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परेशानियों में पाकिस्तान

पाकिस्तान है कि चुनौतियों से उबर ही नहीं पा रहा है। एक समस्या से कुछ राहत मिलती है तो दूसरी खड़ी हो जाती है। हाल में आतंकवाद को आश्रय देने को लेकर दुनियाभर में पाक की निंदा हुई। दुनिया ने देखा कि कैसे आतंकी संगठनों को पाक की धरती पर फलने-फूलने का माहौल मिला। अब तो यहां खतरनाक संगठन आईएस (इस्लामिक स्टेट) भी अपनी जड़ें जमाने के मूड में है। आईएस भारत के लिए भी चिंता की वजह है, लेकिन इससे पहले पाकिस्तान के आम आदमी को उसकी सनक का शिकार होना पड़ेगा। महिलाओं और बच्चों के प्रति उसके अत्याचार मानवता को त्रस्त करते रहे हैं। पाकिस्तान के आर्थिक हालात भी ठीक नहीं चल रहे हैं। अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है और कंगाली के कगार पर खड़े इस मुल्क को अब आईएमएफ और दूसरे मुल्कों से मदद मांगनी पड़ रही है। मुल्क के लिए एक बड़ी समस्या यह है कि पठान बहुल इलाके में पख्तून आंदोलन उठ रहा है। पख्तून तहफ्फुज मूवमेंट (पीटीएम) के नेतृत्व के चल रहे इस आंदोलन को खासा जनसमर्थन मिल रहा है।

हाल में अमेरिकी सेना के एक पूर्व अधिकारी लारेंस सैलिन ने कहा कि आतंकी संगठन आईएसआईएस पाकिस्तान में अपनी जड़ें जमा रहा है। यहां की धरती उसके लिए उर्वरा साबित हो रही है। अब यह अलग बात है कि यहां आईएस ने किस हद तक पांव जमाए हैं, लेकिन पूर्व अमेरिकी अधिकारी की बात ने दुनिया सहित भारत की भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। सच तो यह है कि आईएस भारत से अधिक खतरनाक पाकिस्तान की अवाम के लिए होगा। जिन देशों में उसके पैर पड़े वहां उसने महिलाओं और बच्चों पर भी जघन्य अत्याचार किए। उसके अत्याचारों को याद करते ही रूह कांप जाती है।

पाकिस्तान के अंदरूनी हालत अनुकूल नहीं है। इस देश की सत्ता पर जो भी आया उसकी भेदभावपूवर्ण नीतियों के चलते जनता में नाराजगी और अलगाववाद के स्वर बुलंद हुए। इसके चलते अतीत में पाकिस्तान विभाजन का दंश झेलना पड़ा और भविष्य में भी सत्ता का नजरिया नहीं बदला तो पाक के और भी टुकड़े हो सकते हैं। हालांकि पाकिस्तान जनता के बीच से उठती हर आवाज को सेना के बूते कुचलता रहा है, लेकिन यह नीति ज्यादा दिनों तक कारगर साबित नहीं होती। पिछले दो साल से पाकिस्तान की ताकतवर सेना को पठानों का एक संगठन पख्तून महफ्फुज मूवमेंट चुनौती दे रहा है। पाकिस्तानी सेना का आरोप है कि यह संगठन अफगानिस्तान के इशारे पर पाकिस्तान को अस्थिर करना चाहता है, लेकिन पठानों का तर्क कुछ और है। पाकिस्तान में यह नया आंदोलन देश के पठान बहुल पश्चिमोत्तर इलाके से उठा है। इसके समर्थकों में इस बात को लेकर गुस्सा है कि दशकों तक उनके इलाके को मैदान-ए-जंग की तरह इस्तेमाल किया गया। इसके लिए वे जिहादियों और पाकिस्तानी सेना दोनों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। पख्तून तहफ्फुज मूवमेंट (पीटीएम) को जनता का खासा समर्थन मिला है। उसकी रैलियों में हजारों की संख्या में लोग जमा होते हैं। उसके समर्थक आतंकवाद विरोधी युद्ध की आलोचना करते हैं। उनके मुताबिक इसी की वजह से पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों ही देशों में पख्तून इलाकों को रौंदा गया है। हाल में पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने पीटीएम के नेतृत्व पर देश के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि पीटीएम को भारत और अफगानिस्तान की खुफिया एजेंसियों से पैसा मिल रहा है। उन्होंने पीटीएम नेतृत्व को चेतावनी दी, जिस तरह से वे दूसरों के हाथों में खेल रहे हैं, उनका समय पूरा हो गया है।

