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रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का फ्रांस में विरोध

भारत में एक कहावत है , ‘अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम।’ यानी जब अजगर को किसी की नौकरी नहीं करनी होती और पक्षी को भी कोई काम नहीं करना होता, ईश्वर ही सबका पालनहार है, तो कोई भी काम मत करो ईश्वर स्वयं देगा। भारतीय कवि मलूकदास का ये कथन फ्रांस में हो रहे प्रदर्शन को देखकर बड़ा ही उचित प्रतीत होता है।

हालांकि इस कहावत का फ्रेंच में अनुवाद तो अब तक नहीं हुआ है लेकिन इसका भाव जरूर फ्रांस के लोगों तक पहुंच गया है।  वैसे तो ये सवाल फ्रांस में करीब डेढ़ सौ साल से पूछा जा रहा है लेकिन अब ये एक नए रूप में सामने आ रहा है सड़कों पर उतरे लोग कह रहे हैं कि सरकार हमें रिटायर करे। नौकरी से मुक्ति दे अगर काम करना इतना ही अच्छा लगता है तो राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ख़ुद कर लें।

फ्रांसीसियों की फिलॉसफी की बात करने से पहले जान लेते हैं आखिर इस सब की वजह क्या है ? दरअसल इस प्रदर्शन और विवाद की वजह है राष्ट्रपति मैक्रों की पेंशन सुधार योजना। फ्रांस की सरकार रिटायरमेंट की उम्र को 62 वर्ष से बढ़ाकर 64 वर्ष करना चाह रही है। जिसके लिए सरकार के पास दो बड़े कारण है एक सरकारी खजाने से पेंशन के बोझ को कम किया जाए। दूसरा लोगों का जीवन औसतन 10 साल बढ़ जाना। ऐसे में सरकार को ज्यादा वक्त तक पेंशन देनी पड़ रही है तो फिर जब पैसे दिए ही जा रहे हैं, तो क्यों न काम करा लिया जाए! ऐसा सरकार का सोचना है। लेकिन जनता इसका जमकर विरोध जता रही है।

सरकार के मुताबिक इससे रोज़गार का डेटा बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। फ्रांस में वर्तमान में काम नहीं करने वालों का प्रतिशत सात फीसदी बताया जाता है। मैक्रों की पार्टी का कहना है कि नए सुधारों से यह आंकड़ा पांच फीसदी हो सकता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नए प्रस्तावों के तहत लोगों को पेंशन लेने के लिए साल 2027 से कुल 43 वर्ष काम करना होगा। फ्रांस में मौजूदा न्यूनतम सेवा काल 42 साल है।

मैक्रों गवर्नमेंट लोगों को यह तर्क दे रही है कि काम करने और रिटायर होने वाले लोगों के बीच का अनुपात तेजी से कम हो रहा है। इसे ठीक करना जरूरी है नहीं तो देश की इकॉनमी पेंशन के बोझ से बर्बाद हो जाएगी। फ्रांस ऐसा करने वाला पहला देश नहीं है इससे पहले कई दूसरे यूरोपीय देशों ने भी रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाई है। इटली और जर्मनी में यह 67 साल है, जबकि स्पेन में 65 साल। सरकार जनता को समझने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है लेकिन जनता आर या पार के मूड में है।

फ्रांस में सरकारी नौकरी या काम से पीछा छुड़ाने की चाह बहुत पुराने समय से ही कायम है। फ्रांस के  एक राजनीतिक लेखक, अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता पॉल लाफार्ग ने तो 1883 में इस पर एक किताब ही लिख डाली। इस किताब का नाम है, ‘द राइट टू बी लेज़ी’ यानी आलसी होने का अधिकार।
उनका कहना था कि दिहाड़ी मज़दूरी बढ़ाने की मांग को लेकर होने वाले आंदोलन व्यर्थ हैं। काम के लिए मांग क्यों की जाए ? मांग ही करनी है, तो मज़दूरी कम करने की होनी चाहिए।

लोगों का दिन में आठ घंटे काम करने के अधिकार के लिए सरकार से लड़ना पागलपन है। आलस्य, विश्राम का अधिकार होना चाहिए। लोगों को लड़ना ही है, तो मज़े और आराम के लिए लड़ना चाहिए। नौकरी का मतलब है गुलामी। यह जितना कम हो उतना अच्छा है। यदि काम कम होगा तो मनुष्य उन चीजों के लिए समय निकाल पाएगा जिनके लिए उसने जन्म लिया है। और वो चीज़ें क्या हैं? लाफार्ज ने बताया था- दोस्तों के साथ गपशप करना, आरामकुर्सी पर पीठ के बल घंटों बैठना, जिंदगी का लुत्फ उठाना।

लाफार्ग के समय तक मशीनों ने कारखानों में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था। उन्होंने तब कहा था कि मशीनें हमारे काम को एक दिन में तीन-चार घंटे तक सीमित कर सकती हैं और ऐसा होना चाहिए।

लाफार्ज के करीब 125 साल बाद एक और किताब आई। कोरिने मेयर की ‘हैलो लेज़ीनेस’ (बोनजोर पारसी) और इसमें भी आलस्य की काफ़ी तारीफ़ हुई थी। महापौर ने कॉरपोरेट कल्चर की धज्जियां उड़ा दीं। कहा कि कम से कम काम तो हमारे ज्यादा हित में है।

लाफार्ग ने जिस आराम के अधिकार की मांग की थी, वह आम जनता के दिलो-दिमाग में भी बैठा हुआ है।

फ्रांस में लोगों के दिमाग में एक विचारधारा बैठ गई है कि अधिक काम क्यों करें? हम सिर्फ कमाने और खाने के लिए पैदा नहीं होते हैं। सरकार की भी कुछ जिम्मेदारी होती है। अब मैक्रों जिस पेंशन संकट से जूझ रहे हैं, उसके लिए यह सुझाव दिया जा रहा है कि अति धनाढ्य लोगों पर दो फीसदी अतिरिक्त टैक्स लगाया जाए। यह पूरे नुकसान की बराबरी करेगा। यह मांग वहां के राजनीतिक दल कर रहे हैं।

फिर भी मैक्रों के लिए उम्मीद की कुछ किरण अभी बाकि है। कुछ लोग अभी भी काम के महत्व को समझते हैं। साप्ताहिक औसत काम को लेकर ज्यादा सख्ती नहीं है, इसलिए बताया जा रहा है कि फ्रांसीसी औसतन हफ्ते में 37 घंटे काम कर रहे हैं। वहां के मिजाज को देखते हुए इसे क्रांतिकारी ही कहा जाएगा। इन्हीं उम्मीदों के सहारे मैक्रों पेंशन सुधार को लागू करने पर अड़े हैं।

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