सोवियत संघ के विघटन ने दुनिया को एक ध्रुवीय बना दिया है। रूस और अमेरिका के बीच दशकों चले शीतयुद्ध ने दुनिया को एक अलग ढंग से सोचने के लिए बाध्य कर दिया था। इन दोनों के कोल्ड वार में छोटे देशों को खामियाजा भी भुगताना पड़ा। एक छोर कम्युनिस्ट का दूसरा छोर साम्राज्यवादी सोच का। उस दौर में भारत ने रूस का दामन थामा। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ही रूस के साथ जो मित्रता की लीक बनाई, उस पर भारत चलता रहा।

चाहे हुक्मरान कोई भी रहा हो। रूस के साथ प्रगाढ़ता के क्रम में अमेरिका को हमने दुश्मन मान लिया और वह हमारे पड़ोसी मगर दुश्मन देश पाकिस्तान के साथ जा भी मिला। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान अमेरिका ने खुले रूप से पाकिस्तान का साथ दिया तो रूस ने भारत का। जब भारत को तबाह करने के मकसद से अमेरिका ने सातवां बेड़ा भेजा तो वह रूस ही था जिसने बीच समंदर में उसे रोका। लेकिन 1990 के बाद यानी सोवियत संघ के विघटन और भूमंडलीकरण के आने के बाद दुनिया के देशों के आपसी रिश्ते और उनके समीकरण में भारी बदलाव आया। अब आलम यह है कि रूस के कमजोर खड़े होने के बावजूद उसका किसी भी देश के साथ खड़ा होना एक बड़ी बात है।

अभी हाल ही में रूस और चीन के बीच बढ़ी नजदीकियां भारत के लिए चिंता का सबब बन गयी हैं। भारत-रूस चीन त्रिकोण का सच यह है कि दो देशें के साथ होने पर तीसरे देश को दिक्कत हो जाती है। वह खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है। इन दिनों रूस और चीन एक दूसरे के करीब आ रहे हैं। नतीजतन भारत की चिंताएं बढ़ी हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि रूस- भारत का पारंपरिक दोस्त रहा है। लेकिन हाल के सालों में वह चीन के साथ संबंध प्रगाढ़ कर रहा है। चीन भारत का सबसे बड़ा शत्रु है। दोनों देशों के बीच 1962 में युद्ध भी हो चुका है जिसमें भारत को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा था। दोनों देशों के बीच अब भी सीमा विवाद का समाधान नहीं हो पाया है। वह भारत के हिस्सों पर लगातार अपनी दावेदारी पेश करता रहा है।

पिछले तीन दशकों में शीतयुद्ध के बाद भारत अपने पारंपरिक मित्र रूस के शत्रु देश अमेरिका के ज्यादा करीब हुआ है। इस कारण भी भारत रूस में दूरियां बढ़ी हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2008-2012 तक भारत के कुल हाथियार आयात का 79 फीसदी रूस से होता था जो पिछले पांच सालों में घटकर 12 फीसदी पहुंच गया है। इसके विपरीत कल जो पाकिस्तान हथियारों की खरीद के अमेरिका से करता था, वह अब रूस और चीन से कर रहा है। पाकिस्तान अपनी सैन्य आपूर्ति की निर्भरता अमेरिका पर कम करना चाहता है, वह ऐसा कर भी रहा है। अमेरिका और पाकिस्तान के बीच हथियारों का सौदा एक अरब डालरे से लुढ़कर कर 201 करोड़ डालर तक पहुंच गया है।

गौरतलब है कि पूर्वी रूस और साइबेरिया में इस महीने चीनी सेना एक युद्धभ्यास में शामिल हुई। इसमें चीनी सेना के साजो-समान भी शामिल हुए थे। यह 1981 के बाद का सबसे सैन्य अभ्यास बताया जा रहा है। कुछ जानकारों ने इस युद्धभ्यास को गंभीरता से लेते हुए इसे अमेरिका के विरुद्ध रूस-चीन की साझा तैयारी के तौर भी देखा है। कहा जा रहा है कि अमेरिका ने चीन के विरुद्ध जो ट्रेड वार शुरू किया और रूस के खिलाफ जो आर्थिक प्रतिबंध लगा रखा है, वैसे में दोनों देशों का साथ आना स्वाभाविक है।

सर्वविदित है कि चीन-रूस के दम्यान विगत ढाई दशकों में रिश्तों में मजबूती आई है। यह भी सच है कि दोनों देशों में 1960 और 1970 के दशक में लड़ाइयां भी हुई हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद दोनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका और उसके सहयोगियों को रोकने के लिए साथ मिलकर कई दफा वीटो पावर का इस्तेमाल किया है। दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद रूस और चीन का वह पक्ष कई बार खुलकर सामने आया है कि दुनिया बहुध्रुवी रहे। मध्य-पूर्व में जब अमेरिका, ईरान को लेकर कठोर होता है तो रूस और चीन मिलकर उदार रुख का परिचय देते हैं। यह भी दिलचस्प है कि संसार के बड़े संघर्षों पर रूस-चीन की सोच एक जैसी है। पिछले ­सालों में रूस का सबसे बड़ा कारोबारी चीन ही है।

कुल मिलाकर मामला यह है कि जिस तरह से रूस और चीन में प्रगाढ़ता परवान चढ़ रही है। एक परंपरागत मित्र दूसरे दुश्मन नंबर वन, दोनों की मित्रता भारत के लिए मुश्किलों का द्वार खोलने वाली है। अब भी समय है कि भारत को इस खतरनाक गठबंधन के प्रति सचेत हो जाना चाहिए। कारण कि यह सामारिक रूप से भी भारत के लिए खतरे की घंटी है।

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