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अमेरिका में रिकॉर्ड तोड़ महंगाई

कोरोना का कहर दुनिया पर ऐसा बरपा कि बड़े-बड़े देश भी शिथिल पड़ गए। मौतों का आंकड़ा बढ़ता गया और लोगों का हौसला पस्त होने लगा। विश्व की महाशक्ति कहे जाने वाले अमेरिका को भी पटरी पर आने वाले में बहुत समय लगा लेकिन अब भी अमेरिका में हालात सुधर नहीं पाएं हैं। ऐसा वहां की स्थिति को देखकर अंदाज़ा लगाया जा रहा है। दरअसल, कोरोना संकट के दौरान सप्लाई चैन टूटने के कारण अमेरिका में महंगाई बढ़ गई है ये महंगाई इस समय चर्चा का विषय बनी हुई है। चर्चा है कि आखिर क्या अमेरिका में महंगाई का कारण कोरोना काल के दौरान सप्लाई चैन टूटना ही है या फिर वजह कुछ और है ?

इस सवाल पर जवाब और चर्चा जारी है। हाल ही में द वॉल स्ट्रीट जर्नल न्यूज़ पेपर में एक विश्लेषण छपने के बाद से इस मुद्दे पर गर्मागर्म बहस शुरू हो गई है। अब तक कहा जा रहा था कि कोरोना महामारी के चलते सप्लाई चेन टूट गई है। लेकिन और भी कई वजहें निकलकर आ रही हैं।

लेकिन लगातार जारी महंगाई अब सात प्रतिशत हो चुकी है, जो लगभग चार दशकों में सबसे अधिक है। महामारी से जुड़े स्टीमुलस पैकेज को फेडरल रिजर्व ने पहले ही शुरू कर दिया है। अमेरिका में दिसंबर माह के दौरान महंगाई दर सालाना सात प्रतिशत के स्तर पर पहुंच चुकी है। दुनिया के सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में महंगाई की दर 1982 के बाद सबसे अधिक है।

जून, 1982 के बाद अमेरिका में उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति सूचकांक पिछले साल दिसंबर में सात प्रतिशत से अधिक की वार्षिक दर से बढ़ा जो बहुत अधिक है। यानी अमेरिका में मुद्रास्फीति पिछले 40 वर्षों में सबसे तीव्रता से बढ़ी है।

बताया यह भी जा रहा है कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद मांग अचानक बढ़ी, वही अब महंगाई का कारण बन चुकी है। दूसरी तरफ वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित विश्लेषण में कहा गया है कि जानबूझ कर अमेरिकी कंपनियां महंगाई बढ़ा रही हैं, ताकि उन्हें अधिक मुनाफा मिल सके।

विश्लेषकों क्रिस्टीन ब्रॉहटॉन और थियो फ्रांसिस ने कहा है- ‘कंपनी अधिकारियों ने इसे अपने खर्च की भरपाई करने या उससे भी अधिक कमा लेने का अवसर बना लिया है। दशकों तक लागत और मूल्य मे संतुलन बैठाने के बाद वे इस मौके का फायदा उठा रहे हैं।’ दोनों विश्लेषकों ने दावा किया है कि अमेरिका की सबसे बड़ी कंपनियां महंगाई दर की तुलना में काफी अधिक मुनाफा कमा रही हैं। उनके मुनाफे का स्तर 2019 से भी काफी ऊपर पहुंच गया है।

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बीते सप्ताहांत अखबार द वाशिंगटन पोस्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि व्हाइट हाउस अमेरिकी कंपनियों के व्यवहार को संदेह की निगाह से देख रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया- ‘रिपब्लिकन पार्टी मौजूदा दिक्कतों के लिए राष्ट्रपति जो बाइडन के आर्थिक एजेंडे को दोषी ठहरा रही है। लेकिन अब संकेत हैं कि व्हाइट हाउस यह कहते हुए इसका जोरदार जवाब देगा कि लागत में नाटकीय वृद्धि के लिए बड़ी कंपनियां जिम्मेदार हैं।’

राष्ट्रपति जो बाइडन ने पिछले हफ्ते फेडरल ट्रेड कमीशन के अधिकारियों के साथ बैठक की थी। उन्होंने निर्देश दिया कि ईंधन की महंगाई के मामले में कच्चे तेल और गैस इंडस्ट्री के व्यवहार की जांच की जाए। इस साल के आरंभ में बाइडन प्रशासन ने पोर्क की कीमत बढ़ने के लिए इस उद्योग के कुछ बड़ी कंपनियों के हाथ में केंद्रित हो जाने को दोषी ठहराया था। इसके बावजूद कीमतें नहीं गिरीं। टीवी चैनल सीएनएन ने खबर दी है कि अब बाइडन प्रशासन मोनोपोली विरोधी कानून के तहत पोर्क इंडस्ट्री के ऊपर कार्रवाई करने पर विचार कर रहा है।

महंगाई के कारण अमेरिका के आम लोगों की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। रेटिंग एजेंसी मूडीज के मुख्य अर्थशास्त्री मार्क जैंडी ने एक टिप्पणी में लिखा है कि मध्यम आय वाले घरों का मासिक खर्च औसतन 200 डॉलर बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि महंगाई जल्द खत्म होने वाली नहीं है, हालांकि यह संभव है कि इसके बढ़ने की दर जल्द ही धीमी हो जाए।

इस बीच डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े अर्थशास्त्री लैरी समर्स ने चेतावनी दी है कि महंगाई के कारण डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने की स्थितियां बन सकती हैं। वाशिंगटन पोस्ट में पिछले हफ्ते लिखे एक लेख में समर्स ने कहा- ‘(डेमोक्रेटिक शासन के दौरान) महंगाई के कारण (रिपब्लिकन पार्टी के) रिचर्ड निक्सन और रोनाल्ड रेगन राष्ट्रपति चुने गए थे। इसी वजह से ट्रंप एक बार फिर व्हाइट हाउस में लौट सकते हैं।’

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