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कनाडा द्वारा खालिस्तान समर्थक नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप भारत पर लगाने के बाद दोनों देशों के बीच रिश्ते खराब हो रहे हैं। आशंका जताई जा रही है कि विवाद और बढ़ा तो भारत में 21 अरब डॉलर यानी 1.74 लाख करोड़ रुपए का निवेश करने वाला कनाडा पेंशन प्लान इन्वेस्टमेंट बोर्ड भारत से बाहर जा सकता है। कनाडा पेंशन प्लान इन्वेस्टमेंट बोर्ड का कोटक महिंद्रा बैंक, पेटीएम, जोमैटो, आईसीआईसीआई समेत भारत की 70 सूचीबद्ध कंपनियों में निवेश है। विवाद बढ़ा तो कनाडाई कंपनी पीछे हट सकती हैं और अर्थव्यवस्था पर इसका असर दिख सकता है

 

भारत से अलग हो सिख राष्ट्र खालिस्तान बनाने का दुस्वप्न करीब तीस साल पहले ही दम तोड़ चुका है। अब ज्यादातर सिख खालिस्तान आंदोलन को पॉजीटिव वे में नहीं लेते हैं। ऐसे सिखों में बड़ी संख्या अप्रवासी सिखों की है। ये सभी लोग खालिस्तानी अलगाववाद को अब खतरनाक मानते हैं। अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर ने साल 2020 में पंजाब में एक सर्वे किया था, जहां दुनिया के करीब 75 फीसदी सिख रहते हैं। उस सर्वे के नतीजों से पता चला कि पंजाब में अलगाववाद की भावना अब न के बराबर है। सर्वे में 95 फीसदी सिखों ने कहा कि उन्हें भारतीय होने पर बहुत गर्व है और वे अपने समुदाय के लिए एक स्वतंत्र देश नहीं चाहते हैं। इसके बावजूद खालिस्तानी मूवमेंट का खतरा एक बार फिर बढ़ गया है। अब इसकी जड़ें भारत में नहीं, बल्कि कनाडा जैसे देश में हैं, जहां की राजनीति में खालिस्तान समर्थकों का काफी प्रभाव है। इससे भारत-कनाडा के मजबूत रिश्तों में भी दरार आ गई है। भारत ने कनाडा पर उसके खिलाफ हिंसा की साजिश रचने वाले आतंकवादियों का समर्थन करने का आरोप लगाया है।

वहीं कनाडा ने दावा किया है कि भारत ने कनाडा में ही एक कनाडाई नागरिक की हत्या करवा दी है। हालांकि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने अभी तक अपने दावे को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया है कि खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत का हाथ था। अब तक हमें बस इतना पता है कि उन्होंने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की है और मोदी सरकार ने इस आरोप को ‘बेतुका’ बताते हुए खारिज कर दिया है। जैसे को तैसा के आधार पर राजनयिकों को निष्कासित कर दिया गया और व्यापार वार्ता रोक दी गई। दोनों देश और उनके सहयोगी अब यह देखने का इंतजार कर रहे हैं कि ट्रूडो अपने आरोपों पर कायम रह पाते हैं या नहीं।

जी-20 के दौरान अमेरिका ने की निज्जर की हत्या पर चर्चा!
खालिस्तान समर्थक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर कनाडा के गंभीर आरोपों पर अमेरिका लगातार उसका समर्थन करता दिख रहा है। कनाडा में अमेरिकी राजदूत डेविड कोहेन ने दावा किया है कि पीएम जस्टिन ट्रूडो जो भी आरोप लगा रहे हैं वह फाइव आईज एलायंस की खुफिया रिपोर्ट पर आधारित हैं। ‘फाइव आईज’ अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा का खुफिया गठबंधन है। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने भी अपने पड़ोसी देश के समर्थन में कहा कि ट्रूडो के आरोपों से अमेरिका चिंतित है। इससे पहले अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने भी जांच की बात कही थी, वहीं फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक, इंडियन एक्सप्रेस ने खबर प्रकाशित की है कि 10 दिन पहले जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई चर्चा के दौरान जो बाइडन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निज्जर हत्या मामले में जस्टिन ट्रूडो द्वारा लगाए गए आरोपों के बारे में जानकारी दी थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक यह भी दावा किया गया है कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की तरह फाइव आईज के प्रमुख देशों ने पहले ही भारत के पीएम मोदी के साथ इन आरोपों पर चर्चा की थी।

