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आर्थिक संकट में श्रीलंका

भारत का पड़ोसी मुल्क श्रीलंका अपने 73 बरस के इतिहास के सबसे गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार और विदेशी बैंकों से लिया गया ऋण श्रीलंका की जीडीपी से अधिक हो चला है। जिससे इस देश का दिवाला निकल गया है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदहाली के पीछे श्रीलंका की सरकारों द्वारा सही समय पर सही कदम ना उठाना एक प्रमुख कारण है

भारत का पड़ोसी देश श्रीलंका अबतक के इतिहास में बड़ा आर्थिक संकट से जूझ रहा है। श्रीलंका के ऊपर इतना विदेशी कर्ज हो गया है कि वो ‘दिवालिया’ होने की कगार पर आ गया है। आर्थिक संकट की वजह से श्रीलंका में महंगाई आसमान छू रही है। 2010 से ही श्रीलंका पर विदेशी कर्ज बढ़कर देश के सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में लगातार बढ़ता रहा है। कोरोना संक्रमण से पहले यह ऋण जीडीपी के 42.9 प्रतिशत तक पहुंच गया था। कोरोना संकट के चलते पैदा हुए वैश्विक आर्थिक संकट ने श्रीलंका का यह कर्ज देश की जीडीपी से 101 प्रतिशत ज्यादा पहुंच गया। नतीजा रहा श्रीलंका सरकार द्वारा 2021 में देश की अर्थव्यवस्था के संकट को राष्ट्रीय आपदा घोषित करना। अब वहां हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार के समाप्त होने के चलते श्रीलंका अपने अंतरराष्ट्रीय कर्जों की ना तो अदायगी कर पा रहा है, न ही उस पर तय ब्याज का भुगतान कर पा रहा है।

गत वर्ष श्रीलंका सरकार ने विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के लिए आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इससे चीनी और ईंधन जैसी जरूरी चीजों की कमी होने लगी। वर्ष 2019 में श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार 7.5 अरब डॉलर का था, जो वर्ष 2021 में घटकर 1.6 अरब डॉलर का रह गया। श्रीलंका अपना विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मदद मांग रहा है।

जीडीपी कम, कर्ज ज्यादा
श्रीलंका के वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे ने इस बात को माना है कि उनका देश भारी कर्ज से जूझ रहा है। उन्होंने स्थानीय मीडिया से बात करते हुए कहा था कि श्रीलंका पर चीन, भारत और जापान का कर्ज है। उन्होंने बताया था कि श्रीलंका को इस साल 7 अरब डॉलर का कर्ज चुकाना है। इसमें से 500 मिलियन डॉलर का कर्ज 18 जनवरी तक देना था। श्रीलंका को अगले 5 साल में 26 अरब डॉलर का कर्ज चुकाना है। वही श्रीलंका पर चीन का ही 6 अरब डॉलर का कर्ज है। श्रीलंका ने चीन से पहले 5 अरब डॉलर का कर्ज लिया था। बाद में आर्थिक संकट से निकलने के लिए फिर से पिछले साल 1 अरब डॉलर का कर्ज लिया था।

आर्थिक नुकसान की वजह
श्रीलंका की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर काफी हद तक निर्भर है। कोरोना महामारी की वजह से पर्यटन बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ है। श्रीलंका की जीडीपी में टूरिज्म और उससे जुड़े सेक्टरों की हिस्सेदारी 10 फीसदी के आसपास है। कोरोना के चलते पर्यटकों के न आने से श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार कम हुआ है। वर्ल्ड ट्रेवल एंड टूरिज्म काउंसिल की रिपोर्ट बताती है कि महामारी के चलते श्रीलंका में 2 लाख से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए हैं।
श्रीलंका की आर्थिक समस्या पर विशेषज्ञों का मानना है कि इस आर्थिक हालात के लिए विदेशी कर्ज खासकर चीन से लिया गया कर्ज भी जिम्मेदार है। चीन का श्रीलंका पर 5 अरब डॉलर से अधिक कर्ज है। पिछले साल उसने देश में वित्तीय संकट से उबरने के लिए चीन से और 1 अरब डॉलर का कर्ज लिया था। अगले 12 महीनों में देश को घरेलू और विदेशी लोन के भुगतान के लिए करीब 7.3 अरब डॉलर की जरूरत है। नवंबर तक देश में विदेशी मुद्रा का भंडार महज 1.6 अरब डॉलर था।

सरकार को घरेलू लोन और विदेशी बॉन्ड्स का भुगतान करने के लिए पैसा छापना पड़ रहा है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विशेषज्ञ श्रीलंका की इस बदहाली के लिए केवल चीन से लिए गए कर्ज की बात से इंकार करते हैं। इन विशेषज्ञों का मानना है कि अपनी इस दशा के लिए श्रीलंका की गलत आर्थिक नीतियां जिम्मेदार हैं। श्रीलंका के कुल कर्जे में से चीन का हिस्सा मात्र 10 प्रतिशत है। इससे कहीं ज्यादा कर्ज श्रीलंका ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों से उठा रखा है। ऑस्ट्रेलिया के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ‘लोवी इंस्टीट्यूट’ के अनुसार इस समय श्रीलंका के कुल कर्ज का 47 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय बाजार से उठाया गया ऋण है। 22 प्रतिशत कर्ज विश्व बैंक समेत कई अंतरराष्ट्रीय बैंकों का है। 10 प्रतिशत कर्ज जापान का है। ऐसे में अकेला चीन को श्रीलंका की मौजूदा स्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

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