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यूएस के विशेष दूत ने की अफगानिस्तान के राष्ट्रपति से भेंट

तालिबान के साथ समझौते को लेकर बातचीत कर रहे अमेरिका के विशेष दूत खलीलजाद ने काबुल में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी से मुलाकात की। अमेरिका के विशेष दूत ज़लमी खलीलज़ाद और तालिबान के बीच राजधानी दोहा में करीब एक साल तक बैठकों का दौर चला था। इस बातचीत का मकसद अफगानिस्तान में अमेरिका की 18 साल की जंग को खत्म करना है। यह समझौता तालिबान की ओर से सुरक्षा की गारंटी देने के बदले में अमेरिकी फौजियों की वापसी पर केंद्रित है। इसमें साथ में बागियों और अफगान सरकार के बीच व्यापक शांति वार्ता और अंततः संघर्ष विराम कराना भी है। इस मामले में एक अधिकारी ने बताया कि खलीलज़ाद 1 अगस्त की शाम को काबुल पहुंचे थे। इसके बाद उन्होंने अशरफ गनी से मुलाकात की और दोहा में समाप्त हुई नौवें दौर की बातचीत के बाद के घटनाक्रम पर भी चर्चा की।

अफगानिस्तान में वर्ष 2001 से जारी खूनी संघर्ष खत्म करने के लिए कतर की राजधानी दोहा में गत दिसंबर से अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता चल रही है। इसमें अमेरिकी पक्ष की अगुआई खलीलजाद कर रहे हैं। यह चर्चा इस लिहाज से अहम है कि तालिबान से हुई बातचीत में अबतक अफगान सरकार को मुख्यत: बाहर रखा गया है और किसी भी समझौते के लिए जरूरी है कि तालिबान गनी से बात करे, लेकिन तालिबान उन्हें अमेरिका की कठपुतली मानता है।

रविवार को खलीलज़ाद ने कहा कि अमेरिका और तालिबान समझौते की ‘दहलीज़’ पर हैं। इस समझौते से हिंसा कम होगी और ‘स्थायी’ शांति का रास्ता बनेगा। बातचीत के अंतिम दौर में जाने के बावजूद अफगानिस्तान में हिंसा चल रही है। 31 अगस्त को तालिबान ने कुंदुज़ पर कब्जा करने की कोशिश की जबकि रविवार को उन्होंने बागलान प्रांत की राजधानी पुल-ए-खुमरी में अभियान शुरू किया।

अफगान अधिकारियों ने 2 अगस्त को बताया कि पुल-ए-खुमरी को तालिबान के लड़ाकों से खाली करा लिया गया है। अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने पहले भी कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि अफगानिस्तान में 28 सितंबर को होने वाले चुनाव से पहले तक शांति समझौते को अंतिम रूप दे दिया जाएगा। दोहा में तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने शनिवार को कहा कि समझौते को लगभग अंतिम रूप दे दिया गया है लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि इसमें अभी क्या रूकावटें आ रही हैं। समझौते की उम्मीद के बीच कई अफगान नेताओं ने इस बात की चिंता जताई है कि अमेरिकी बलों की वापसी के बाद उनके मुल्क में नया गृहयुद्ध छिड़ सकता है। इससे तालिबान शासन की वापसी का खतरा भी हो सकता है।

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