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अब अहमद उतरे मैदान-ए-जंग

इथियोपिया के प्रधानमंत्री को 2019 में विश्व के सबसे प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था। शांति का यह मसीहा लेकिन अब हिंसा की राह पकड़ चुका है। देश में चल रहे गृहयुद्ध से निपटने के लिए खुद सेना की कमान संभालने की बात कह अबी अहमद ने अमेरिका समेत विश्व के कई देशों को सकते में डाल दिया है

इथियोपिया में गृहयुद्ध के चलते हालात बेहद खराब हो गए हैं। टिग्रे इलाके के विद्रोही राजधानी अदिस अबाबा की ओर बढ़ रहे हैं। इस महासंकट को देखते हुए इथियोपिया के नोबल शांति पुरस्कार विजेता प्रधानमंत्री अबी अहमद ने अब खुद ही जंग के मोर्चे पर उतरने का ऐलान कर दिया है। पीएम अबी अहमद पहले खुद एक सैनिक रह चुके हैं।

इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद ने 21 नवंबर को ट्वीट करते हुए कहा है कि मैं कल से मोर्चे पर खुद ही रक्षा बलों को एकजुट करूंगा। साथ उन्होंने युवाओं का आह्नान किया कि वे उठ खड़े हों और इतिहास में अपना नाम रोशन करें। उल्लेखनीय है कि इथियोपिया में जारी गृहयुद्ध में अब तक हजारों की संख्या में लोग मारे गए हैं। यह जंग इथियोपिया की सेना और देश के उत्तरी टिग्रे इलाके में सक्रिय लड़ाकुओं के बीच कई महीनों से चल रही है। गृहयुद्ध को लेकर अमेरिका और अन्य देशों ने चेतावनी दी है कि अफ्रीका की दूसरी सबसे ज्यादा आबादी वाला यह देश क्षेत्र के अन्य देशों को अस्थिर कर सकता है। इथियोपिया में लोकतंत्र स्थापित होने के बाद से ही अशांति पसरी हुई है। पूर्व में सत्ता का हिस्सा रहे टिग्रे प्रांत का अब सस्ता में दखल खासा कम हो चला है। यही कारण है कि यहां का प्रभावशाली तबका प्रधानमंत्री अबाबा की सरकार को लगातार अस्थिर करने में जुटा हुआ है।

प्रधानमंत्री अबी का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब टिग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट विद्रोही गुट राजधानी अदिस अबाबा की ओर लगातार बढ़ रहा है। उसने राजधानी से मात्र 220 किमी की दूरी पर शेवा रोबिट कस्बे पर कब्जा कर लिया है। पीएम ने सत्तारूढ़ प्रोसपेरिटी पार्टी की कार्यकारी समिति की एक बैठक को बुलाया है ताकि युद्ध पर चर्चा की जा सके। टिग्रे के विद्रोही गुटों का कहना है कि वे इथियोपिया सरकार पर कई महीने से टिग्रे इलाके में चल रही नाकेबंदी को खत्म करने के लिए दबाव डाल रहे हैं जहां 60 लाख लोग रहते हैं। उन्होंने कहा कि वे पीएम अबी को भी सत्ता से हटाना चाहते हैं। उधर पीएम अबी ने पश्चिमी देशों पर आरोप लगाया है कि वे इथियोपिया में लोकतंत्र को पराजित करना चाहते हैं।

क्या है संघर्ष की पूरी कहानी?
टिग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट एक संगठन है। इसकी शुरुआत एक छोटे से गिरोह से हुई थी। इन्हें जनता का भरपूर समर्थन मिला। जल्द ही वो बड़ी गुरिल्ला आर्मी बन गया था। एक रिपोर्ट के अनुसार टिग्रे को बहुत लंबे समय से इथियोपियन सरकार और हुकूमत करने के उनके सेंट्रलाइज्ड तरीके से दिक्कत रही है। अतीत में यह क्षेत्र लगातार ही अपनी हिंसक सामाजिक प्रवृत्ति चलते कुख्यात रहा है।

19 वीं सदी में इथियोपिया में राजा मेनेलिक का शासन था। इटली इथियोपिया में अपने पांव पसारना चाहता था। उसने इथियोपिया पर हमला किया और किंग मेनेलिक ने युद्ध लड़ने के लिए अपने करीब 80 हजार सैनिकों को रवाना किया था। टिग्रे युद्ध का मैदान था। इटली युद्ध में हार गया मगर इस युद्ध के चलते टिग्रे के लोग अपने राजा से बहुत नाराज हो गए। क्योंकि
टिग्रेवासियों का कहना था कि किंग मेनेलिक ने सेना तो भेजी, मगर उन्हें पर्याप्त राशन नहीं दिया था। इसलिए इथियोपियन सैनिक टिग्रेवासियों के संसाधन लूटने लगे थे। लोगों ने विरोध किया तो उन्हें मार डाला गया था। रिपोर्ट के अनुसार टिग्रेवासियों का कहना है कि उस समय युद्ध में दुश्मन के जितने सैनिक मारे गए थे। उससे कहीं ज्यादा टिग्रे के लोग मारे गए थे।

