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नए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का स्वागत करेंगी नई पुरानी कई मुश्‍किलें

पाकिस्‍तान क्रिकेट का कप्तान होना और पाकिस्तान देश का कप्तान होना दोनों बहुत अलग अलग बातें हैं। क्रिकेट में तो इमरान ने जीत हांसिल करने के बाद ही अपने देश के लिए ऐसा कारनामा कर दिखाया था जिसे अब तक कोई दोहरा न सका। लेकिन राजनीति के मैदान में ऐसा नही है। यहां असली परीक्षा तो चुनाव जीतने के बाद ही शुरू होती है, खास कर तब जब आप वह देश पाकिस्‍तान हो। यहां चुनाव जीतना तो एक पड़ाव जैसा ही है ऐसा पड़ाव जहां से शुरू होता है कांटों के ताज पहले हुए आगे का सफर।

मैं ऐसा क्‍यों कह रहा हूं।

पाकिस्‍तान की ताजा हालत किसी से छुपी नही है। पाकिस्‍तान की सियासत की हमेशा दो धुरी रही है जिसमें से कमजोर धुरी लोकतंत्र है और मजबूत धुरी सेना। सेना और चुनी हुई सरकार के बीच हमेशा खींचा तानी चलती रहती है। ऐसा जग जाहिर है कि वहां चुनी हुई सरकारे तब तक ही खुशी खुशी काम कर पाती हैं जब तक वो सेना के इशारे पर चल रही हों। जहां कोई सरकार सेना से अलग करने या सोचने की शुरूआत करती है उसी समय तख्‍ता पलट कर दिया जाता है और पूरा देश फिर सेना के अनुसार चलने लगता है। इमरान के संदर्भ में बात करें तो जिस करप्‍शन फ्री पाकिस्‍तान और न्‍यू पाकिस्‍तान के सपने उन्‍होंने देश की जनता को दिखाए हैं उसे सेना के हिसाब से चल कर हांसिल करना तो लगभग नामुमकिन है। ऐसे में अगर इमरान खान सेना के हो जाते हैं तो जनता उन्‍हें नकार देगी और अगर वो जनता के हो चले तो सेना उनकी सरकार को आगे चलने नहीं देगी। खैर कई नामुमकिन सी लगने वाली चीजों को मुमकिन कर दिखाने वाले इमरान एक बार फिर ऐसा ही कुछ करें और पाकिस्‍तान को न्‍यू पाकिस्‍तान की तरफ लेकर जाएं यह भारत के लिए भी उतना ही अच्‍छा होगा जितना पाकिस्‍तानी जनता के लिए।

ये तो बात हो गई इमरान की आंतरिक समस्‍या। इसके साथ साथ उन्‍हें विश्‍व पटल पर पाकिस्‍तान की पूरी तरह से बिगड़ चुकी छवि को भी सही करना होगा। हाल ही में चीन के साथ ज्‍यादा करीबी के चलते अमेरिका ने पाकिस्‍तान के कान खींचने का काम कर दिया है। अमेरिका ने ‘आईएमएफ’ को यह चेताया है कि वह इस बार पाकिस्‍तान को ‘डालर’ न दे। इससे इमरान संकट में तो पड़ ही गए होंगे।

माजरा यह है कि पाकिस्‍तान के खजाने बिल्‍कुल खाली हैं। इमरान को देश चलाने के लिए धन की आवश्‍यक्‍ता पड़ेगी। आज तक होता यह था कि ऐसी स्थिति में पाकिस्‍तान आईएमएफ के आगे हाथ फैला लेता था।‍ जिससे उसे धन दे दिया जाता था। इस बार भी स्थिति कुछ ऐसी ही बन रही थी। लेकिन इमरान प्रधानमंत्री बनते और आईएमएफ से कुछ मांगते इससे पहले ही ट्रंप ने ट्रंप कार्ड चल दिया।

अमेरिका के विदेश मंत्री ने ‘आईएमएफ’ को चेताया और कहा कि उसकी नजर लगातार बनी हुई है कि ‘आईएमएफ’ पाकिस्‍तान को लेकर क्‍या फैसला लेता है। हमें आशा है कि वह कोई गलती नहीं करेंगे।

चलिए इसका माजरा भी समझते हैं, दरअसल चीन के साथ अमेरिका की तू तू मैं मैं से सभी जानते हैं। चीन के ड्रीप प्रोजेक्‍ट ‘सिल्‍क रूट’ के लिए पाकिस्‍तान एक अहम देश है। कुछ समय पहले से चीन के साथ पाकिस्‍तान की दोस्‍ती काफी गहराई हुई है और अमेरिका को ये फूटे आंख नहीं सुहा रहा है। इसलिए ‘आईएमएफ’ को अमेरिका ने कहा है कि अगर संस्‍था मदद करना चाहती ही है तो वह चीनी बॉड दे या फिर चीन खुद ही पाकिस्‍तान की मदद कर दे। लेकिन अमेरिकी डॉलर न दे।

अब इस तरह के हालात में इमरान कैसे पाकिस्‍तान की बागडोर थामेंगे और किस रुख पाकिस्‍तान को ले जाएंगे ये देखना होगा लेकिन जो भी हो इमरान का असली इम्‍तिहान अब शुरू हुआ है और अगर इमरान इस देश को पटरी पर ला सके तो पूरी दुनिया इन्‍हें याद रखेगी।

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