निजाम बदल जाने से आवाम के हालात नहीं बदल जाते, इसका नया और ताजा दृष्टांत हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान है। हाल ही में हुए आम चुनाव में वहां पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की पार्टी ने जीत दर्ज की थी और वे देश के हुकमरान बने। इमरान खान जब क्रिकेट टीम के कप्तान थे तब उन्होंने अपने नेतृत्व में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम को बुलंदियों तक पहुंचाया था। यहां तक कि उनकी ही कप्तानी में पाक टीम विश्व कप खिताब पर कब्जा करने में भी कामयाब हुई थी। ऐसा सिर्फ इनके साथ ही हुआ कि क्रिकेट से संन्यास लेने की उनकी घोषणा के बाद तब के पाक हुक्मरानों ने संन्यास तोड़ने की अपील की। अपील पर तवज्जो देते हुए इमरान खान संन्यास तोड़कर फिर से गेंद और बल्ला थाम मैदान पर उतरे।

ऐसे इमरान से पाकिस्तान की जनता को उम्मीद है कि उनके नेतृत्व में उनके दिन बदलेंगे। उनकी उम्मीदें यकीन के दायरे में दाखिल हो गई हैं। यह अच्छी बात है। मगर प्रधानमंत्री इमरान खान के कंधों पर जन आकांक्षाओं का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इमरान खान ने इस दबाव को चुनौती की तरह लिया है।

प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपने देश की आर्थिक हालात सुधारने के लिए चीन की तरफ मदद के हाथ बढ़ाए जो पाकिस्तान के साथ-साथ भारत के लिए भविष्य में मुसीबत पैदा कर सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान पिछले कई मौकों पर चीन को अपना भरोसेमंद दोस्त बताता रहा है। इसी दोस्ती के तहत चीन ने पाकिस्तान में भारी निवेश किया है। नतीजतन पाक कर्ज के दलदल में डूबता चला गया। उसके बाद उस कर्ज से मुक्ति के वास्ते पाक ने कई देशों के आगे गुहार लगाई। लेकिन किसी देश से उसे मदद नहीं मिली। ऐसे में गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान की मदद के लिए यूएई आगे आया है। दोनों देशों के बीच 23 जनवरी को एक डील हुई है। जिसके तहत संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) तीन अरब डालर स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान में जमा कराएगा। इस तरह आबूधाबी की मदद से इमरान खान की सरकार को नकदी संकट दूर करने में मदद मिलेगी। साथ ही साथ तेल आपूर्ति के भुगतान में भी पाक को छूट मिलेगी। पिछले साल सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 6 अरब डॉलर का पैकेज देने की पेशकश की थी। उसकी पाकिस्तान में चीनी मदद से बन रहे ग्वादर बंदरगाह के पास 10 अरब डालर की तेल रिफाइनरी स्थापित करने की योजना है। खास बात यह कि इस क्रम में वह चाइना-पाकिस्तान इकनामी कॉरीडोर का हिस्सा बन रहा है। सऊदी अरब के क्रायन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इस समझौते पर दस्तख्त करने फरवरी में पाकिस्तान जाएंगे।

यह सब देखने में बड़ा सुहाना मालूम हो रहा है। लेकिन सच अक्सर सतह के नीचे दबा रहता है। पाक के हुक्मरान भले ही इस मदद को बड़ी बात के रूप में बता रहे हैं। वे यह भी दावा कर रहे हैं कि संयुक्त अरब अमीरात की इस मदद की कोई शर्त नहीं, मगर ऐसा है नहीं अमीरात के साथ होने वाले समझौते से कई अड़चनें हो सकती हैं। पाक के हुक्मरान भले ही कहें कि मदद की कोई शर्त नहीं है, पर आज तक कोई भी देश बिना अपना हित देखे किसी मदद नहीं करता। सऊदी अरब चाहता है कि यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान भी शामिल हो। इसका दूसरा पहलू यह है कि सऊदी रिफाइनरी से पाक का पड़ोसी ईरान उससे नाराज हो सकता है क्योंकि अपने स्वार्थी शत्रु सऊदी अरब का अपनी सीमा के नजदीक आ बैठना उसे रास नहीं आएगा। पाक की अभी उम्मीद चाईना-पाकिस्तन इकनामिक कॉरिडोर पर टिकी है। यह पाक के लिए वह जाल है। जिस बात को वह अभी समझ नहीं पा रहा है। वह सिर्फ और सिर्फ आज देख रहा है। जो भी समझौते कर रहा है उसके दूरगामी अंजामों पर उसकी नजरें नहीं हैं।

दूरगामी परिणामों के भयावह सच का अंदाजा एक रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। उस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2030 तक पाकिस्तान पर चीन का कर्ज 40 अरब डॉलर हो जाएगा, जिसको चुकाना उसके बूते के बाहर है। चीन के चरित्र को देखते हुए जनकारों का मानना है कि ग्वादर का भविष्य श्रीलंका के हक्बनरोग बंदरगाह सरीखा हो सकता है। हक्बनरोग बंदरगाह को विकसित करने के लिए चीन ने श्रीलंका को एक अरब डॉलर का कर्ज दिया था, जिसे न चुका पाने की स्थिति में श्रीलंका को अपना बंदरगाह चीन को सौंपना पड़ा।

यह भी एक विडम्बना है कि भारत से अलग होने के बाद पाकिस्तान आर्थिक रूप से कभी मजबूत नहीं हो सका। वह हमेशा ही कर्ज में डूबा रहा है। पाकिस्तान हाल तक अमेरिका मदद के सहारे जीता रहा और अब उसमें अलग हुआ तो चीन और खाड़ी देशों की बैशाखी पर चलने लगा है। आत्मनिर्भर होने की उसने कभी कोशिश ही नहीं की। पाक की तुलना में बेहतर हालत तो बांग्लादेश की हैं, जिसे आज की तारीख में कपड़ा निर्यात में दुनिया के अग्रणी देशों में गिना जा रहा है।

जहां तक भारत का प्रश्न है उसके लिए पड़ोसी देश पाकिस्तान की जर्जर आर्थिकी स्थिति और उसके कभी अमेरिका तो कभी चीन की गोद में खेलना चिंताजनक है। उसके बंदरगाह पर चीन का कब्जा भारत के लिए खतरनाक है।

लब्बोलुआब यह कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान अगर अपने देश के लिए धन का जुगाड़ कर रहे हैं तो यह उनका फर्ज है। मगर साथ ही साथ मुल्क के भविष्य के विषय में भी उन्हें सतर्क रहने की जरूरत है।

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