एक तरफ जहां कहा जा रहा है कि मोदी-बाइडन के बीच
बातचीत हुई है, वहीं दूसरी तरफ जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान इन दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत के आधिकारिक ब्यौरे में ऐसा कोई जिक्र नहीं है। दोनों नेताओं की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा हुई, ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या सच में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जो बाइडन ने वाकई कनाडा के आरोपों पर चर्चा की थी? इन सबके बीच खालिस्तान के मुद्दे पर शुरू हुए इस विवाद से कनाडा और भारत के बीच बढ़ते विवाद का असर दोनों देशों पर पड़ना शुरू हो गया है। नुकसान सिर्फ एक देश का नहीं, बल्कि दोनों देशों का बराबर हो रहा है। बस फर्क इतना है कि नुकसान किसी का अधिक हो रहा है तो किसी का कम। विवाद का असर वैश्विक कारोबार से लेकर बाजार तक दिखने लगा है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस मुद्दे की वजह से न सिर्फ कनाडा से आने वाले निवेश और निर्यात पर असर पड़ेगा, बल्कि आपकी थाली का बजट भी बिगड़ जाएगा। विवाद का असर अगर दोनों देशों के कारोबार पर पड़ा तो कई भारतीय कंपनियां मुश्किल में पड़ जाएंगी। आपको महंगाई का सामना करना पड़ सकता है और आपकी नौकरी भी खतरे में पड़ सकती है। सबसे ज्यादा दिक्कत उन छात्रों को होगी जो पढ़ाई के लिए कनाडा जा रहे हैं या वर्तमान में कनाडा में पढ़ रहे हैं।

कनाडा विवाद से भारत पर असर

आशंका जताई जा रही है कि विवाद और बढ़ा तो भारत में 21 अरब डॉलर यानी 1.74 लाख करोड़ रुपये का निवेश करने वाला कनाडा पेंशन प्लान इन्वेस्टमेंट बोर्ड भारत से बाहर जा सकता है। कनाडा पेंशन प्लान इन्वेस्टमेंट बोर्ड का कोटक महिंद्रा बैंक, पेटीएम, जोमैटो, आईसीआईसीआई समेत भारत की 70 सूचीबद्ध कंपनियों में निवेश है। विवाद बढ़ा तो कनाडाई कंपनी पीछे हट सकती हैं और अर्थव्यवस्था पर इसका असर दिख सकता है।

मसूर दाल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता कनाडा
गौरतलब है कि दोनों देशों के बीच साल 2023 में कारोबार 8 बिलियन डॉलर का कारोबार हुआ है। अगर तनाव बढ़ा तो इसपर भी असर पड़ेगा और आयात-निर्यात प्रभावित होगा। भारत कनाडा से बड़ी मात्रा में मसूर दाल खरीदता है। अगर विवाद बढ़ा तो दालें महंगी हो जाएंगी। भारत का कुल मसूर आयात 2020-21 में 11.16 लाख टन, 2021-22 में 6.67 लाख टन और 2022-23 में 8.58 लाख टन रहा। जिसमें से भारत ने कनाडा से साल 2020-21 में 9.09 लाख टन, साल 2021-22 में 5.23 लाख टन और साल 2022-23 में 4.85 लाख टन मसूर खरीदा। अगर दोनों देशों के रिश्ते खराब हुए तो जाहिर है कि मसूर दाल की कीमतें बढ़ जाएंगी।

ऑस्ट्रेलिया से मसूर दाल आयात कर सकता है भारत!

दाल व्यापारी और ट्रेडर्स कनाडा और भारत के बीच मौजूदा स्थिति और घटनाक्रम पर नजर रख रहे हैं कि इन दोनों देशों के रिश्ते के हिसाब से देश में मसूर दाल महंगी होगी या नहीं? क्योंकि कनाडा भारत को दाल की आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। यह आयात 4 से 5 लाख टन प्रति वर्ष है। अगर कनाडा से मसूर दाल का आयात बंद हो जाता है तो भारत इस दाल को ऑस्ट्रेलिया से आयात कर सकता है। हालांकि सप्लाई चेन बाधित होने से दाल की कीमत में बढ़ोतरी हो सकती है। भारत के पास ऑस्ट्रेलिया एक विकल्प तो है लेकिन मसूर दाल पर ऑस्ट्रेलिया का एकाधिकार भारत के लिए उपयुक्त नहीं है।
चने की दाल के बाद मसूर सबसे सस्ती दाल है। इस समय देश के अलग-अलग हिस्सों में मसूर दाल 91 से 95 रुपए प्रति किलो बिक रही है। चना दाल की कीमत 75 से 80 रुपए प्रति किलो है। मूंग और अरहर दाल का रेट अधिक है। मूंग दाल 110 रुपए प्रति किलो है जबकि तूरदाल 150 रुपए प्रति किलो है। मसूर के कुल घरेलू उत्पादन का लगभग 70 प्रतिशत उत्पादन मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश राज्यों में होता है। भारत को हर साल लगभग 18 से 20 लाख टन मसूर दाल की आवश्यकता होती है।

