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महिलाओं के लिए असुरक्षित होता तुर्की

तुर्की में वर्ष 2020 में कम से कम 300 महिलाओं की हत्या हुई थी, वहीं इसी साल 2024 में करीब 92 महिलाओं की हत्या कर दी गई। फरवरी महीने में एक ही दिन 7 महिलाओं की हत्या की खबर सामने आई थी तो मार्च में तुर्की के दक्षिण शहर मर्सिन में 31 वर्षीय महिला की हत्या उसके पूर्व पति द्वारा की गई। जिसके बाद से ही देश की राजधानी अंकारा में हजारों महिलाओं ने सरकार के खिलाफ आक्रोश प्रकट किया जो अभी भी जारी है

एक समय था जब तुर्की में 38 यूरोपीय देशों ने इस्तांबुल कन्वेंशन संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इसका मकसद तुर्की समेत अन्य देशों में महिलाओं के खिलाफ होने वाली घरेलू हिंसा को रोकना और समाज को लैंगिक समानता के लिए प्रोत्साहित करना था। इसकी स्थापना में तुर्की ने अग्रणी भूमिका निभाई थी और इस पर हस्ताक्षर करने और इसकी पुष्टि करने वाला तुर्की पहला देश था। लेकिन साल 2021 में खुद तुर्की के इस संधि से बाहर होने के बाद महिलाएं घर के बाहर ही नहीं घर के भीतर भी अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रही हैं। तुर्की सरकार द्वारा ऐसे कई कदम उठाए गए हैं जो महिला अधिकारों के खिलाफ हैं। वहीं समान अधिकार विरोधी सोच और वक्तव्य अब मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बनते जा रहे हैं। ऐसे में तुर्की की महिलाओं को अपनी असुरक्षा का डर सता रहा है।

इस बात का अंदाजा जर्मनी की एक संस्था की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। इस रिपोर्ट के अनुसार तुर्की में वर्ष 2020 में कम से कम 300 महिलाओं की हत्या कर दी गई थी। वहीं इसी साल 2024 में करीब 92 महिलाओं की हत्या कर दी गई है। फरवरी महीने में एक ही दिन 7
महिलाओं की हत्या की खबर सामने आई थी। ऐसे में महिलाओं का आक्रोश सरकार के खिलाफ बढ़ता जा रहा है। मार्च महीने मे तुर्की के दक्षिण शहर मर्सिन में 31 वर्षीय महिला की हत्या उसके पूर्व पति द्वारा कर दी गई थी। इस खबर के बाद से ही महिलाएं विरोध प्रदर्शन के लिए सड़कों पर हैं। शुरूआती महीनों के दौरान अपनी असुरक्षा की डर की वजह से राजधानी अंकारा में हजारों महिलाओं ने सरकार के खिलाफ विरोट्टा प्रदर्शन कर अपना आक्रोश प्रकट किया था।

असल में 20 साल से देश की सत्ता पर काबिज रजब तैयिब इर्दाेगान तुर्की के राष्ट्रपति हैं। साल 2001 में उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित नई जस्टिस और डेवलपमेंट पार्टी (एकेपी) की स्थापना की थी। जिसे संसद में बहुमत प्राप्त हुआ। इसके एक साल बाद इर्दाेगान तुर्की के प्रधानमंत्री बने। तुर्की में एक वक्त ऐसा रहा है जब इर्दाेगान को महिला मतदाताओं से बड़ा समर्थन मिलता था। धर्मनिरपेक्ष तुर्की में सार्वजनिक जगहों पर हिजाब पहनने पर प्रतिबंध के चलते कई महिलाएं न उच्च शिक्षा पा सकती थीं न दफ्तरों में काम कर सकती थी। इसलिए ये महिलाएं इर्दाेगान का समर्थन करती रहीं हैं। उदारवादी और नारीवादी महिलाएं भी इर्दाेगान का समर्थन करती थीं क्योंकि उन्हें लगता था कि हिजाब पर प्रतिबंध रूढ़िवादी महिलाओं के अधिकारों का हनन है। इर्दाेगान की एकेपी पार्टी ने महिलाओं के सशक्तिकरण, राजनीति और समाज में उनकी भूमिका की बात की थी। तत्कालीन समय में इस पार्टी ने महिलाओं को पार्टी के कामकाज से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया और देश में कई महिला संगठन उभरने लगे। रूढ़िवादी महिलाओं के सशक्तिकरण में मदद मिली। महिला मतदाताओं के लिए दूसरा बड़ा मुद्दा घरेलू हिंसा का था।

