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दक्षिणपंथी जकड़ में जाता नीदरलैंड

यूरोप के उत्तर पश्चिम में स्थित देश नीदरलैंड (हॉलैंड) अपनी प्राकृतिक सौंदर्य और शांति प्रियता के लिए जाना जाता है। यहां की जनसंख्या का 55 प्रतिशत हिस्सा किसी भी धर्म को न मानने वालों का है। 34 प्रतिशत इसाई धर्म तो 5.2 प्रतिशत इस्लाम धर्म के अनुयायी हैं। अपने सामाजिक सद्भाव के लिए विख्यात नीदरलैंड में अब लेकिन धार्मिक उन्माद तेज हो चला है। 22 नवंबर को हुए चुनाव में कट्टर इस्लाम विरोधी पार्टी पीवीवी की बढ़त ने इन आशंकाओं को तेज करने का काम किया है कि इस दल के नेता गीर्ट वाइल्डर्स प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने इस्लाम विरोधी एजेंडे को जमकर परवान चढ़ाएंगे। नीदरलैंड के मुसलमानों में गीर्ट का इस कदर खौफ कायम है कि बहुत सारे नागरिक देश छोड़ने तक की बात करने लगे हैं

नीदरलैंड धर्मनिरपेक्ष और बहुसंस्कृति वाला देश है, लेकिन इस देश में धर्मनिर्पेक्षता और बहुसंस्कृति खतरे में दिखाई दे रही है। नीदरलैंड में ईसाई धर्म के बाद इस्लाम सबसे बड़ा धर्म है। नीदरलैंड की मुस्लिम आबादी समेत यूरोप के अन्य इस्लामिक देशों में भय, चिंता और तनाव का माहौल बना हुआ है। इसकी वजह अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नीदरलैंड में इस बार के आम चुनाव में पार्टी फॉर फ्रीडम (पार्टिज वूर डी व्रिजहीद, पीवीवी) की जीत है। पीवीवी पार्टी के संस्थापक ग्रीर्ट वाइल्डर्स नीदरलैंड के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं।

पीवीवी पार्टी को सबसे बड़ा मुस्लिम विरोधी दल माना जाता है। ऐसे में इस पार्टी के जीत के मायने नीदरलैंड में रह रही मुस्लिम आबादी के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। दक्षिण पंथी पीवीवी दल की जीत नीदरलैंड में कई तरह के आशंकाओं को बढ़ावा दे रही है। ग्रीर्ट वाइल्डर्स इस्लाम के प्रति अपनी गहरी नफरत के लिए कुख्यात हैं। अब सत्ता उनके हाथों में आने चलते मुस्लिम आबादी में डर बना हुआ है कि उनका धर्म खतरे में पड़ सकता है। इस विकसित देश में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की हालत पहले से ही खस्ता है तो अब एक ऐसे नेता का प्रधानमंत्री बन जाना जो इस्लाम विरोधी हो मुस्लिम आबादी के लिए विस्फोटक साबित हो सकता है।

ग्रीर्ट वाइल्डर्स के केवल विचार ही कट्टर नहीं हैं, बल्कि उनके द्वारा 2019 में मुसलमानों के खिलाफ कई ऐसे कानून बनाए गए थे जिसके चलते इस समुदाय में डर पैदा हो गया है। इस साल नीदरलैंड में सार्वजनिक तौर पर बुर्खा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। उस दौरान स्पष्ट कहा गया था कि स्कूल, अस्पताल, सरकारी दफ्तरों जैसी सार्वजनिक स्थानों पर कोई भी अपना चेहरा कवर नहीं करेगा। जिसके बाद से ही मुस्लिम लोगों की स्थिति और भी खराब हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अब नीदरलैंड की मुस्लिम महिलाएं आजादी से नहीं घूम पाती। उन्हें बसों में पढ़ने से केवल इसलिए रोका जाता है क्योंकि उन्होंने बुर्खा पहना होता है। ये महिलाएं अब सार्वजनिक स्थानों पर जाने से बचती हैं। या फिर ऐसे स्थानों पर नहीं जाती जहां ज्यादा सख्ती बरती जाती हो। जिससे स्पष्ट होता है कि इस देश की मुस्लिम महिलाओं ने अपनी आजादी खो दी है।

