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हागिया सोफिया में 87 साल बाद पढ़ी गई नमाज, जानिए क्या है इसका इतिहास

पूरी दुनिया में ईद हर्षो-उल्लास के साथ मनाई जाती है। तुर्की के इस्तांबुल में हागिया सोफिया मस्जिद में 87 साल बाद पहली बार नमाज अदा की गई। नमाज अदा करने के लिए करीब 5000 हजार लोग पहुंचे थे। मस्जिद आने वाले सभी को कोरोना के नियमों का पालन करना अनिवार्य है। इस्तांबुल में स्थित इस मस्जिद का यूनेस्को की विश्व धरोहर में स्थान है। हागिया सोफिया मस्जिद 1500 साल पुरानी है।

इस मस्जिद का अपना इतिहास है। हागिया सोफिया को लेकर आज भी अंतरराष्ट्रीय विवाद है। यह स्थान ईसाईयों और मुसलमानों के लिए बहुत पवित्र माना जाता है। कैथेड्रल का निर्माण सम्राट कॉन्सटेंटिन द्वारा 360 ईस्वी में पहली बार उस स्थान पर किया गया था जहां यह मस्जिद स्थित है। इसे 404 A.D में दंगों में जला दिया गया था।

लेकिन बाद में सम्राट थियोडोसियस ने 11 साल बाद इसे फिर से बनवाया। इसके बाद 532 ई. में कांस्टेंटिनपोल शहर में सम्राट जस्टिनियन की सत्ता के खिलाफ भयंकर दंगे हुए। यह मस्जिद बोस्फोरस नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है।

यह मस्जिद न केवल बीजान्टिन साम्राज्य का धार्मिक केंद्र था, बल्कि यह सत्ता का केंद्र भी था। सम्राट को पैट्रियार्क कहा जाता था। जो धार्मिक और राजनीतिक नेता हुआ करते थे। सम्राट को चुनौती देने वालों ने इसे जलाकर राख कर दिया। लेकिन जस्टियन ने 537 ईस्वी में हागिया सोफिया को बहाल कर दिया। 1453 में, जब ओटोमन साम्राज्य ने बीजान्टिन साम्राज्य को नष्ट कर दिया,फिर हागिया सोफिया एक मस्जिद बन गई। कॉन्स्टेंटाइन वह जगह है जहां आज इस्तांबुल है।

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1935 तक मस्जिद बनी रही। सत्ता कभी किसी की गुलाम नहीं रही, एक न एक दिन यह गिर ही जाती है। ओटोमन साम्राज्य के साथ भी ऐसा ही हुआ, सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला ओटोमन साम्राज्य प्रथम विश्व युद्ध में कमजोर होने के बाद ढह गया।

यहां आटोमन सम्राज्य हुआ करता था, वहाँ आज के सीरिया, इराक और लीबिया सहित अरब देशों मौजूद है। तुर्क साम्राज्य के पतन के बाद तुर्की धर्मनिरपेक्ष का जन्म हुआ। उस समय मुस्तफा कमाल अतातुर्क तुर्की के मुखिया बने थे। उसने मस्जिद के बारे में एक अलग तरह का फरमान दिया।

दुनिया में ऐसे कई धार्मिक स्थान हैं जहां एक तीर्थस्थल पर अन्य मंदिर स्थापित किए गए हैं। सेक्युलर मुस्तफा ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसे म्जूजिम में तब्दील कर दिया। इसे 1930 में बंद कर दिया गया था, लेकिन बाद में इसे 1935 में म्यूजियम में बदल दिया गया। तुर्की में रहने वाले अल्पसंख्यक ग्रीक ऑर्थोडॉक्स आबादी द्वारा भी इसका स्वागत किया गया, क्योंकि इस चर्च के मूल कस्टोडियन एकमात्र जीवित यूनानी थे। लेकिन अब अर्दुआन ने उस इतिहास को उलट दिया है।

तुर्की के वर्तमान राष्ट्रपति तैय्यप एर्दोगन ने 10 जुलाई 2020 को एक ऐसा फैसला सुनाया जिसकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निंदा हुई। एर्दोगन ने घोषणा की कि हागिया सोफिया, जिसे पहले संग्रहालय के रूप में जाना जाता था, उसे अब से नमाज के लिए खोला जाएगा। राष्ट्रपति के फैसले से एक घंटे पहले तुर्की के सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि यह एक संग्रहालय नहीं बल्कि एक मस्जिद है।

इस फैसले पर यूनेस्को ने कहा कि 1500 साल पुरानी इमारत यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल में शामिल है, इसलिए इसमें किसी भी तरह के बदलाव से पहले तुर्की को इसकी जानकारी देनी चाहिए थी। ग्रीस के संस्कृति मंत्रालय ने अदालत के फैसले को खुले तौर पर उत्तेजक कहा है। चर्च ने कहा कि यह निर्णय और अधिक विभाजित होगा, जो एक शर्म की बात है।

पोप फ्रांसिस ने भी इसका कड़ा विरोध किया। एर्दोआ का मानना ​​है कि उन्होंने मुस्लिम वोटों के पक्ष में करने के लिए ऐसा किया है। लेकिन सत्ता से प्यार किसे नहीं होता, सत्ता परिवर्तन के साथ ही हागिया सोफिया की लेकर विवाद खड़ा हो जाता है।

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