू हुआ जब 1873 में ओटोमन साम्राज्य के सुलतान अब्दुल अज़ीज़ ने चीन के कुइंग साम्राज्य से लड़ने के लिए हथियारों का ज़खीरा भेजा। उसके बाद से पूर्वी चीन के शिनजियांग प्रांत के रहने वाले वीगर मुसलमान नेतृत्व और शरण के लिए हमेशा से ही तुर्की पर आश्रित रहे हैं।

1949 में कम्युनिस्ट क्रांति के बाद माओ त्से तुंग ने चीन के इस इलाक़े को पूरी तरह से अधिग्रहित कर लिया था। चीन से बचकल निकले मुस्लिमों ने जबरन नसबंदी का इल्ज़ाम लगाया है.उसी समय से बड़े पैमाने पर वीगर और तुर्क मूल के मुसलामानों का इस प्रांत से पलायन शुरू हुआ और वो तुर्की में ही राजनीतिक शरण लेते रहे। अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र भी तुर्की में शरण लेने वाले वीगर मुसलामानों को मदद देते रहे।

तुर्की ने भी उन्हें अपनी नागरिकता दी।तुर्की के अक्सराय और ज़ेय्तिनबुर्नु ऐसे इलाक़े हैं जहां पचास के दशक से ही वीगर मुसलमान शरणार्थी आकर बसते रहे। इसी साल मई के महीने में अमेरिका में तुर्की के राजदूत सेरदार कीलिक ने तुर्की और वीगर मुसलमानों के सांस्कृतिक और जातीय संबंधों को दोहराते हुए कहा था कि उनके देश के लिए ये सम्बन्ध बहुत महत्वपूर्ण हैं। लेकिन कुछ सालों से चीन और तुर्की काफ़ी क़रीब होने लगे हैं।’

इतना कि तुर्की पर आरोप लगने लगे कि वो उन वीगर मुसलमान शरणार्थियों को जिन पर आतंकी मामलों में शामिल होने का आरोप लगा उन्हें वो चीन के हवाले करता रहा है। इस प्रत्यर्पण संधि से क्या हो सकता हैहालांकि तुर्की सीधे तौर पर तो इन शरणार्थियों को चीन के हवाले नहीं करता, मगर आरोप हैं कि वो उन्हें ताजिकिस्तान भेज देता है जहां से उनका चीन के लिए प्रत्यर्पण आसान हो जाता है।

तुर्की हमेशा से ही चीन के वीगर और तुर्क मूल के मुसलमानों को पनाह देता आया है : चीन

चीन पर जो गंभीर आरोप लगे हैं वह है कि चीन वीगर मुसलमान औरतों की जबरन नसबंदी करा रहा है। हालाँकि चीन ने इस आरोप से अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा है कि ये एक  तरह का सफेद झूठ है।

दूसरी तरफ़ वीगर मुसलामानों के लिए तुर्की की नागरिकता लेना भी अब मुश्किल होता जा रहा है।तुर्की में रह रहे कई वीगर मुसलामानों का आरोप है कि उन्हें चीन से पुलिस फ़ोन पर धमकी देती है कि अगर वो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना बंद नहीं कर देते तो शिनजियांग में उनके रिश्तेदारों को सताया जायेगा।

वीगर मुसलमानों को लेकर लगे सभी आरोपों का खंडन करते हुए चीन ने कहा है कि उसकी नीतियाँ सिर्फ़ वीगर मुसलमानों को आतंकवाद से दूर रखने और उनका आर्थिक रूप से उत्थान करना ही हैं। तुर्की हमेशा से ही चीन के वीगर और तुर्क मूल के मुसलमानों को पनाह देता आया है और मौजूदा वक़्त में तुर्की में रह रहे वीगर और तुर्क मुसलमान शरणार्थियों की तादात लगभग 50 हज़ार के आसपास बतायी जाती है है।

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