world

पाक का साथ नहीं छोड़ेगी सऊदी

सऊदी अरब बेशक भारत के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाए रखना चाहता है, लेकिन तय है कि वह पाक का साथ भी नहीं छोड़ेगा

भारत यात्रा पर आए सऊदी अरब के शहजादे मोहम्मद बिन सलमान ने कहा कि आतंकवाद और कट्टरपंथ हमारी साझी चिंता है। इसके खिलाफ भारत के साथ पूरा सहयोग करेंगे। सऊदी अरब ने आतंकवाद के खिलाफ जंग में साथ देने और खुफिया सूचनाएं साझा करने पर सहमति जताई। इससे पहले ईरान और अफगानिस्तान का जर्बरदस्त रुख भी पाकिस्तान के खिलाफ ही रहा है।


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी पुलवामा हमले को खौफनाक स्थिति करार दिया है। उन्होंने कहा है कि इस मामले पर रिपोर्ट हासिल कर बयान जारी करेंगे। अमेरिका विदेश मंत्रालय के उप प्रवक्ता रॉबर्ट पैलाडिनो ने भारत के प्रति पुरजोर समर्थन दिखाते हुए पाकिस्तान को हमले के जिम्मेदारों को सजा देने को कहा। दुनिया का कोई भी मुल्क पुलवामा जैसी ओछी हरकत का समर्थन नहीं करना चाहेगा। लिहाजा इस वक्त पाकिस्तान दुनिया की नजरों में बेनकाब हो रहा है। बेनकाब भी इस तरह की खुद वहां के प्रधानमंत्री इमरान खान की पूर्व पत्नी रेहम खान ने कहा कि इमरान सेना की कठपुतली हैं। रेहम खान हैरान हैं कि इमरान को सर्दियों की वारिश के बारे में ट्वीट करने की तो खूब सूझी मगर पुलवामा और उससे पहले ईरान की घटना जिसमें कि 27 ईरानी सुरक्षा गार्ड मारे गए थे, उसके बारे में इमरान ने कोई ट्वीट नहीं किया? ईरानी इस्लामी क्रांति की 40वीं वर्षगांठ के मौके पर पाकिस्तान की धरती पर काम कर रहे जैश-अल-अदल ने ईरान के सीस्तान-ब्लूचिस्तान प्रांत में 27 ईरानी जवानों को मौत के घाट उतार दिया था। इसी तरह अफगानिस्तान में लंबे समय से सक्रिय कट्टरपंथी संगठन तालिबान को पाक ने 18 फरवरी को बाकायदा अधिकारिक निमंत्रण भेजकर बातचीत के लिए बुलाया। ऐसे में अफगानिस्तान और ईरान के बारे में सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि आतंकवाद के मामले में उनका रुख पूरी तरह पाक के खिलाफ है, लेकिन सऊदी अरब के बारे में आंख मूंदकर विश्वास नहीं किया जा सकता।

दुनिया ने देखा कि भारत से पहले युवराज मोहम्मद बिन सलमान पाकिस्तान भी गए। वहां दोनों मुल्कों के बीच कर्ज में डूबे पाक को 20 बिलियन राहत पैकेज देने के लिए निवेश सौदों पर हस्ताक्षर भी हुए। भारत में भी सऊदी अब सौ बिलियन डॉलर का निवेश करेगा। हालांकि भारत में सऊदी पांच गुना ज्यादा निवेश करेगा, लेकिन इसके मायने यह नहीं कि भारत का साथ निभाने के लिए वह पाकिस्तान का साथ छोड़ देगा। जाहिर है कि सऊदी अरब दोनों देशों से अपने परंपरागत रिश्ते कायम रखना चाहता है।