इसका समाधान निकालते हुए इर्दाेगान ने तुर्की को इस्तांबुल कन्वेंशन यूरोपीय संघ की संधि का हिस्सा बनाया। जिसका उद्देश्य लिंग आधारित हिंसा को रोकने के लिए कानून बनाना और कार्रवाइयां करना था। एक समय तुर्की की बड़ी महत्वाकांक्षा यूरोपीय संघ में शामिल होने की थी जिसके लिए आवश्यक शर्तें पूरी करने के लिए इर्दाेगान कदम उठा रहे थे। इस्तांबुल कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने वाला पहला देश तुर्की था। उस दौरान इर्दाेगान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें एक सुधारक के रूप में देखा जा रहा था। हालांकि वो अपनी इस छवि को कायम न रख सके। कुछ सालों के बाद उनके बयानों से ट्टार्मनिरपेक्ष महिलाएं नाराज भी हो गईं।

एक वक्त महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों का समर्थन करने वाले इर्दाेगान ने एक भाषण के दौरान कहा कि महिलाएं मर्दों के बराबर नहीं हैं और एक अन्य भाषण में कहा कि मां बनना एक महिला की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। इन्हीं के शासन में 2013 में इस्तांबुल के मध्य में एक पार्क बनाने के सरकारी प्रोजेक्ट के विरोध में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ क्रूरता से कार्रवाई की, जिसके बाद स्थिति और खराब हो गई। इर्दाेगान तानाशाही अपनाने लगे और विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करने वाली महिलाओं को निशाना बनाया गया। दूसरी तरफ उन्होंने रूढ़िवादी महिलाओं को आर्थिक सहायता और सार्वजनिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका देना शुरू कर दिया जिसके चलते धर्मनिरपेक्ष महिलाओं का उनके प्रति आक्रोश तेजी पकड़ने लगा।

साल 2015 में आया बड़ा बदलाव

एजेल बूसे सोनमैजोसेक एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार वकील हैं जो तुर्की के मानवाधिकार गुटों से भी जुड़ी हुई हैं। उनके कहना है कि गेजी विरोध प्रदर्शनों के बाद से ही लैंगिक समानता के लिए आयोजित प्राइड मार्च में महिलाओं के भाग लेने का भी विरोध होने लगा। साल 2015 में एक बड़ा बदलाव आया उस साल अधिकारिक दस्तावेजों से लैंगिक जानकारी हटा दी गई। इसके बाद कई लैंगिक विरोधी नीतियां अपनाई गईं और सरकार समर्थक एनजीओ बनाए गए जो महिलाओं को पहले से मिले अधिकारों पर हमला करने लगे। इसी के परिणाम स्वरूप साल 2020 में इस्तांबुल कन्वेंशन को निशाना बनाते हुए गलत प्रचार शुरू किया गया। तुर्की ने कहा कि यह संधि पारिवारिक मूल्यों के खिलाफ है और समलैंगिकता को बढ़ावा देती है। डॉक्टर एजेल सोनमैजोसे ने बताया कि आट्टिाकारिक तौर पर यह कहा गया कि इस्तांबुल कन्वेंशन का इस्तेमाल समलैंगिक लोग समलैंगिकता को सामान्य बनाने के लिए कर रहे हैं। इसके अलावा तुर्की सरकार ने यह भी कहा कि देश में घरेलू हिंसा से निपटने के लिए कानून मौजूद है। हालांकि यह कानून इस्तांबुल कन्वेंशन के साथ काम करता था और उसे इस संधि के साथ जोड़ कर देखा जाता था।

