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ट्रंप और किम की मुलाकात का महत्‍व

दो ऐसे देश बहुत खुशी खुशी मिले जो कुछ समय पहले तक एक दूसरे को परमाणु हमले की धमकियां दिया करते थे। बात यहीं खत्‍म नहीं हुई उन्‍होंने तो इस बात का भी ऐलान कर दिया कि अब ये दोस्‍ती लंबे समय तक रहेगी। पूरी दुनिया कि निगाहें इस मुलाकात से थी क्‍योंकि इसमें एक देश तो ऐसा है जो दुनिया का सबसे ज्‍यादा शक्तिशाली देश है और दूसरा देश अब तक सरफिरे देश की कैटेगरी में था जो बात बात पर परमाणु हमला करने की बात करने का आदी था।

यही कारण है कि पूरी दुनिया इस ओर देख रही थी कि अगर अमेरिका की शह मिल गई तो उत्‍तरी कोरिया को क्‍या क्‍या करने की छूट मिल जाएगी। इस मुलाकात को भारत की दृष्‍टि से देखने से पहले अमेरिका और उत्‍तरी कोरिया की दृष्‍टि से देख लेते हैं। जिससे हमे समझ आए कि क्‍योंये दोनों देश एक दूसरे से मिलने के लिए आखिर व्‍याकुल क्‍यों थे।

पहले बात करते हैं सर्वशक्तिमान अमेरिका की। अमेरिका राष्‍ट्रपति डोलाल्‍ड ट्रंप अब तक अपने अकड़ भरे स्‍वाभावके कारण जाने जाते हैं। उन्‍होंने अपने अब तक के कार्यकाल में शायद ही कोई ऐसा फैसला लिया हो जिसे देखकर दुनिया उनकी समझ बूझ की तारीफ करे। इसी बीच उत्‍तरी कोरिया से उनकी तू तू मैं मैं भी हुई और इसके बाद भी एक तानााशाह से प्‍यार से मिलना और उससे आगे अच्‍छे संबंधों की नींव डालने की शुरूआत करना उनकी खुद की छवि के लिए बहुत अच्‍छा है। इसके अलावा चाइनाकी उद्योग विस्‍तार और सीमा विस्‍तार की नीति पर अगर अमेरिका लगाम लगाना चाहता है तो उसे किसी ऐसे देश में अपनी सेना तैनात करनी होगी जो चीन के समीप हो औरऐसे में चीन में निगरानी करने और उसको जल्‍द से जल्‍द सबक सिखाने में उत्‍तरी कोरिया पर नियंत्रण करने से बेहतर कुछ और हो ही नहीं सकता।

उत्‍तरी कोरिया का तानाशाह भी अपने अडियल रवैये के लिए जाना जाता है। बात बात में परमाणु हमले की धमकी देने वाला ये तानाशह पिछले कुछ समय से बदला बदला से दिखाई देने लगा।इसबदलाव के कई कारण बताए गए जिसमें से एक कि वह अपनी छवि एक विकासवादी नेता की बनाना चाहता है क्‍योंकि दुनिया भर से तानाशाही शासन का खत्‍मा पिछले कुछ वर्षों में हुआ हैऔर जिस तरह से उत्‍तर कोरिया के रिसोर्सका दोहन हुआ है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता था कि बहुत जल्‍द ही उत्‍तरी कोरिया भी तानाशाही युग को समाप्‍त करने सड़को पर उतर जाता। इसलिए किम जोग युन ने अपना स्‍वभाव बदला, वरियता बदली और उनसे हाथ मिला लिया जिसको कभी आंख दिखाया करता था।

भारत की दृष्टि से ये मित्रता एक अच्‍छी खबर होगी क्‍योंकि चीन जिस तरह से भारत के पड़ोसी देशों में अपना वर्चस्‍व बढ़ा करपड़ोसियों के साथ हमारे रिश्‍तों को चुनौती देता आया है वैसी ही चुनौती अब उसे उसके चिर प्रतिद्वंदी अमेरिका से मिलेंगी। अब तक उत्‍तरी कोरिया को सिर्फ चीन का समर्थन प्राप्‍त था और पूरे विश्‍व में सिर्फ चीन के साथ ही उसके व्‍यापारिक रिश्‍ते थे। लेकिन अमेरिका से दोस्‍ती के बाद इसमें भी कमी आएगी और चीन के लिए यह नुकसान की बात है। इन परिस्‍थितियों में चीन की मजबूरी हो जाएगी कि एशियन देशों खासकर भारत के साथ रिश्‍ते अच्‍छे बनाए रखें।

भारत हमेशा से ही एक मजबूत उत्‍तरी कोरिया चाहता रहा है जिसका रुझान चीन से ज्‍यादा भारत की ओर हो। 20 साल पहले इसके लिए अटल बिहारी बाजपाई सरकार ने अपना एक प्रतिनिधि भेजकर इसकी शुरूआत की थी और अब वर्तमान परिस्‍थिति को देखकर दो दशक बात भारत से कोई नेता उत्‍तर कोरिया की यात्रा पर गया। सूचना एवं प्रसारण मंत्री मुख्‍तार अब्‍बास नकवी प्‍योंगहोंग के दौरे पर गए। इस यात्रा का सामरिक दृष्‍टि से कोई महत्‍व नहीं था लेकिन उत्‍तरी कोरिया में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के उद्देश्‍य से यह कूटनीतिक यात्रा बहुत महत्‍वपूर्ण थी।

हालांकि भारत की इस कोशिश से चीन और उत्‍तरी कोरिया के रिश्‍ते न तो कमजोर हुए और न ही किम जोग युंग का भारत की ओर रुझान बढ़ा। लेकिन अब इसकी उम्‍मीद ज्‍यादा है क्‍योंक‍ि अगर वास्‍तव में किम यह सोच रहा है कि अब वो उदारवादी शासक के रूप में काम करेगा और उत्‍तरी कोरिया को अलग पहचान दिलाएगा तो एशिया में उसे भारत की ओर जरूर देखना होगा।

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