बढ़ सकती हैं महंगाई

भारत और कनाडा के बीच अगर तनातनी लंबे समय तक चलती है तो इसका सबसे अधिक असर मसूर दाल के अतिरिक्त म्यूरेट ऑफ पोटाश उर्वरक पर भी पड़ सकता है। जिससे इसकी कीमतें बढ़ सकती हैं। साल 2022-23 में 23.59 लाख टन पोटाश के कुल आयात में से भारत ने कनाडा से 11.43 लाख टन खरीदा था। हालांकि इस बात को भी समझना जरूरी है कि कनाडा की निर्भरता भारत पर अधिक है। कनाडा में पैदा होने वाली आधी से अधिक मसूर वो भारत को निर्यात करता है। ऐसे में कनाडा के लिए भारत को मसूर का निर्यात रोकना मुश्किल होगा। अगर वो ये गलती करता भी है तो नुकसान उसका खुद का भी होगा, क्योंकि भारत के पास मसूर के लिए ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देश विकल्प के तौर पर मौजूद हैं।

वीजा सस्पेंड से बढ़ी समस्या

विवाद के बीच भारत ने कनाडाई नागरिकों के लिए भारतीय वीजा सेवाओं को अगले आदेश तक निलंबित कर दिया है। बीएलएस इंटरनेशनल नाम की कंपनी वीजा सेवाएं मुहैया कराती है। कंपनी कनाडा में वीजा आवेदन केंद्र संचालित करती है। बीएलएस इंटरनेशनल ने अपनी कनाडाई वेबसाइट पर एक नोटिस जारी किया है। इसमें कहा गया है कि भारतीय वीजा सेवाओं को 21 सितंबर, 2023 से अगले आदेश तक निलंबित कर दिया गया है। अपडेट रहने के लिए कृपया वेबसाइट चेक करते रहें। वीजा सस्पेंड होने के बाद कनाडा के नागरिकों का भारत में प्रवेश बंद हो गया है।

पढ़ाई करने वाले छात्रों पर प्रभाव

भारत से बड़ी संख्या में युवा कनाडा पढ़ने जाते रहे हैं, लेकिन अब अगर विवाद बढ़ा तो भारतीय छात्रों के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। हालांकि भारत के साथ ही इसका असर कनाडा पर भी होगा, क्योंकि कनाडा की इकोनॉमी काफी हद तक भारतीय छात्रों पर निर्भर करती है। कनाडा में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों में भारतीय छात्रों की संख्या 40 फीसदी तक है। जिसके कारण कनाडा की इकोनॉमी में अंतरराष्ट्रीय छात्रों का बड़ा योगदान माना जाता है। ये छात्र वहां मोटी फीस भरकर पढ़ाई करते हैं और वहां की इकोनॉमी को मजबूत करने में सहयोग करते हैं। कनाडाई छात्रों की तुलना में बाहरी छात्रों से 4 से 5 गुना अधिक फीस ली जाती है। कनाडा में पढ़ने वाले भारतीय छात्र वहां की इकोनॉमी में 4.9 अरब डॉलर का योगदान करते हैं।

कनाडा में सिखों का बोलबाला

कनाडा के पूर्व सांसद रमेश संघा का कहना है कि 2021 के एक अध्ययन के अनुसार, कनाडा में सिखों की संख्या 2.6 प्रतिशत है जिसके मुताबिक 9.50 लाख सिख वहां बसे हुए हैं। 2021 के चुनाव नतीजों की बात करें तो 17 सीटें ऐसी थीं जिन पर भारतीयों ने जीत हासिल की। इन 17 सांसदों में से 16 सिख थे। 338 सीटों के लिए 49 भारतीयों ने चुनाव लड़ा था। जिसमें करीब 35 अभ्यार्थी पंजाब से थे। ओंटारियो में 8 सांसद सिख हैं, जबकि 4 ब्रिटिश कोलंबिया से, 3 अलबर्टा से और 1 क्यूबेक से हैं। इस चुनाव में ट्रूडो बड़ी मुश्किल से कनाडा में आम चुनाव जीत सके।

जीतने के बाद भी सरकार बनाने में असफल रहे। ट्रूडो की लिबरल पार्टी को 157 सीटें मिलीं, जबकि विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी को 121 सीटें मिलीं। ट्रूडो को सरकार बनाने के लिए 170 सीटों की जरूरत है। अगर कोई उन्हें ये सीटें और पीएम पद दे सकता था तो वह न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी थी जिसे 24 सीटें मिली थीं। इन सीटों से जगमीत सिंह कनाडा में हीरो बन गए थे। ये बात किसी से छुपी नहीं है कि जगमीत खालिस्तान आंदोलन का बड़ा समर्थक है। चुनाव के बाद सिंह और ट्रूडो ने विश्वास और आपूर्ति समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता 2025 तक लागू रहेगा। अब तक जगमीत सिंह ट्रूडो के भरोसेमंद पार्टनर बने हुए हैं।

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