इस्तांबुल कन्वेंशन संधि से बाहर हुआ तुर्की

विश्व भर में महिला सुरक्षा को सबसे पहले देखा जाता है। लेकिन तुर्की एक ऐसा राष्ट्र है जो महिलाओं को हिंसा से बचाने वाली ऐतिहासिक अंतर्राष्ट्रीय संधि से 1 जुलाई 2021 को औपचारिक रूप से बाहर हो गया था। ऐसे में महिलाओं का आक्रोश सरकार के प्रति और बढ़ गया। क्योंकि इस्तांबुल कन्वेंशन संधि महिलाओं के लिए अहम मानी जाती थी। यह ऐसी संधि थी जो तुर्की के घरेलू हिंसा कानून को मजबूती प्रदान करती थी। साल 2021 के जून महीने में तुर्की सरकार के खिलाफ हजारों महिलाओं ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा था कि वे ‘काउंसिल ऑफ यूरोप्स इस्तांबुल’ संधि से तुर्की को बाहर नहीं निकलने देंगी। तुर्की राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दाेगान ने इस प्रदर्शन के करीब तीन महीने पहले ही संधि से तुर्की को अलग करने का फैसला ले लिया था।

इसके बाद राष्ट्रपति ने प्रदर्शनों को शांत करने के लिए महिलाओं के खिलाफ हिंसा से निपटने की अपनी खुद की कार्य योजना की घोषणा की थी। जिसमें न्यायिक प्रक्रियाओं की समीक्षा, संरक्षण सेवाओं में सुधार और हिंसा पर आंकड़े जुटाने जैसे लक्ष्य तय किए जाने शामिल थे। हालांकि तुर्की की महिलाओं को इस घोषणा की कोई खुशी नहीं हुई, बल्कि वे तुर्की सरकार का तेजी से विरोध करने लगी। महिलाओं का कहना है कि अब न तो वो चुप होंगी, न डरेंगी और न ही झुकेंगी। लोगों को हैरानी है कि तुर्की महिला सुरक्षा में सुधार करने की बजाय उनसे उनके अधिकार छीन रही है। राष्ट्रपति इर्दाेगान बार-बार अपने उठाए गए इस कदम का बचाव करते नजर आ रहे हैं। तत्कालीन समय में उन्होंने कहा था कि हमारी लड़ाई इस्तांबुल कन्वेंशन से शुरू नहीं हुई थी और इस संधि से बाहर निकलने पर ये लड़ाई खत्म भी नहीं हुई है। इर्दाेगान के फैसले के खिलाफ अदालत में एक याचिका भी दायर की गई थी, जिसे खारिज कर दिया गया। यही नहीं विपक्षी दलों द्वारा सरकार के इस फैसले का विरोध किया गया। महिलाओं से जुडे़ कई संगठनों का कहना है कि इस्तांबुल कन्वेंशन से बाहर होकर तुर्की ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। अमेरिका और यूरोपीय संघ ने भी तुर्की की आलोचना की है।

खोखला हुआ घरेलू हिंसा संबंधी कानून

एजेल बूसे सोनमैजोसेक के अनुसार तुर्की के इस्तांबुल कन्वेंशन से बाहर होने के बाद घरेलू हिंसा संबंधी कानून खोखला हो गया है। पुलिस अधिकारी भी असमंजस में हैं कि यह कानून अस्तित्व में है या नहीं। ऐसे में महिलाओं के साथ हिंसा तेजी से बढ़ती जा रही है। कई रिपोर्टों से पता चलता है कि महिलाओं पर हमला करने वालों में कानून का डर खत्म हो गया है। डॉक्टर एजेल बूसे सोनमैजोसेक के अनुसार तुर्की सरकार यह नहीं चाहती कि इस मामले में अंतराष्ट्रीय स्तर पर उनपर ऊंगली उठाई जाए यही वजह है कि सरकार महिला हत्या के मामले बढे हैं या नहीं इससे संबंधित आकड़े जारी नहीं कर रही है। सरकार को यह भी डर है कि कई नारीवादी संगठन हैं जो इन आकड़ों को आधार बनाकर महिलाओं के संदर्भ में कानून और नीति बनाने पर जोर दे रहे हैं। हालांकि एजेल बूसे सोनमैजोसेक का कहना है कि ‘वी विल स्टॉप फेमीसाइड’ नाम की एक संस्था इन मामलों पर नजर रख रही है। सरकार इस संस्था को बंद करने की असफल कोशिश भी कर चुकी है।

