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अब दलाई लामा की विरासत पर तकरार

धर्म गुरु दलाई लामा पिछले कई दशकों से भारत-चीन सम्बंधो में तनाव का महत्वपूर्ण कारण रहे है। अपनी बढ़ती उम्र के चलते अब दलाई लामा नया तिब्बती गुरु घोषित करने की मंशा जाहिर कर रहे है। उन्होंने संकेत दिए है की तिब्बती समाज का 15वां गुरु भारत में रह रहे उनके अनुयायियों में से कोई हो सकता है। दलाई लामा की इस घोषणा से चीन बौखला गया है। चीन ने दलाई लामा के चयन को लेकर एक बार फिर धौंस दिखाने की कोशिश की है। चीन के अधिकारियो का कहना है की अगले लामा गुरु पर कोई भी निर्णय चीन के भीतर ही होना चाहिए और यह भी कहा गया की भारत का इस मुद्दे पर किसी भी प्रकार के दखल का असर द्विपक्षीय सम्बंधो पर पड़ सकता है चीन के वरिष्ठ अधिकारियो और विशेषज्ञो का कहना है की इस संवेदनशील निर्णय पर दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चीन सरकार की मान्यता मिलनी चाहिए और अगले लामा गुरु का चयन देश के भीतर 200 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक प्रक्रिया के द्वारा होना चाहिए। तिब्बत के सहायक मंत्री स्तर के अधिकारी वांग नेंग शेंग ने ल्हासा में मीडिया से बातचीत में कहा की ‘दलाई लामा के उत्तराधिकारी का चयन एक ऐतिहासिक, धार्मिक और राजनितिक मुद्दा है। इसके लिए स्थापित ऐतहासिक संस्थान और ओपचारिकताएं है।’ उनके द्वारा यह भी कहा गया की इसका निर्णय उनकी निजी इच्छा अथवा दूसरे देशो में रहने वाले लोगो के गुट द्वारा लिया जाता है। दलाई लामा की उम्र 84 साल है इसी कारण पिछले कुछ दिनों के नए लामा गुरु का मुद्दा गरमा गया है।

चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे से पहले बौद्ध और चीन के बीच सब सामान्य था। 1951 से पहले आजाद तिब्बत पर चीन ने हजारो सैनिक को भेजकर कब्जा कर लिया गया था चीन द्वारा कब्जा करने के बाद तेनजिन ग्यात्सो को 14वे दलाई लामा के तौर चुना गया। दलाई लामा के पद संभालते ही चीन परेशान हो गया। इसी दौरान परेशान चीन ने दलाई लामा को एक कार्यक्रम में आने का निमंत्रण दिया और साथ ही यह भी कहा की वह बिना किसी सुरक्षा के आये। इस पर तिब्बती लोगो और उनके अनुयायियों को संदेह हुआ की चीन द्वारा यह दलाई लामा को बंदी बनाने की कोई चाल है, तब सभी लोगो ने मिलकर उन्हें वह जाने से रोक लिया था। इस बात से चीन बुरी तरह चिढ गया और चीन द्वारा गोलीबारी का आदेश दे दिया गया। चीनी सैनिको का निशाना दलाई लामा थे। तिब्बती लोगो का कहना है इस खुनी संघर्ष में चीनी आर्मी द्वारा हजारो लोगो को मार दिया गया था। इस पूरी घटना से दुनिया बेखबर थी। पड़ोसी देश होने के नाते भारत की वहा राजनयिक पहुंच थी।

तिब्बत में फैली अशांति के कारण दलाई लामा को छिप-छिप कर रहना पड़ा। कहा जाता है की चीनी आर्मी की यूनिफार्म पहन कर दलाई लामा बचकर भारत आने में सफल हुए थे। जब कुछ ठीक होता न दिखा तब दलाई लामा असम के रास्ते भारत आ गए थे । जहा 31 मार्च को नेहरू द्वारा दलाई लामा और उनके साथ आये लोगो को हिमाचल के हिल स्टेशन धर्मशाला में शरण की इजाजत दे दी गयी थी। नेहरू सरकार ने दलाईलाभा को शरण तो दी लेकिन किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधि न करने पर पाबंदी लगा दी। तब से दलाई लामा भारत में रह तिब्बत की निवर्सित सरकार चला रहे हैं। धर्मशाला में रहकर ही दलाई लामा ने तिब्बत को आजाद कराने के कैम्पेन भी शुरू कर दिया, इस दौरान कई बार दलाई लामा और चीन के बीच बातचीत के प्रयास हुए परंतु सब विफल रहे। इसके पश्चात चीन द्वारा दलाई लामा को खतरनाक अलगावादी बताते हुए उन्हें ब्लैकलिस्ट में डाल दिया गया था। तब से अब तक तिब्बती लोगो पर चीन द्वारा किए अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठती आयी है।

नए लामा गुरु का चयन कुछ नियमो द्वारा होता आया है। तत्कालिक लामा गुरु द्वारा कुछ संकेत दिए जाते है जिसके आधार पर नये लामा गुरु की खोज की जाती है इस खोज की शुरुआत लामा गुरु के निधन के तुरंत बाद कर दी जाती है इस खोज में महीनो से सालो भी लग जाते है। जब तक प्रक्रिया पूरी नहीं होती तब तक किसी स्थायी विद्वान द्वारा लामा गुरु का काम संभाला जाता है।

पहले से निभाई जा रही परंपराओं को अगर एक तरफ रख दे तो अभी स्पष्ट नहीं है की अगला लामा गुरु किसे चुना जायेगा और किस तरह चुना जायेगा। दरसअल, चीन पुरानी किसी भी परम्परा को मानने से इंकार करता आया है, वही दलाई लामा भी कह चुके है की वह अपना उत्तराधिकारी अपने जीवनकाल में ही चुन सकते है या यह काम अपने धर्मगुरुओं को सौंप सकते है अगर ऐसा हुआ तो यह परंपरा से बिलकुल अलग होगा। बहरहाल इस पूरे मुद्दे पर अभी तक भारत ने अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी है।

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