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फिर तार-तार हुए रिश्ते

हाल के कुछ वर्षों में भारत-चीन के संबंध सबसे बुरे दौर में पहुंच चुके हैं। अरुणाचल प्रदेश के तवांग में चीन की सैनिकों ने जो उकसावे वाली कार्रवाई की है, उस पर भारत में संसद से सड़क तक चर्चा हो रही है वहीं अंतरराष्ट्रीय नजरिए से भी यह मुद्दा बहुत बड़ा बन गया है। दरअसल इस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों में भारत और चीन की गिनती चाहे अर्थव्यवस्था हो या फिर जनसंख्या के लिहाज से बाजार का गणित दोनों की ताकत जगजाहिर है। ऐसे में इन दोनों देशों के बीच किसी भी तनाव का असर दुनिया के बाकी देशों के अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है

गत् सप्ताह अरुणाचल प्रदेश के तवांग इलाके में स्थित यांग्त्से में भारत और चीन के सैनिकों के बीच झड़प ने एक बार फिर से दोनों देशों के बीच रिश्तों को निचले स्तर पर पहुंचा दिया है। इस झड़प के चलते भारत की चिंता वास्तविक सीमा रेखा के एकदम निकट चीन की ओर से बसाए गए गांवों को लेकर बढ़ गई है, जिनका इस्तेमाल पीपल्स लिबरेशन आर्मी अतिक्रमण के लिए करती रही है। पूरे मामले की जानकारी रखने वाले जानकारों का कहना है कि चीन ने लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक एलएसी के करीब सैकड़ों गांव बसा लिए हैं। इन गांवों के चलते भारतीय सेना को अक्सर अतिक्रमण का सामना करना पड़ता है। खासतौर पर भारतीय चौकियों के निकट जहां आबादी है, वहां अक्सर झड़प के हालात रहते हैं। ऐसे में सवाल है कि आखिर अरुणाचल प्रदेश से चीन को इतना प्यार क्यों हैं कि वह हर बार भारत के इस सूबे पर अपने स्वामित्व का अधिकार कायम करना चाहता है।

हालिया मामला तवांग सेक्टर में चीनी सेना की घुसपैठ का है। बहरहाल भारत और चीन दोनों ही एक-दूसरे पर तवांग सेक्टर में दखल अंदाजी के आरोप लगा रहे हैं। दरअसल वर्ष 1914 में तिब्बत और भारत के बीच कोई सीमा रेखा नहीं थी। यह दौर भारत में ब्रिटिश शासन का था। बस यह मसला वहीं से उठ खड़ा हुआ था जब ब्रिटिश हुकूमत ने वर्ष 1906 में भारत और तिब्बत की सीमा रेखा वाला नक्शा बनाया था और इसी के आधार पर साल 1914 से मैकमोहन लाइन अस्तित्व में आई थी। तब से अब तक भारत और चीन के देशों के बीच यह मसला बार-बार जंग तक के हालात पैदा करता रहा है। तवांग सेक्टर में दोनों देशों की ये झड़प गंभीर रूप भी ले सकती है, क्योंकि दोनों ही देश दक्षिण एशिया पर अपना दबदबा कायम करने की चाह रखते हैं।

तवांग पर भारत सरकार का रुख
बीते 12 दिसंबर को ही देश के मीडिया में तवांग सेक्टर में चीन की घुसपैठ की खबरें आम थीं। इसके बाद भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 13 दिसंबर को संसद में यह जानकारी दी कि अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में बीते हफ्ते 9 दिसंबर को चीनी सेना (पीएलए) के साथ हुई झड़प में कुछ भारतीय सैनिक घायल हुए हैं, लेकिन कोई भी सैनिक मारा नहीं गया है। उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय सैनिकों ने पीएलए की इस कोशिश को नाकाम कर दिया है। द टेलीग्राफ अखबार के मुताबिक रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से लिखा है कि भारतीय सैनिकों की तुलना में इस झड़प में चीनी सैनिक अधिक घायल हुए हैं।

इसके बाद से ही यह मामला पूरी दुनिया में बहस का मुद्दा बना हुआ है। दुनिया को भी लगता है कि दक्षिण एशिया के इन दोनों ताकतवर देशों की यह पुरानी अदावत कभी भी जंग के हालात पैदा कर सकती है। क्योंकि चीनी सेना ने तवांग सेक्टर के सबसे ऊंचाई वाले समतल इलाके यांग्त्से में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अतिक्रमण की कोशिश की थी। इसे लेकर भारत के रक्षा मंत्री ने कहा था कि भारतीय सेना ने चीन की इस जबरदस्ती की दखलअंदाजी का माकूल जवाब दिया है। इसे लेकर भारत सरकार काफी संजीदा हो गई है। उधर विपक्षी पार्टी कांग्रेस के सीनियर लीडर शशि थरूर ने भी चीन को लेकर सरकार को आगाह किया। थरूर ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि चीन की नजर तवांग पर है इसके लिए हमें सतर्क रहना होगा।