दरअसल, सऊदी अरब को पाकिस्तान सुरक्षा का भरोसा दिलाता है कि पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न देश है। यदि मध्य पूर्व में टकराव की स्थिति बनी तो वो सऊदी के साथ मजबूती से खड़ा रहेगा। इमरान खान ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पहले विदेशी दौरे के लिए सऊदी को ही चुना था। खान ने इस दौरे में कहा था कि पाकिस्तान किसी बाहरी ताकत को सऊदी पर हमला नहीं करने देगा। अभी सऊदी में 25 लाख से ज्यादा पाकिस्तानी काम करते हैं। ये हर साल पाकिस्तान में अपने परिवारों के लिए 5 से 6 अरब डॉलर की रकम भेजते हैं और ये पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के लिए काफी अहम है। 1960 के दशक से ही पाकिस्तानी सैनिक सऊदी के शाही शासन की सुरक्षा में लगे हैं। इसके साथ ही पाकिस्तान सऊदी के सैनिकों और पायलटों को ट्रेनिंग देता है। 1969 में पाकिस्तान ने यमन की सेना के आक्रमण को रोकने में मदद की थी।

ईरान-इराक युद्ध में भी पाकिस्तान ने अपनी सेना को सऊदी अरब भेजा था। 2016 की रिपोर्ट के अनुसार भी सऊदी अरब पाकिस्तानी हथियारों का सबसे बड़ा आयातक है। पाकिस्तान ने जब परमाणु परीक्षण किया था तो सऊदी ने इसका खुलकर समर्थन किया था। सऊदी अरब ने 1998 से 1999 तक पाकिस्तान को 50 हजार बैरल तेल मुफ्त में दिया था। सऊदी ने ऐसा तब किया जब उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगे थे। अफगानिस्तान से रूसी सेना वापस गई तो संयुक्त अरब अमीरात के अलावा सऊदी अरब एकमात्र देश था जिसने काबुल में तालिबान शासन का समर्थन किया था। इसके साथ ही कश्मीर मसले पर भी सऊदी अरब पाकिस्तान की लाइन के साथ रहा है।

सऊदी अरब की पाकिस्तान के साथ दोस्ती भले ही बहुत मजबूत है, लेकिन वो भारत की भी उपेक्षा नहीं करता है। 1956 के सितंबर महीने में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सऊदी अरब के दौरे पर गए थे। इस दौरे पर सऊदी की भीड़ ने नेहरू के स्वागत में ‘मरहबा रसूल अल सलाम’ मतलब ‘शांति के दूत आपका स्वागत है’ के नारे लगाए थे। हालांकि 1070 के दशक में अफगानिसतान में सोवियत संघ की सेना के खिलाफ पाकिस्तान ने मुजाहिदीनों को खड़ा करने में मदद की और सऊदी का झुकाव पाकिस्तान की तरफ बढ़ता गया। सऊदी ने कभी खुद को भारत से पूरी तरह अलग नहीं किया। दोनों देशों ने पारस्परिक आर्थिक हितों को ध्यान में रखा संबंधों को कायम रखा। सऊदी में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी भी काम करते हैं। सऊदी में भारतीय बड़ी नौकरी भी करते हैं और मजदूरों के काम भी, वक्त के साथ भारतीयों की संख्या बढ़ती गई। 2016 में सऊदी में काम करने वालों में भारतीयों की संख्या बढ़कर करीब 30 लाख पहुंच गई।

अब तो भारत और सऊदी अरब आर्थिक रूप से एक दूसरे के लिए काफी अहम हो गए हैं। 2014-15 में दोनों देशों देशों के बीच 39.4 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था। दूसरी तरफ पाकिस्तान और सऊदी के बीच 6 ़1 अरब डॉलर का ही व्यापार हुआ था। भारत और सऊदी में आर्थिक संबंध काफी मजबूत हैं, लेकिन पाकिस्तान और सऊदी के बीच रक्षा संबंध काफी तगड़े हैं। हालांकि अब भारत और सऊदी अरब के अलावा बाकी के खाड़ी देशों से रक्षा संबंध भी बढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी भी सऊदी के दौरे पर गए और उनका शाही शासन से गर्मजोशी से स्वागत किया था। मोदी को सऊदी का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भी दिया गया था। जाहिर है कि सऊदी अरब भारत-पाक दोनों मुल्कों के साथ रहा है और क्राउंन प्रिंस की यात्रा के बाद भी लगता है आगे उसका रुख यही बना रहेगा।

Leave a Comment

Your email address will not be published.

You may also like