दूसरी तरफ पुलिस ने पीटीएम के पदाधिकारी और सांसद अली वजीर और 11 अन्य लोगों के खिलाफ पाकिस्तानी राष्ट्र और सेना के खिलाफ नारेबाजी के आरोप में एफआईआर दर्ज की है। रिपोर्ट में कहा गया है, वे लोगों को सेना के खिलाफ भड़का रहे थे और देश की सुरक्षा को कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे। पीटीएम चाहता है कि आतंकवाद विरोधी युद्ध के नाम पर पख्तूनों का अपहरण और उनकी एक्स्ट्रा ज्यूडिशल हत्याएं बंद हों। इस मांग से हजारों पख्तून सरोकार रखते हैं। पीटीएम के समर्थक अपने इलाके की बर्बादी के लिए पाकिस्तानी सेना और इस्लामी कट्टरपंथियों दोनों को जिम्मेदार मानते हैं। युद्ध से जूझ रहे अफगानिस्तान में अब भी बड़े इलाके पर अफगान और पाकिस्तान तालिबान का कब्जा है जिन्हें अफगान सरकार और अमेरिका के मुताबिक पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई से समर्थन मिल रहा है। अफगान सीमा से लगने वाले पाकिस्तान के इलाके अब भी हिंसा और अशांति झेल रहे हैं। इसकी वजह एक तरफ जिहादियों की गतिविधियां हैं तो दूसरी तरफ उनके खिलाफ पाकिस्तान सेना के अभियान। इससे वहां मौतें हो रही हैं और लोग इलाके को छोड़कर भाग रहे हैं।

पीटीएम के संस्थापक मंजूर पश्तीन के मुताबिक उनके संगठन के खिलाफ पाकिस्तानी सेना के आरोप बिल्कुल बेबुनियाद हैं। मंजूर कहते हैं, ‘वे हम पर दबाव डालना चाहते हैं ताकि हम अपनी मांगों को छोड़ दें। हम सरकार से बातचीत करने को तैयार हैं।’ वे पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता के आरोपों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की धमकी भी देते हैं।

उल्लेखनीय है कि 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद से ही पख्तून देश के लिए एक संवेदनशील मुद्दा रहे हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा के दोनों तरफ बड़ी संख्या में पख्तून आबादी रहती है। पाकिस्तान शुरू से ही पख्तून बहुल एक अलग देश के विचार को खारिज करता रहा है। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि पाकिस्तानी अधिकारी इलाके में इस्लामीकरण के जरिए ‘पख्तूनिस्तान’ के आंदोलन को दबाना चाहते हैं। इस आंदोलन का नेतृत्व उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनेता और कार्यकर्ता कर रहे हैं।
पाकिस्तान के आर्थिक हालत चिंताजनक हैं अब उसे संभलने के लिए आईएमएफ और दूसरे मुल्कों का मुंह ताकना पड़ रहा है। खबर हैं कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के वास्ते तीन साल के लिए छह अरब डॉलर का ‘बेलआउट’ पैकेज देगा। प्रधानमंत्री इमरान खान के वित्त, राजस्व एवं आर्थिक मामले के सलाहकार अब्दुल हाफीज शेख ने यह घोषणा की। शेख ने पाकिस्तान टेलीविजन नेटवर्क में कहा पाकिस्तान की तकनीकी टीमें और आईएमएफ के बीच तीन साल के बेलआउट पैकेज पर समझौता हुआ है, जिसमें पाकिस्तान को मदद के रूप में छह अरब डॉलर मिलेंगे। उन्होंने कहा, एक महीने की चर्चा और वार्ता के बाद आईएमएफ और पाकिस्तान के बीच यह समझौता हुआ है।

इस समझौते को अभी वाशिंगटन में आईएमएफ बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की औपचारिक मंजूरी मिलनी बाकी है, लेकिन यह दर्शाता है कि पाकिस्तान में प्रभावी सुधार चल रहे हैं। इसके लिए आईएमएफ मिशन प्रमुख एर्नेस्टो रमिरेज रिगो ने भी पाकिस्तान की इस घोषणा की पुष्टि की है और कहा कि पाकिस्तान की आर्थिक नीतियों के समर्थन के लिए विस्तारित निधि व्यवस्था के तहत 39 महीनों के लिए छह अरब डॉलर की मदद दी जा सकती है। जानकारी के मुताबिक पाकिस्तान चाहता है कि वह भारत से अच्छे रिश्तों की शुरुआत करे जिससे कि उसकी गिरती अर्थव्यवस्था को बचाया जा सके। खबरों के अनुसार दोनों देशों के बीच वार्ता के लिए बनाए गए संस्थागत सैन्य माध्यम से पाकिस्तान की सेना ने भारत को इस मामले में प्रस्ताव भेजा है। पाकिस्तान की ओर से प्रस्ताव में कहा गया है कि वह सीमा पर तनाव कम करने को तैयार है। पाकिस्तान ने प्रस्ताव दिया है कि वह स्पेशल सर्विस ग्रुप (एसएसजी) को नियंत्रण रेखा से हटा देगा। एसएसजी पाकिस्तान की स्पेशल फोर्सेस में से एक है जिसे किसी भी देश के तनाव के दौरान सीमा पर लगाया जाता है।

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