चीन का ये है जवाब
चीन की सेना ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ (पीएलए) के वेस्टर्न थिएटर कमांड के प्रवक्ता सीनियर कर्नल लॉन्ग शाओहुआ ने दावा किया कि जब 9 दिसंबर को तड़के वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के अपनी तरफ के डोंगझांग’ इलाके में चीनी सैनिक नियमित गश्त पर थे तो भारतीय सैनिकों ने रोका था जो अवैध तरीके से एलएसी पार कर उनकी तरफ आए थे। उनका कहना है कि इसके बाद ही चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच झड़प हुई। पीटीआई के मुताबिक सीनियर कर्नल लॉन्ग शाओहुआ ने अपने बयान में कहा, ‘हमारे सैनिकों का जवाब पेशेवर, मजबूत और आदर्श है, जिसने हालातों को स्थिर करने में मदद की है। हम भारतीय पक्ष से सीमा पर तैनात उनके सैन्य बलों को सख्ती से काबू और संयमित करने को कहते हैं और अमन चैन बनाए रखने के लिए चीनी पक्ष के साथ काम करने के लिए कहते हैं।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेन बिन ने कहा है कि भारत-चीन के बीच सरहदों पर मौजूदा हालात सामान्य तौर पर स्थिर है और दोनों पक्षों में रणनीतिक और सैन्य अधिकारियों के जरिए इस मुद्दों को लेकर सहज बातचीत जारी है। हालांकि वांग ने यांग्त्से इलाके में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच 9 दिसंबर की झड़प को लेकर कुछ भी नहीं कहा। गौरतलब है कि जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में दोनों पक्षों के बीच घातक मुठभेड़ के ढाई साल बाद तवांग में झड़प हुई है। बीते हफ्ते भारत के अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में यह झड़प उस इलाके में हुई है जिसे चीन दक्षिणी तिब्बत का नाम देता आ रहा है। वह इस इलाके को अपना हिस्सा मानता है। अरुणाचल प्रदेश में भारत और चीन के बीच सीमा को लेकर एक राय नहीं है। इसके लिए दोनों देश अपने अलग- अलग दावे करते रहे हैं, इस सूबे के 90 हजार वर्ग किलोमीटर पर चीन अपना दावा ठोकता है। चीन अरुणाचल प्रदेश में मैकमोहन लाइन को भी तवज्जो नहीं देता।

उधर भारत पश्चिम में ऑक्साई चीन के 38 हजार वर्ग किमी के इलाके के चीन का होने के दावे से संबंध नहीं रखता। भारत का मानना है कि साल 1962 की जंग में चीन ने यह इलाका जबरन कब्जाया है। भारत इस इलाके को अपना मानता है। चीन इस इलाके में जी-695 हाइवे की योजना बना रहा है। यह हाइवे भारत की सीमा से गुजरते हुए चीन के शिन्जियांग को तिब्बत से जोड़ेगा।

मैकमोहन रेखा जिससे चीन को है इंकार

जब भारत में अंग्रेजों का शासन था उस वक्त भारत और तिब्बत के बीच सीमा रेखा नहीं थी। वर्ष 1906 में ब्रिटिश सरकार ने भारत और तिब्बत की सीमा को लेकर एक नक्शा बनाया। इसके आधार पर एक सीमा रेखा बनाई गई और इस दौर में 1914 एक ऐसा साल भी आया जब भारत और तिब्बत के बीच सीमा रेखा को लेकर शिमला समझौते को अमलीजामा पहनाया गया। 3 जुलाई 1914 को सीमा विवाद खत्म करने के लिए शिमला के यूएस क्लब में चीन, ब्रिटिश सरकार और तिब्बत के अधिकारियों के बीच बैठक हुई थी।

