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ट्रम्प की मुश्किलें

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड टं्रप एक और पारी खेलना चाहते हैं। 2020 में होने वाले चुनाव के लिए उन्होंने तैयारियां शुरू कर दी हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी लोकप्रियता का ग्राफ ऊपर नहीं चढ़ पा रहा है। ईरान के खिलाफ इन दिनों उन्होंने जो उग्र तेवर दिखाए हैं उससे भी जनता कोई खास प्रभावित नहीं हो पा रही है।

राष्ट्रपति टं्रप भले ही कहते आए हों कि उनका कार्यकाल सबसे बेहतर रहा है, लेकिन अमेरिका के हालात को देखकर लगता है कि देश अभी भी अपनी नीतिगत अनिश्चिंता से उबर रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वे जो नीतियां अपनाते हैं, उन्हें देश के लोग संदेह की दृष्टि से भी देखते हैं कि आखिर टं्रप की मंशा क्या है? टं्रप बेशक खुद को लोकप्रिय राष्ट्रपति मानते हों, लेकिन हकीकत यह है कि लोकप्रियता के मानदंडों पर अपने कार्यकाल के दौरान बिल क्लिटन की स्वीकार्यता का प्रतिशत काफी कम रहा था, लेकिन फिर भी यह आंकड़ा टं्रप की तुलना में 15 फीसदी बेहतर था। डोनाल्ड टं्रप ने अपने कार्यकाल में कुछ बड़े फैसले लिये। अपने कार्यकाल के पहले दिन ही उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के एफोरडेबल एक्ट का विखंडन किया। मैक्सिको -अमेरिका की सीमा पर दीवार खड़ी करने का फैसला लिया। अमेरिका आने वाले मुस्लिम देशों के यात्रियों पर बैन लगा दिया गया। सत्ता में आने के तीन दिन बाद ही टं्रप द्वारा 12 देशों के संगठन ट्रांस-पेसिफिक पार्टनरशिप से (टीपीपी) अमेरिका को अलग कर लिया गया। एच1 बी बीजा पर भी पाबंदी लगाई। इन सभी निर्णयों को लेकर उनका कार्यकाल काफी चर्चा में रहा है।

बहरहाल अमेरिका में 2020 में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। इसके लिए डोनाल्ड ने बाकायदा चुनाव प्रचार शुरू कर लिया है। पिछले दिनों फ्लोरिडा में उन्होंने अपनी पहली सभा भी की। इस सभा में करीब 20 हजार लोग जुटे। लोगों को संबोधित करते हुए टं्रप ने एक बार फिर अमेरिका को महान बनाने की बात कही। टं्रप ने वादा किया कि वे अपने दूसरे कार्यकाल में एड्स और अन्य बीमारियों को खत्म कर देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि डेमोक्रट्स नेता अमेरिका की अर्थव्यवस्था को नष्ट करना चाहते हैं। इनके कारण दुनिया अमेरिका से ईर्ष्या करती है। इस बार टं्रप का नारा है-‘मुझे वोट देने का मतलब अमेरिका और समाजवाद को सशक्त बनाना।’ टं्रप हर तरह से अपनी जनता का विश्वास हासिल करने की कोशिश में जुटे हुए हैं, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनके लिए यह काफी चुनौतीपूर्ण होगा। लोग उनकी नीतियों से खुश नहीं हैं।

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