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संकट में शिमला समझौता!

पाकिस्तान के वजीरे आला इमरान खान इन दिनों जम्मू-कश्मीर के सहारे अपनी लड़खड़ाती राजनीति को संभालने में जुटे हैं। हालांकि खान को अंतरराष्ट्रीय पटल पर कुछ साफ सफलता हाथ नहीं लगी है, लेकिन वे लगातार भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने को लेकर बयानबाजी कर रहे हैं। शुक्रवार, 13 सितंबर को एक बार फिर इमरान खान गरजे। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने भारत के हिस्से वाले कश्मीर में मुस्लिमों पर कथित अत्याचार का रोना रोया। खान ने भारत को चेतावनी भरे अंदाज में कह डाला कि यदि मुस्लिमों पर अत्याचार नहीं रुके तो पूरे विश्व में मुस्लिम समाज का झुकाव चरमपंथ की तरफ बढ़ेगा। इमरान खान इससे पहले यह घोषणा कर चुके हैं कि हर शुक्रवार पाकिस्तान में भारत के अधिकार वाले कश्मीर के नागरिकों संग एकजुटता दिखाने के लिए प्रदर्शन किए जायेंगे। मुजफ्फराबाद में आयोजित सभा को सफल बनाने के लिए इमरान खान ने पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेट शाहिद अफरीदी को भी सभा में बुलाया।

हद यह है कि इमरान खान इस रैली में शामिल नौजवानों को सीमापार जाने के लिए उकसाते नजर आए। उन्होंने पहले खुद ही पूछा कि ‘‘क्या नौजवान सीमा के पास जाना चाहेंगे।’’ फिर कह डाला ‘‘समय आने पर मैं बताऊंगा कि कब जाना है।’’
हालांकि डगमगाती अर्थव्यवस्था के चलते भारत के खिलाफ जहर उगलती पाक सरकार करतारपुर मुद्दे पर समझौता करती नजर आ रही है। सरकार का कहना है कि करतारपुर साहेब का मुद्दा सिखों की धार्मिक आस्था से जुड़ा है लेकिन पाकिस्तान भीतर सरकार की दोमुंही नीति पर सवाल उठने लगे हैं।
इस बीच पाकिस्तान में बड़ी चर्चा है कि जल्द होने जा रही संयुक्त राष्ट्र महासभा में इमरान खान 1977 में भारत-पाक के मध्य हुए शिमला समझौते को रद्द करने की घोषणा कर सकते हंै। गौरतलब है कि 2 जुलाई, 1972 को हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में पाकिस्तान की करारी हार और बांग्लादेश गठन के बाद शांति समझौता हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के अनुसार भविष्य में दोनों देशों के मध्य विवादित मामलों को शांतिपूर्व तरीके से हल करने पर सहमति बनी थी। जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर तय किया गया था कि दोनों देश आपसी स्तर पर इसको सुलझायेंगे और किसी तीसरे पक्ष का इसमें हस्तक्षेप नहीं होगा।
समझौते के चलते ही भारत-पाक सीमा का विवाद तय होने तक ‘लाईन आॅफ कंट्रोल’ (एलओसी) को सीमा मानने की बात कही गई थी। अब अपनी गिरती साख को बचाने और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जम्मू-कश्मीर विवाद पर तीसरा पक्ष बनाने की कोशिश कर रहे इमरान इस समझौते से पीछे हटने का एलान आने वाले समय में कर सकते हैं।

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