बैठक में अरुणाचल की सीमाओं का सही प्रकार से बंटवारे पर चर्चा हुई। चीन ने समझौते पर दस्तखत करने से मना कर दिया था। हालांकि इस समझौते पर ब्रिटिश हुकूमत के तत्कालीन विदेश सचिव सर हेनरी मैकमोहन और तत्कालीन तिब्बत सरकार के नुमाइंदों ने दस्तखत किए थे। सीमारेखा का नाम भी समझौते में अहम भूमिका निभाने वाले हेनरी मैकमोहन के नाम पर रखा गया। चीन ने इस समझौते को मानने से साफ इंकार कर दिया, क्योंकि तिब्बत को चीन अपना राज्य मानता था। बवाल यहीं से शुरू हुआ और इसकी सूत्रधार ब्रिटिश हुकूमत ही रही थी। साल 1929 में समझौते पर ब्रिटिश सरकार ने नोट लगाकर इस समझौते को वैध करार दिया था। साल 1935 में अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी ओलफ केरो ने तत्कालीन अंग्रेज सरकार को इसे आधिकारिक तौर पर लागू करने का अनुरोध किया।

इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने आधिकारिक तौर पर 1937 में मैकमोहन लाइन को दिखाता हुआ नक्शा जारी किया। इसके साथ ही 1938 में चीन को शिमला समझौते को लागू करने को कहा। हालांकि 1950 में चीन ने भारत से साफ कहा कि वह 1914 के शिमला समझौते को मान्यता नहीं देता है। उसने इसके पीछे तर्क दिया था कि तिब्बत चीन के अधीन है न कि कोई आजाद देश है। भारत को 1947 में आजादी मिल गई थी और उसने मैकमोहन रेखा को अपनी सीमा होने का एलान कर तवांग क्षेत्र (1950-51) पर अपना आधिकारिक दावा किया था। 1947 में, तिब्बती सरकार ने मैकमोहन रेखा के दक्षिण में तिब्बती जिलों पर दावा करते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय को प्रस्तुत एक नोट लिखा था।

इसके बावजूद बीजिंग में 1949 में सत्ता में आई कम्युनिस्ट पार्टी ने तिब्बत को ‘मुक्त’ करने के अपने इरादे का एलान किया था। 1950 के दशक में जब भारत-चीन के रिश्ते अच्छे हुआ करते थे तब प्रधानमंत्री  जवाहरलाल नेहरू के अधीन भारत सरकार ने हिंदी-चीनी भाई-भाई नारा दिया, लेकिन इसके साथ ही एक शर्त भी रखी थी कि अगर चीन सीमा विवाद को बढ़ावा देगा तो उससे किसी भी तरह की बातचीत को मंजूरी नहीं दी जाएगी। यही वजह रही कि भारत ने 1954 में विवादित इलाके का नाम बदलकर नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी कर दिया था। इसका मतलब यह हुआ कि भारत के तवांग सहित पूर्वोत्तर सीमांत क्षेत्र और बाहरी तिब्बत के बीच सीमा को मान्यता दे दी गई।

मैकमोहन रेखा पूर्वी-हिमालय क्षेत्र के चीन और भारत अधिकृत क्षेत्रों के बीच सीमा को दिखाती है। यह बहुत अधिक ऊंचाई का पहाड़ी इलाका है। यह हिमालय से होते हुए पश्चिम में भूटान से 890 किलोमीटर और पूर्व में ब्रह्मपुत्र तक 260 किलोमीटर तक फैली है। यही सीमा रेखा 1962 के भारत-चीन युद्ध का केंद्र और कारण थी। तवांग कलह की वजह भारत और चीन दोनों देशों के बीच रिश्तों में तनातनी 1951 में चीन के तिब्बत पर कब्जा करने के बाद ही शुरू हो गई थी। चीन तिब्बत की आजादी की बात करता था और भारत उसे आधिकारिक तौर एक आजाद देश मानता था। तब अरुणाचल प्रदेश नहीं बना था। साल 1972 तक यह नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी के तौर पर जाना जाता था। भारत ने 20 जनवरी 1972 को इसे केंद्र शासित प्रदेश बनाया और नाम दिया अरुणाचल प्रदेश।

15 साल बाद साल 1987 इस प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया। मसला यह है कि सूबे का तवांग छठे दलाईलामा का जन्म स्थान है। साल 1683 में वे यहां जन्मे थे। इस वजह से ये तिब्बती बौद्धों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। 1959 में तिब्बत से भारत आने के बाद 14वें दलाईलामा ने तवांग में ही शरण ली और आगे बढ़ने से पहले कुछ दिन मठ में बिताए। जिसका चीन विरोध करता रहा है। साल 2009 में उनके तिब्बत जाने पर भी चीन ने सख्त विरोध किया था। यहां एक 400 साल पुराना बौद्ध मठ भी है। माना जाता है कि इस मठ की वजह से ही सीमा रेखा बनाने का मसला सामने आया। यही वजह है कि चीन तवांग सहित लगभग पूरे अरुणाचल पर अपना दावा करता है।

 

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