खौफ के साये में मुसलमान
मुस्लिम विरोधी पार्टी से पीएम बनने वाले वाइल्डर्स ग्रीर्ट के सत्ता में आ जाने के बाद मुस्लिम समुदाय को और भी संघर्ष करना पड़ सकता है। ग्रीर्ट वाइल्डर्स ने अपने हर चुनाव प्रचार में खुले तौर पर मुस्लिम आबादी और इस्लाम विरोधी नीतियों का प्रचार किया। उन्होंने कई बार इस्लाम विरोध में कुरान को प्रतिबंध करने जैसे विवादित बयान दिए हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने मुस्लिम आबादी को दोयम दर्जे का नागरिक कहा है। गीर्ट विल्डर्स का प्रधानमंत्री बनना इन दिनों सबसे अधिक चर्चा में इसलिए भी है क्यांेकि उन्होंने मुस्लिम समुदाय को सीधे प्रभावित करने वाले कई प्रस्ताव सामने रखे हैं। उन्होंने कहा है कि सरकार बनने के बाद वे नीदरलैंड में कुरान को प्रतिबंधित करने और मस्जिद को बंद कराने के लिए कदम उठाएंगे। इसके अतिरिक्त ग्रीर्ट ने उन मुसलमानों से देश छोड़ने के लिए कहा है, जो कुरान को देश के कानून/संविधान से ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं।

सोशल मीडिया पर इन दिनों इस्लाम को लेकर भारी दुष्प्रचार देखने को मिल रहा है वहीं हेट स्पीच का भी सामना करना पड़ रहा है। कुछ लोग उत्पीड़न से बचने के लिए नीदरलैंड छोड़ने जैसे विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। मुस्लिम संगठन ‘सीएमओ’(क्रिस्टल मुस्लिम ऑर्गनाइजेशन) के अनुसार वाइल्डर्स की जीत मुसलमानों के लिए चौंकाने वाली है। उन्होंने कहा, हमें उम्मीद नहीं थी कि कानून के शासन के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ बोलने वाले नेता की पार्टी सरकार बना लेगी। डच मोरक्को संगठन का नेतृत्व करने वाले हबीब अल कद्दौरी ने ‘गार्जियन’ को बताया कि ‘वाइल्डर्स मुसलमानों के बारे में अपने द्वेषपूर्ण विचारों के लिए जाने जाते हैं। हमें डर है कि वह हमें दूसरे दर्जे का नागरिक बना देंगे।’

वैश्विक चिंता का कारण बनते वाइल्डर्स

वाइल्डर्स के प्रधानमंत्री बनने से न केवल नीदरलैंड की मुस्लिम आबादी पर प्रभाव पड़ेगा बल्कि अन्य कई इस्लामिक देशों पर इसका असर देखने को मिल सकता है। पीवीवी पार्टी हमेशा से इस्लामिक देशों से आने वाले आप्रवासियों का
विरोध करती आई है। यह दल नीदरलैंड से मुस्लिमों को निकाले जाने को लेकर ‘डी-इस्लामीकरण’ की वकालत करता आया है। वाइल्डर्स की इस्लाम विरोधी बयानबाजी स्पष्ट रूप से पीवीवी के राजनीतिक अभियान का हिस्सा रही है। गौरतलब है कि नीदरलैंड में मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा अप्रवासी है जो कि इराक, ईरान, सोमालिया, सीरिया, अफगानिस्तान से आए हैं। मुस्लिम आबादी नीदरलैंड में प्रमुख रूप से चार शहरों राजधानी एम्स्टर्डम, रॉटरडैम, द हेग और यूट्रेक्ट में रहते हैं।
वाइल्डर्स के प्रधानमंत्री बनने से इस्लामिक देशों के साथ हो रहे उनके व्यापार नीतियों पर भी अंतर पड़ेगा। वाइल्डर्स इस्लाम और आप्रवासन पर अपने रुख के लिए दुनिया का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। जिससे वह नीदरलैंड और विदेशों में एक धु्रवीकरण करने वाले व्यक्ति बन गए हैं। उनके प्रधानमंत्री बन जाने से अप्रवासियों को वापस बुलाने की समस्या का सामना भी यूरोपीय इस्लामिक देशों को करना पड़ सकता है। उनकी जीत पूरे यूरोप में इसी तरह के इस्लाम विरोधी विचारों को बढ़ावा देती है, जो नीदरलैंड से परे मुसलमानों को प्रभावित कर सकती है। गौरतलब है कि इससे पहले भारत में पैगंबर मोहम्मद को लेकर हुई बयानबाजी में ग्रीर्ट ने भाजपा नेता नुपूर शर्मा का समर्थन किया था।