प्रथम वर्ल्ड वॉर के समय भी ऐसी ही घटना की पुनरावृत्ति हुई। इस वक्त इटली और इथियोपिया में फिर युद्ध हुआ। इसका बैटल ग्राउंड भी टिग्रे ही बना, इस दफा भी यहां के लोगों को जान-माल का बहुत नुकसान हुआ। इस युद्ध में इटली की जीत हुई। इथियोपिया के राजा को देश से भागना पड़ा था। द्वितीय विश्व युद्ध में इटली की हार के बाद वर्ष 1943 में इथियोपियन किंग शासन करने वापस अपने देश पहुंचे। टिग्रे प्रांत को लगा इस राजशाही से मुक्त होने का यही मौका है। उन्होंने विद्रोह कर दिया। राजा ने इस विद्रोह को बड़ी क्रूरता से दबा दिया। टिग्रे को राजा के साथ शांति समझौता करना पड़ा। मगर टिग्रेवासियों के जेहन में ये यादें एक टीस की तरह जिंदा रहीं। शुरुआत में एक छोटा सा गिरोह रहा टिग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट 70 के दशक खत्म होते-होते एक बड़ी गुरिल्ला आर्मी बन गया था।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इथियोपिया में सोवियत के समर्थन वाली सैन्य सरकार थी। उसने इनसर्जेंसी दबाने के लिए हाथ खोलकर हिंसा की। इस काउंटर-इनसर्जेंसी के चलते सबसे ज्यादा नुकसान हुआ टिग्रे को। वहां हजारों लोगों की जान तो गई ही, साथ ही भीषण अकाल भी आ गया। इन यातनाओं ने टिग्रे ‘पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट’ को मिलने वाला जन समर्थन और बढ़ा दिया। 80 का दशक खत्म होते-होते टिग्रे ‘पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट’ इथियोपिया में सक्रिय सबसे मजबूत बागी गुट बन गया। वर्ष 1988 में विद्रोही गुटों ने मिलकर एक संगठन बनाया जिसका नाम रखा गया ‘इथियोपियन पीपुल्स रेवॉल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट’इसके नेतृत्व में विद्रोहियों ने मिलकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, इस लड़ाई में इथियोपिया की राजधानी आदिस अबाबा को जीत लिया और अपने नेतृत्व में टिग्रे ने गठबंधन सरकार बनाई। ये सरकार अलग-अलग क्षेत्रीय ताकतों से गठबंधन की मगर इस सरकार में भी टिग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट का ओहदा सबसे ऊपर था। इसीलिए उसके लीडर मेलेस जेनावी राष्ट्रपति बनाए गए। इस नई सरकार में टिग्रे के लोगों का बोलबाला था। सेना से लेकर खुफिया एजेंसियों तक, हर जगह टिग्रे डॉमिनेटिंग फोर्स बन गया।

जेनावी 1991 से 1994 तक राष्ट्रपति रहे। 1994 में इथियोपिया का नया संविधान लागु हुआ। इसमें शासन का सबसे पावरफुल पद था ‘प्रधानमंत्री’। 1995 में मेलेस जेनावी देश के प्रधानमंत्री बन गए। वर्ष 2012 में जेनावी की मौत के बाद प्रधानमंत्री बने उनके उत्तराधिकारी हेलेमरियम डेसाले। लेकिन इनके कमजोर नेतृत्व के चलते ‘टाइग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट’ की ताकत घटने लगी। अब तक वो गठबंधन का सर्वेसर्वा था। मगर अब क्षेत्रीय शक्तियां सिर उठाने लगी थी। प्रधानमत्री डेसाले इस बगावत को संभाल नहीं पाए और उनकी छुट्टी हो गई। ‘टाइग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट’ के हाथ से प्रधानमंत्री पद निकल गया और वर्ष 2018 में डेसाले की जगह नए प्रधानमंत्री बनाए गए। अबी अहमद ‘टिग्रे और टाइग्रे’, ‘पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट’ इस
राजनीतिक बदलाव को बर्दाश्त नहीं कर पाया। अबी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही टिग्रे में फिर से नाराजगी शुरू हुई और यह नाराजगी अब गृह युद्ध में बदल चुकी है।

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