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संवैधानिक संकट के कगार पर पाक

पाकिस्तान की सत्ता पर सेना अपना दबदबा बनाए रखती है। ऐसे में वह क्यों चाहेगी कि एक पूर्व सैन्य तानाशाह मुशर्रफ को फांसी हो जाए। इससे तो सेना के मुकाबले अदालत का रुतबा काफी बढ़ जाएगा। सेना और अदालत के बीच गहराता टकराव मुल्क के लिए शुभ संकेत नहीं है

 

इस्लामाबाद की विशेष अदालत ने भले ही राजद्रोह के ंआरोप में पूर्व सैन्य तानाशाह और राष्ट्रपति परवेज मुर्शरफ को फांसी की सजा दे दी है, लेकिन उन्हें फंदे पर लटकाना इतना भी आसान नहीं होगा जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के मामले में हुआ था। अदालत के आदेश पर तामीली को लेकर न सिर्फ आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं, बल्कि देश में संवैधानिक संकट खड़ा होने की गंभीर चुनौती अलग से खड़ी हो चुकी है। मुशर्रफ को मौत की सजा मिलने के बाद सेना और अदालत आमने-सामने हैं। फिलहाल सेना ने अदालत के फैसले पर सवाल उठाए हैं। अगर यह विवाद गहराया तो पकिस्तान में एक संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आखिर ऊंट किस करवट बैठता है। सेना के भारी विरोध के बीच इमरान सरकार बैकफुट पर आ गई है। सूचना मंत्री डॉ फिरदौस अवान ने कहा भी है कि सरकार मुशर्रफ को हुई सजा की खुद विस्तार से समीक्षा करेगी।

दरअसल, पाकिस्तान में लंबे समय तक सेना का राज रहा है। सेना वहां की सत्ता में दिलचस्पी लेती रही है जिसका फायदा उठाकर वहां के जनरल अक्सर तख्तापलट करते रहे हैं। ऐसे में लगता है कि सेना नहीं चाहेगी कि किसी सैन्य तानाशाह को मौत की सजा हो। अगर ऐसा हो गया तो जनता की नजरों में अदालत का रुतबा स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएगा। संभवतः इसी वजह सेना मुशर्रफ को मिली सजा को पचा नहीं पा रही है। स्थिति यह है कि सेना ने अदालत के फैसले पर सवाल खड़े किए हैं।

जानकारों का मानना है कि सेना और अदालत जिस तरह आमने- सामने हैं उसके चलते विवाद गहराया तो देश में संवैधानिक संकट के हालात पैदा हो सकते हैं। इमरान सरकार के लिए यह चिंता का विषय है।

दरअसल, यह विवाद सेना के एक पत्र से उत्पन्न हुआ है, जो इस समय वायरल हो रहा है। मुशर्रफ को मिली सजा को लेकर पाकिस्तानी सेना में नाराजगी है। सोशल मीडिया पर इन दिनों यह बहस तेज हो गई है। सेना ने मुशर्रफ की वीरता की तारीफ की है। पाकिस्तान के डीजी आइएसपीआर ने इसको लेकर एक ट्वीट किया और एक पत्र जारी किया है। इस पत्र को सेना ने शेयर किया है। इस पत्र में कहा गया है कि पूर्व सेना प्रमुख, स्टाफ कमिटी के ज्वाइंट चीफ और पूर्व राष्ट्रपति जिसने 40 वर्षों तक देश की सेवा की, कई अहम युद्धों में हिस्सा लिया, ऐसे में वह गद्दार कैसे हो सकते हैं? इस पत्र के जरिए सेना ने मुशर्रफ का समर्थन किया है। सेना ने अदालत के फैसले पर भी सवाल उठाया है। सेना का तर्क है कि अदालत ने सजा देने की प्रक्रिया में संविधान की अनदेखी की है।

इस्लामाबाद की विशेष अदालत ने मुशर्रफ को राजद्रोह के मामले में फांसी की सजा सुनाई है। 12 अक्टूबर 1999 को मुशर्रफ ने नवाज शरीफ सरकार का तख्तापलट किया था। विशेष अदालत ने उन्हें 2007 में संविधान को निलंबित करने और गैरसंवैधानिक तरीके से देश में इमरजेंसी थोपने का दोषी पाया। उस दौरान मुशर्रफ के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट सहित विभिन्न अदालतों के अनेक जजों को नजरबंद कर दिया गया था।