नीदरलैंड में मुसलमानों की स्थिति
नीदरलैंड विकसित और उदारवादी सोच रखने वाला देश है। इसी वजह से 2001 में समलैंगिक विवाह को मान्यता दी गई। जिससे मालूम होता है कि वहां के लोग खुले विचार और उदारवादी सोच रखते हैं। लेकिन नीदरलैंड के प्रधानमंत्री बनने जा रहे गीर्ट का मानना है कि इस्लाम धर्म न केवल आर्थिक बल्कि उदारवाद के भी खिलाफ है। वाइल्डर्स ने पार्टी फॉर फ्रीडम (पार्टिज वूर डी व्रिजहीद, पीवीवी) की शुरुआत 2006 से की थी। उनका एजेंडा इस्लाम विरोध रहा है। साल 2014 के मार्च में डच न्यूज वेबसाइट एनयू ़एनएल के साथ एक साक्षात्कार के दौरान, वाइल्डर्स ने दावा भी किया था कि उन्होंने राजनीति में प्रवेश केवल इस्लाम से लड़ने के लिए किया है। विवादित टिप्पणियों के कारण वाइल्डर्स को कानूनी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है। 2016 में नफरत फैलाने वाले भाषण के लिए उन्हें सजा मिली थी, लेकिन अपील में उन्हें अदालत से राहत मिली थी। इस्लाम और मुसलमान से संबंधित विवादित बयानों के चलते उन्हें अब तक सुरक्षा में रहना पड़ता है। तमाम रिपोर्ट्स और अध्ययन से पता चलता है कि नीदरलैंड में मुसलमानों की हालत ज्यादा अच्छी नहीं है। दैनिक ‘जनसत्ता’ की एक रिपोर्ट अनुसार साल 2022 में धर्म आधारित भेदभाव की वजह से प्रताड़ना झेलने वाले कुल 6738 मामले सामने आए हैं। बीते तीन सालों से नीदरलैंड में भेदभाव का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। जिसमें सबसे ज्यादा भेदभाव मुसलमानों से किया गया। साल 2022 में 93 फीसदी मामले ऐसे रहे जहां किसी मुसलमान को व्यवसायिक अथवा सार्वजनिक तौर पर भेदभाव का शिकार होना पड़ा।

नीदरलैंड में मुस्लिम महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं उन्हें शारीरिक से लेकर मौखिक प्रताड़ना तक का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा मस्जिदों में लगातार हमले किए जा रहे हैं। मुस्लिम लोगों को धमकी वाले मैसेजेस भेजे जा रहे हैं। साल 2021 में मुस्लिम के प्रति हेट स्पीच के 319 मामले सामने आए थे और इससे पहले 2020 में 39 मामले दर्द किए गए थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वाइल्डर्स ग्रीट के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही इस देश में मुसलमानों की हालत कुछ खास अच्छी नहीं थी। इनके प्रधानमंत्री बन जाने के बाद मुस्लिम आबादी की स्थिति और भी तेजी से बिगड़ सकती है। हालांकि वाइल्डर्स की पार्टी ‘पीवीवी’ के पास अकेले दम पर बहुमत नहीं है, उसे दूसरे सहयोगियों को साथ लेकर चलना पड़ेगा। ऐसे में उनका इस्लाम विरोधी एजेंडा किस हद तक लागू हो पाएगा, भविष्य के गर्भ में छिपा है।

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