[gtranslate]
world

नेपाल में सियासी उथल-पुथल

दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद के पी ओली शर्मा ने देश में राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद की थी लेकिन उनकी अपनी कार्यशैली के चलते यह संभव न हो सका। सियासी उथल-पुथल के चलते वे अर्श से फर्श पर आ गए हैं। नेपाल की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी में खींचतान के बाद ओली द्वारा आश्चर्यजनक रूप से दिसंबर में संसद को भंग करने की अनुशंसा से देश एक बार फिर राजनीतिक संकट में चला गया है

 

पिछले कुछ महीनों से चले आ रहे नेपाल में राजनीतिक संकट के बीच सियासी संग्राम में प्रधानमंत्री के पी ओली शर्मा संसद में विश्वास मत हार गए हैं। राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी के आदेश पर संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा के आहूत विशेष सत्र में प्रधानमंत्री ओली की ओर से पेश विश्वास प्रस्ताव के समर्थन में केवल 93 मत मिले, जबकि 124 सदस्यों ने इसके खिलाफ मत दिया।

ओली को 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में विश्वासमत जीतने के लिए 136 मतों की जरूरत थी, क्योंकि चार सदस्य इस समय निलंबित हैं। बता दें कि पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ नीत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) की ओर से समर्थन वापस लेने के बाद ओली सरकार अल्पमत में आ गई थी। इसलिए पीएम ओली को निचले सदन में कल 10 मई को बहुमत साबित करना था। वहीं सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) ने अपने सभी सांसदों को व्हिप जारी कर प्रधानमंत्री के पक्ष में मतदान का अनुरोध किया था लेकिन ओली को सफलता नहीं मिल सकी।

/fi6«klt rogsf nflu dtbfg
gofF afg]Zj/l:yt Joj:yflksf–;+;b ;lrjfnodf ;ª3Lo nf]stflGqs u0ftGq g]kfnsf] bf];|f] /fi6«klt rogsf] nflu dtbfg ug'{x’Fb} /fi6«kltsf pDd]bjf/ ljBfb]jL e08f/L . tl:a/ M k|bLk/fh jGt, /f;;

अब नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने राजनीतिक दलों सरकार बनाने का दावा पेश करने को कहा है। राष्ट्रपति भवन के मुताबिक उन्होंने पार्टी नेताओं से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम के साथ 13 मई को आने को कहा है। इस बीच मंत्रिमंडल की सिफारिश पर वह निचले सदन के विशेष सत्र की अध्यक्षता करेंगी। दरअसल, नेपाल में राजनीति संकट पिछले साल 20 दिसंबर को तब शुरू हुआ जब राष्ट्रपति भंडारी ने प्रधानमंत्री ओली की अनुशंसा पर संसद को भंग कर 30 अप्रैल और 10 मई को नए सिरे से चुनाव कराने का निर्देश दिया। ओली ने यह अनुशंसा सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में सत्ता को लेकर चल रही खींचतान को की थी।

गौरतलब है कि निचले सदन में 121 सदस्य सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के साथ थे। हालांकि, ओली को उम्मीद थी कि विश्वास मत के दौरान अन्य दलों के सांसदों के समर्थन से वह बहुमत साबित कर देंगे लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वहीं नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के माधव नेपाल नीत प्रतिद्वंद्वी धड़े ने मतदान से पहले उनके समर्थन वाले सभी 22 सांसदों के इस्तीफे की चेतावनी दी थी।

इससे पहले नेपाल के वयोवृद्ध वामपंथी नेता केपी शर्मा ओली 2018 के संसदीय चुनाव में वाम गठबंधन की भारी जीत के बाद दूसरी बार प्रधानमंत्री बने थे। तब उन्होंने देश में राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद की थी लेकिन उनकी अपनी कार्यशैली के चलते से यह संभव न हो सका। सियासी उथल- पुथल के चलते वे अर्श से फर्श पर आ गए हैं। नेपाल की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी में खींचतान के बाद ओली द्वारा आश्चर्यजनक रूप से दिसंबर में संसद को भंग करने की अनुशंसा से देश एक बार फिर राजनीतिक संकट में चला गया और पार्टी टूट गई।

