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पाक में अघोषित सेंसरशिप 

पकिस्तान की बोलती बंद है। हर आवाज पर बंदिश है पाकिस्तान में महंगाई से जनता तौबा -तौबा कर रही है। फौजी बूटों तले पकिस्तान में लोकतंत्र ,अघोषित मीडिया सेंसरशिप जैसा माहौल है।

 

इमरान खान ने कई बार माना है कि वे आज़ाद मीडिया के कारण ही प्रधानमंत्री बने हैं, जिसने उन्हें परम्परागत राजनेताओं के खिलाफ काफी जगह दी। पाकिस्तान में 2002 में निजी टीवी चैनल शुरू हुए और तब नेशनल असेंबली में इमरान खान अपनी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के एकमात्र सदस्य थे।

16 साल बाद उन्हें नेशनल असेंबली में 176 सदस्यों का समर्थन प्राप्त है। सेना और सुप्रीम कोर्ट उनके पीछे खड़े हैं लेकिन, मीडिया में अपनी बढ़ती आलोचना उन्हें बर्दाश्त नहीं है। मीडिया उन्हें नवाज़ शरीफ और जरदारी के बराबर  जगह तो दे सकता है लेकिन, अपनी बात से मुकरने के खिलाफ बचाव नहीं कर सकता। उधर, इमरान का कहना है कि यह तो अच्छे नेता की पहचान है।

 

कुछ हफ्ते पहले उन्होंने टीवी पर भाषण में मजहबी कट्‌टरपंथियों को चेतावनी दी थी कि वे कानून को हाथ में न लें पर 24 घंटे के भीतर इससे मुकर गए। वे और सुप्रीम कोर्ट सहित अन्य शक्तिशाली संस्थान विपक्ष के नेताओं के खिलाफ तो दबाव बना रहे हैं पर वे मजहबी कट्‌टरपंथियों को कुछ नहीं कहते। जबकि इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की हत्या और सेना में विद्रोह का आह्वान तक किया था। सत्ता में आने के तीन माह में ही इमरान ने मीडिया का समर्थन खो दिया था । अब पत्रकारों की संस्थाएं ‘अघोषित सेंसरशिप’ और मीडिया को बढ़ते खतरे की शिकायत कर रही हैं। उनका कहना है कि इमरान संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मीडिया को  दी गई आज़ादी की रक्षा करने में नाकाम रहे हैं।

 

दशक बीत गए पर पाकिस्तान में पत्रकािरता के लिए स्थिति दिन–प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। बेशक पिछले एक दशक में पाकिस्तान में मीडिया बहुत बढ़ा है। ज्यादा से ज्यादा युवा इस पेशे में यह सोचकर आ रहे हैं कि मीडिया आज़ाद है और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन रहा है। लेकिन, सच्चाई यह है कि मीडिया अपनी आज़ादी की बड़ी कीमत चुका रहा है। 9/11 के बाद से 120 मीडियाकर्मी मारे गए हैं। फ्रीडम नेटवर्क पाकिस्तान की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक पिछले पांच साल में 26 पत्रकार अपना कर्तव्य निभाते हुए मारे गए। इनमें से कई लोगों को हत्या के पहले अपहरण  कर परेशां किया गया। कई बार हत्यारों का  पता होते हैं पर वे कानून से भी शक्तिशाली होते हैं। दर्जनों पत्रकारों को  पेशा छोड़ने पर मजबूर किया जाता है या उन्हें  अपना गृहनगर छोड़ दिया। जिन्होंने ऐसा नहीं किया उनकी हत्या हो गई।

कुछ दिन पहले वरिष्ठ पत्रकार व एंकर नुसरत जावीद को डॉन न्यूज ने निकाल दिया। उन्हें इमरान का आलोचक समझा जाता है और डाॅन मैनेजमेंट ने उनसे कहा कि सरकार ने विज्ञापन बंद कर दिए हैं और चैनल आर्थिक संकट में आ गया है। दुनिया टीवी के इमरान समर्थक मोईन पीरजादा के साथ भी यही हुआ। कोई नहीं जानता कि मीडिया पर ऐसा दबाव कौन डाल रहा है। कुछ दिन पहले कुछ हथियारबंद लोगों ने बिना वर्दी कराची प्रेस क्लब पर छापा मारा। उन्होंने कहा कि वे किसी आतंकी को खोज रहे हैं। फिर वे चले गए। अगले दिन उन्होंने  स्थानीय पत्रकार नसरुल्लाह को बिना वारंट उनके घर से उठा लिया। पत्रकारों के विरोध के बाद उन्हें आतंकवाद विरोधी कोर्ट में पेश किया गया और पुलिस ने उनके घर पर पुरानी जेहादी पत्रिका पाए जाने के आधार पर उन्हें रिमांड पर ले लिया। सिंध की पीपीपी सरकार को नहीं मालूम कि गिरफ्तारी का आदेश किसने दिया। उनके साथियों ने फौज पर आरोप लगाया पर फौज के अफसर इससे इनकार करते हैं। पत्रकार मानते हैं कि यह सारे पत्रकारों को संदेश है कि वे हद में रहें।इससे पहले डाॅन के वरिष्ठ पत्रकार साइरिल अलमिदा पर नवाज़ शरीफ का इंटरव्यू लेने पर देशद्रोह का आरोप लगा दिया गया था , जबकि मामला तभी का है जब शरीफ की पार्टी का शासन था। पीएमएल-एन के प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी उनकी मदद नहीं कर पाए। आज इमरान मीडिया की मदद नहीं कर पा रहे हैं।

पाकिस्तान में ज़िंदगी ही नहीं, पत्रकारों की नौकरियां भी खतरे में हैं। एक इमरान विरोधी चैनल ‘वक्त न्यूज़’ हाल में बंद कर दिया गया। आगामी दिनों में और भी टीवी चैनल बंद हो सकते हैं। पाकिस्तान की नई पीढ़ी अघोषित सेंसरशिप को स्वीकार नहीं करेगी। यदि इमरान खान मीडिया की मदद नहीं करते तो इतिहास में उन्हें लोकतंत्र-विरोधी ताकतों का गुलाम कहा जाएगा।

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