इसी आरोप में उन पर राजद्रोह का केस चल रहा था। उन्होंने देश में आपातकाल के बाद मार्शल लॉ भी लगा दिया था। मुशर्रफ इन दिनों दुबई में हैं। उनके खिलाफ राजद्रोह का मामला दिसंबर 2013 से लंबित था। वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान पाक को शिकस्त मिली तो मुशर्रफ ने इस मौके का फायदा उठाते हुए नवाज शरीफ का तख्तापलट कर पाकिस्तान की कमान अपने हाथ में ले ली थी। जनरल मुशर्रफ ने राष्ट्रपति का पद संभाला और सेनाध्यक्ष के पद पर भी बने रहे। 2002 में वे पांच साल के लिए राष्ट्रपति चुने गए। 2007 में एक बार फिर वे चुनाव जीते, लेकिन इस बार सुप्रीम कोर्ट ने उनके निर्वाचन को चुनौती दी, तो उन्होंने देश में इमरजेंसी लगा दी। पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक यह राजद्रोह है, जिसमें सजा-ए-मौत का प्रावधान है। मुशर्रफ को मिली सजा ने सबको चौंकाया है कि पाकिस्तान के इतिहास में वह पहले ऐसे पूर्व सैन्य प्रमुख हैं, जिनके खिलाफ राजद्रोह का मामला चला और उन्हें दोषी करार दिया गया वर्तमान जनरल बाजवा की सेवावृद्धि में सुप्रीम कोर्ट के कटौती करने के बाद यह दूसरा मौका है, जब न्याय पालिका ने सैन्य प्रतिष्ठान या उससे जुड़े़ किसी शख्स के खिलाफ सख्त कदम उठाया है। मुशर्रफ 2016 से अपना इलाज करवाने के लिए दुबई में हैं और संकेत हैं कि उनके वकील इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। इसके बाद उनके पास राष्ट्रपति से याचना करने का विकल्प भी होगा। इस मामले में उनके खिलाफ दिसंबर 2013 में सुनवाई शुरू हुई थी। मार्च 2014 में उन्हें देशद्रोह का दोषी पाया गया। हालांकि अलग-अलग अपीलीय फोरम में मामला चलने की वजह से सैन्य तानाशाह का मामला टलता चला गया। मुशर्रफ ने धीमी न्याय प्रक्रिया का फायदा उठाते हुए मार्च 2016 में पाकिस्तान छोड़ दिया और दुबई चले गए।

पाकिस्तान के हाईकोर्ट और विशेष अदालत की ओर से उन्हें कई बार समन जारी किये गए, लेकिन वे हर बार दुबई से ही बीमारी का बहाना बनाकर पाकिस्तान लौटने से इंकार करते रहे। हाल ही में मुशर्रफ ने अस्पताल से एक वीडियो जारी किया। इसमें वे बिस्तर पर लेटे-लेटे कहते हैं, देशद्रोह का केस बेबुनियादी है। गद्दारी छोड़िए, मैंने तो इस मुल्क की कई बार खिदमत की है। कई बार जंग लड़ी। 10 साल तक सेवा की। आज मेरी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। मेरे खिलाफ जांच के लिए कमीशन बनाया गया। बेशक बनाइए, लेकिन कमीशन यहां आकर मेरी तबियत देखे और बयान दर्ज करे। इसके बाद कोई कार्रवाई की जाए। कमीशन की बात कोर्ट भी सुने। उम्मीद है कि मुझे इंसाफ मिलेगा।

इससे पहले 4 अप्रैल 1979 को पाकिस्तान के रावलपिंडी में एक फांसी हुई। यह फांसी मिली जुल्फिकार अली भुट्टो को, जो कोई आम शख्स नहीं थे, बल्कि उस मुल्क के ताकतवर राजनेताओं में से एक थे। वे पाकिस्तान के नौवें प्रधानमंत्री थे। उनके बारे में कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें जानकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे। भुट्टो 14 अगस्त 1973 से 5 जुलाई 1977 तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे। 5 जुलाई 1977 को पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल मोहम्मद जिया-उल-हक ने उनका तख्तापलट कर दिया और सेना के हाथ में कमान आ गई। 3 सितंबर 1977 को सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन पर मार्च 1974 में विपक्षी नेता की हत्या का आरोप लगा था। भुट्टो का मुकदमा स्थानीय कोर्ट की जगह सीधे हाईकोर्ट में चला। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उन्हें अदालत में अपना पक्ष रखने का मौका नहीं मिला। 18 मार्च 1978 को लाहौर हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि जुल्फिकार अली भुट्टो को नवाब मोहम्मद अहमद खान की हत्या के जुर्म में फांसी पर लटकाया जाएगा। फांसी देने के महज दो साल पहले तक वे पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम थे। जानकारों का मानना है कि भुट्टो और मुशर्रफ में बहुत अंतर है। मुशर्रफ के पक्ष में देश की सेना है। उन्हें इतनी जल्दी सजा मिलने की संभावना जरा भी नहीं है।

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