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सू की का धर्म संकट

म्यामां (बर्मा) में लोकतंत्र की स्थापना के लिए लंबे समय तक संघर्ष कर दुनियाभर में लोकप्रिय हुई नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू की के लिए इस वक्त धर्म संकट की स्थिति आ खड़ी हुई है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी लोकप्रिय छवि का सवाल है, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय अदालत में उन्हें अपने देश का पक्ष रखने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। मानवाधिकार समूहों ने अंतरराष्ट्रीय अदालत में म्यामां की नुमाइंदगी करने के उनके फैसले की आलोचना की है। दूसरी तरफ म्यामां में हजारों की संख्या में लोग उनके पक्ष में रैलियां निकाल रहे हैं कि वे रोहिंग्या मुसलमानों के मसले पर रहेगा स्थित अंतरराष्ट्रीय अदालत में अपने देश का पक्ष मजबूती से पेश करें।

दरअसल, पश्चिम अफ्रीकी देश गांबिया ने संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष अदालत में रोहिंग्या मुसलमानों के मानवाधिकारों का मुद्दा उठाया है। मुस्लिम बहुल गांबिया का आरोप है कि म्यामां ने नरसंहार रोकने में 1948 के समझौते का उल्लंघन किया। वर्ष 2017 में म्यामां में चलाए गए सैन्य अभियान के बाद करीब सात लाख 40 हजार रोहिंग्या लोगों ने पड़ोस के बांग्लादेश में शरण ली थी। गांबिया के न्याय मंत्री अबूबकर तमबादोउ ने अदालत के जजों से कहा, ‘‘गांबिया और म्यामां के बीच बहुत विवाद है। गांबिया आपसे म्यामां से बर्बर कृत्यों को रोकने के लिए कहने का अनुरोध करता है। बर्बरता ने हमारी साझा अंतरात्मा को झकझोर दिया है। उसे अपने ही लोगों के खिलाफ नरसंहार रोकना चाहिए।’’

रवांडा के 1994 के नरसंहार में अभियोजक रहे तमबादोउ ने कहा कि ‘‘हमारी आंखों के सामने एक और नरसंहार हो रहा है और हम इसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं।’’ उन्होंने कहा कि ‘‘कदम नहीं उठाने का मतलब है कि हर दिन लोग मारे जा रहे हैं, हर दिन महिलाओं से बलात्कार हो रहा है और बच्चे दफनाए जा रहे हैं। किस अपराध के लिए? सिर्फ इसलिए कि उनका जन्म दूसरे मजहब में हुआ।’’ रोहिंग्या लोगों को आगे कोई नुकसान नहीं हो, इसके लिए गांबिया आपात प्रावधान लागू करने की मांग कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय अदालत में सुनवाई के समय रोहिंग्या समर्थक प्रदर्शनकारी अदालत के गेट के सामने पहुंच गए। उन्होंने हाथों में तख्तियां ले रखी थी जिस पर लिखा था, ‘न्याय में देरी न्याय से इनकार करना है’, ‘वर्मा रोहिंग्या पर सैन्य कार्रवाई रोके।’ सू की के समर्थन में भी म्यामां के कई शहरों में लोग सड़कों पर उतरे। यांगून और मांडले में बड़ी संख्या में लोगों ने रैलियां निकाली।

गांबिया की ओर से पेश वकीलों ने कहा कि म्यामां में हालिया सप्ताह में बड़े- बड़े पोस्टरों में सू की की तस्वीरें उन जनरलों के साथ थीं, जिन्होंने एक समय उन्हें कैद करके रखा था। यह दिखाता है कि सू की सेना के साथ हैं। म्यामां की नेता आंग सान सू की हेग की अंतरराष्ट्रीय अदालत में रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार से जुड़े आरोपों का सामना करने के लिए पहुंची हैं। रोहिंग्या के मुद्दे पर नोबेल विजेता सू की को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ रही है।

म्यामां में 2017 में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बाद से लाखों लोगों ने पड़ोसी देशों में शरण ली है। वहां की सरकार पर रोहिंग्या लोगों का पूरी तरह सफाया करने के आरोप लग रहे हैं। सू की के साथ एक पूरा प्रतिनिधिमंडल द हेग की अदालत में पहुंचा है। जो अपने देश पर लगे आरोपों का बचाव करेगा। सू की ने अपने देश में लोकतंत्र के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका बहुत सम्मान रहा है। लेकिन रोहिंग्या समुदाय के मुद्दे पर उनकी चुप्पी के कारण उनकी प्रतिष्ठा को ठेस लगी है। मानवाधिकार संस्थाओं का कहना है कि उन्होंने रोहिंग्या लोगों की रक्षा के लिए उचित कदम नहीं उठाए। गांबिया की तरफ से दायर मुकदमे में पेशी के लिए सू की को बुलाया गया है। 57 सदस्यों वाले मुस्लिम सहयोग संगठन की तरफ से गांबिया अदालत से आपात उपाय करने को कहेगा ताकि म्यामां में जारी ‘नरसंहार कार्रवाइयों’ को रोका जा सके। गांबिया ने म्यामां पर 1949 की नरसंहार संधि का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है।