इस संस्था के मुताबिक पिछले साल पुरुषों द्वारा करीब 315 महिलाओं की हत्या की जा चुकी है। इनमें से 65 प्रतिशत मामलों में महिलाओं की हत्या उनके घर के अंदर हुई है। जबकि उसी साल 248 महिलाओं की मौत संदेहास्पद स्थिति में हुई थी। यह संदेहास्पद इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि इन मामलों को हत्या के मामले के तहत दर्ज नहीं किया गया बल्कि दुर्घटना बताया गया। यह चौंकाने वाली बात है कि पूरे देश में महिलाएं अपनी बालकनी और खिड़की से गिर कर मर रहीं हैं और उनकी संख्या बेहद गंभीर है, हालांकि तुर्की में इस समस्या के प्रति जागरूकता भी बढ़ रही है और रूढ़िवादी महिलाएं भी इसके लिए आवाज उठा रही हैं।

चुनाव पर भी पड़ा असर

महिला सुरक्षा और उनके अधिकारों को नजर अंदाज करने का खामीजियाना रजब तैयिब इर्दाेगान को देश में हुए चुनाव में भुगतना पड़ा। इस्तांबुल और अंकारा सहित कई बड़े शहरों के नगर निगम चुनावों में इस साल मार्च में मुख्य विपक्षी दल सीएचपी ने बड़ी जीत हासिल की। हालांकि इर्दाेगान तीसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव तो जीत गए लेकिन उनकी पार्टी एकेपी को 20 साल में पहली बार इतना भारी नुकसान उठाना पड़ा। जनता ने इस चुनाव में विपक्ष को जनादेश देकर सरकार को चेतावनी देने का प्रयास किया है कि वो सही रास्ते पर नहीं चल रही है, वहीं विपक्षी दल के प्रति तुर्की नागरिकों का झुकाव बढ़ता जा रहा है। विपक्षी दल सीएचपी ने कई शहरों में महिलाओं को उम्मीदवार बनाया जिससे पता चलता है कि लोग युवा और महिला राजनेताओं का समर्थन कर रहे हैं। इसके विपरीत राष्ट्रपति इर्दाेगान की निर्भरता उनके गठबंधन के कट्टरपंथी घटक दलों पर बढ़ गई है। रूढ़िवादी महिलाओं के लिए भी इन कट्टरपंथी दलों की सोच चिंताजनक है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उनके गठबंधन की एक सबसे बड़ी पार्टी तलाक के बाद पति की संपत्ति में पत्नी को आधा हिस्सा देने के ख़िलाफ है। अगर पति की कमाई पत्नी की आय से ज्यादा है तो उसे पत्नी को खर्च के लिए पैसे देने होते हैं। वो इसके भी खिलाफ है। वहीं गठबंधन के अतिरुढ़िवादी इस्लामी दल महिलाओं को पुरुषों के बराबर नहीं मानते और उन्हें समान अधिकार देने के खिलाफ हैं। इर्दाेगान की पार्टी एकेपी भी अपने मूल सिद्धांतों से बहुत दूर जा चुकी है।

क्या है इस्तांबुल संधि
इस्तांबुल कन्वेशन के नाम से जानी जाने वाली ये संधि वर्ष 2011 में लागू हुई थी। तुर्की के बड़े शहर इस्तांबुल में 38 यूरोपीय देशों ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इसका मकसद तुर्की समेत अन्य देशों में महिलाओं के खिलाफ होने वाली घरेलू हिंसा को रोकना और समाज को लैंगिक समानता के लिए प्रोत्साहित करना था। इसकी स्थापना में तुर्की ने अग्रणी भूमिका निभाई थी और यह इस पर हस्ताक्षर करने और इसकी पुष्टि करने वाला पहला देश था और इस संधि से बाहर होने वाला भी पहला देश है।

गौरतलब है कि एक सर्वेक्षण से पता चला कि यूरोप में तीन में से एक महिला ने शारीरिक और यौन हिंसा, बीस में से एक ने बलात्कार, दो में से एक ने यौन उत्पीड़न और पांच में से एक ने पीछा करने का अनुभव किया है। हिंसा के इस रूप के बारे में बढ़ती जागरूकता और इसकी रोकथाम के लिए पहल के बावजूद, यह समाज के कई स्तरों पर मौजूद है। कोरोना महामारी के बाद से महिलाओं की और भी दयनीय स्थिति हो गई है। अलगाव और कारावास की नीतियों ने महिलाओं पर हिंसा के मामले में नकारात्मक प्रभाव डाला है और साथ ही उनके पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ उनकी आर्थिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को भी प्रभावित किया है। ऐसे में तुर्की महिलाओं के लिए ज्यादा खतरनाक देश बनता जा रहा है।

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