ओली किशोरावस्था में ही छात्र कार्यकर्ता के रूप में राजनीति से जुड़े थे और राजशाही का विरोध करने की वजह से 14 साल तक जेल में रहे। वह वर्ष 2018 में वाम गठबंधन के संयुक्त प्रत्याशी के तौर पर दूसरी बार प्रधानमंत्री बने।

सीपीएन (एकीकृत माक्र्सवादी-लेनिनवादी) और पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ नीत सीपीएन (माओवादी केंद्र) ने वर्ष 2017 के चुनाव में प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल करने के साथ-साथ सात में छह प्रांतों में भी जीत दर्ज की थी। दोनों पार्टियां का मई 2018 में औपचारिक रूप से विलय हो गया था।

चीन की ओर झुकाव रखने वाले 69 वर्षीय ओली इससे पहले 11 अक्टूबर 2015 से तीन अगस्त 2016 तक नेपाल के प्रधानमंत्री रहे, तब भारत के साथ नेपाल के रिश्तों में तल्खी थी। पहले कार्यकाल में ओली ने सार्वजनिक रूप से भारत की आलोचना करते हुए नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने और उनकी सरकार को सत्ता से बेदखल करने का आरोप लगाया था। हालांकि, उन्होंने दूसरे कार्यकाल में आर्थिक समृद्धि के लिए भारत के साथ मिलकर आगे बढ़ने का वादा किया था।

दूसरे कार्यकाल में भी ओली ने दावा किया कि उनकी सरकार द्वारा देश के मानचित्र में रणनीतिक रूप से अहम भारत के हिस्सों लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को दिखाने के बाद उन्हें सत्ता से बेदखल करने की कोशिश की जा रही है। इस घटना से दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आ गया था।

ओली ने अपने राजनीति करियर की शुरुआत वर्ष 1966 में तत्कालीन राजा के निर्देश पर अधिनायकवादी पंचायत व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई में शामिल होने के साथ की थी। वह फरवरी 1970 में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए। पार्टी की सदस्यता लेने के बाद वह भूमिगत हो गए। उसी साल पहली बार पंचायती सरकार द्वारा उन्हें गिरफ्तार किया गया।

ओली ने वर्ष 1974 में झापा बगावत का नेतृत्व किया जिसमें जिले के जमींदारों के सिर काटे गए। वह नेपाल के उन कुछ नेताओं में है जिन्होंने कई साल जेल में बिताए हैं। वह वर्ष 1973 से 1987 तक लगातार 14 साल जेल में रहे। ओली जेल से रिहा होने के बाद यूएमएल की केंद्रीय समिति के सदस्य बने और 1990 तक लुम्बिनी क्षेत्र के प्रभारी रहे।

इसके बाद वर्ष 1990 में लोकतांत्रिक आंदोलन से पंचायत राज का अंत हुआ और ओली देश में लोकप्रिय नेता बन गए। ओली वर्ष 1991 में प्रजातांत्रिक राष्ट्रीय युवा संघ के स्थापना अध्यक्ष बने। एक साल बाद वह पार्टी के प्रचार विभाग के प्रमुख बने और उन्होंने खुद को नेपाल की राजनीति में स्थापित किया। वर्ष 1991 में वह पहली बार झापा से प्रतिनिधि सभा के लिए निर्वाचित हुए। वह 1994 से 1994 तक गृहमंत्री रहे। वर्ष 1999 में झापा दो निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित हुए और वर्ष 2006 के गिरिजा प्रसाद कोइराला की सरकार में वह उप प्रधानमंत्री रहे।

ओली चार फरवरी 2014 को द्वितीय संविधान सभा में पार्टी अध्यक्ष झाला नाथ खनाल को हराकर सीपीएन-यूएमएल के नेता निर्वाचित हुए। जुलाई 2016 में अविश्वास प्रस्ताव से पहले ही ओली ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया, जिससे साथ ही उनकी सरकार का पतन हुआ था।

You may also like

MERA DDDD DDD DD