गांबियां ने अदालत से कहा है, ‘इन कार्रवाइयों के दौरान नरसंहार की जो गतिविधियां हुई हैं उनका मकसद एक समूह के तौर पर रोहिंग्या लोगों का पूरी तरह या आंशिक रूप से सफाया करना है। इसके लिए बड़े पैमाने पर हत्याओं, बलात्कार और यौन हिंसा का सहारा लिया जा रहा है। सू की को एक तरह से उन सैन्य जनरलों का बचाव करना होगा। जिन्होंने उन्हें बरसों तक घर पर नजरबंद रखा। सू की ने कहा है कि वह अपने देश के हितों का बचाव करेंगी। उनके मुताबिक यह मामला अंतरराष्ट्रीय अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। उनकी दलील है कि म्यामां सिर्फ चरमपंथियों को निशाना बना रहा है। म्यामां में रोहिंग्या लोगों के खिलाफ 2017 में कार्रवाई होने के बाद से 7.3 लाख से ज्यादा लोग सीमावर्ती रखाइन प्रांत से भागे हैं। इनमें से ज्यादातर लोग बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में बेहद बुरे हाल में जिंदगी बिता रहे हैं। कुछ लोग भारत, मलेशिया और इंडोनेशिया की तरफ भी गए हैं। भारत में तकरीबन 40 हजार रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं। भारत की मोदी सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताया है और इन्हें वापस भेजने की बात कही है। फिलहाल मामला उच्चतम न्यायालय में है।

बांग्लादेश के शिविरों में रह रहे रोहिंग्याओं की जिंदगी कष्टों से भरी है। उन्हें काम करने की इजाजत नहीं है। कई महिलाएं पेट पालने के लिए देह व्यापार में उतर गईं हैं। कुछ को देह व्यापार के लिए विदेशों में भेजा जा रहा है। रोहिंग्या चरमपंथी समूह एआरएसए के विद्रोही लड़ाके कथित तौर पर बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में सक्रिय हैं। चरमपंथियों ने कथित तौर पर शिविरों में भय का माहौल पैदा किया। म्यामां के बहुसंख्यक बौद्ध लोगों और सुरक्षा बलों पर अक्सर रोहिंग्या मुसलमानों को प्रताड़ित करने के आरोप लगते हैं। इन लोगों के पास कोई अधिकार नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र उन्हें दुनिया का सबसे प्रताड़ित जातीय समूह मानता है। ये लोग न तो अपनी मर्जी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकते हैं और न ही अपनी मर्जी काम कर सकते हैं। जिस जगह वे रहते हैं, उसे कभी भी खाली करने को कह दिया जाता है। म्यामां में इन लोगों की कहीं सुनवाई नहीं है। ये लोग दशकों से रखा इन प्रांत में रह रहे हैं, लेकिन वहां के बौद्ध लोग इन्हें ‘बंगाली’ कहकर दुत्कारते हैं। ये लोग जो बोली बोलते हैं, वैसी दक्षिण पूर्व बांग्लादेश के चटगांव में बोली जाती है। रोहिंग्या लोग सुन्नी मुसलमान है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि 2012 में धार्मिक हिंसा का चक्र शुरू होने के बाद से लगभग एक लाख बीस हजार रोहिंग्या लोगों ने रखा इन छोड़ दिया है। इनमें से कई लोग समंदर में नौका डूबने से मारे गए हैं।

मलेशिया और थाइलैंड की सीमा के नजदीक रोहिंग्या लोगों की कई सामूहिक कब्रें मिली हैं। 2015 में जब कुछ सख्ती की गई तो नावों पर सवार हजारों रोहिंग्या कई दिनों तक समंदर में फंसे रहे। रोहिंग्या लोगों की मजबूरी का फायदा इंसानों की तस्करी करने वाले खूब उठाते हैं। ये लोग अपना सब कुछ इन्हें सौंप कर किसी सुरक्षित जगह के लिए अपनी जिंदगी जोखिम में डालने को मजबूर होते हैं। म्यामां से लगने वाले बांग्लादेश में लगभग आठ लाख रोहिंग्या लोग रहते हैं। इनमें से ज्यादातर ऐसे हैं जो म्यामां से जान बचाकर वहां पहुंचे हैं। बांग्लादेश में हाल में रोहिंग्याओं को एक द्वीप पर बसाने की योजना बनाई है।

म्यामां में रोहिंग्या लोगों को एक जातीय समूह के तौर पर मान्यता नहीं है। इसकी एक वजह 1982 का वो कानून भी है जिसके अनुसार नागरिकता पाने के लिए किसी भी जातीय समूह को यह साबित करना है कि वो 1823 के पहले से म्यामां में रह रहा है। रोहिंग्या लोगों की समस्या पर लगभग खामोश रहने के लिए म्यामां में सत्ताधारी पार्टी की नेता आंग सान सू की की अक्सर आलोचना होती है। माना जाता है कि वे इस मुद्दे पर ताकतवर सेना से नहीं टकराना चाहती हैं।

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