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जम्हूरियत का जश्न

भारत से अलग होकर स्वतंत्रत देश बनने के बाद से पाकिस्तान में जनतंत्र अक्सर ही लड़खड़ता रहा है। वहां के जम्हुरियत को लंबे वक्त तक फौजी शासन की बूटों ने रौंदा है। एक बार फिर वहां जम्हुरियत की फिजा बन रही है। आगामी 25 जुलाई को होने वाले आम चुनाव में सियासी दल अपनी तमाम ताकत झोंक रहे हैं। भारत के कश्मीर में भले ही पाकिस्तान पर हम आतंकवाद को शह देने का आरोप लगाए। इस बार वहां हो रहे आम चुनाव में वहां की तमाम सियासी पार्टियों में अपने-अपने घोषणा पत्र में वादा किया है कि सत्ता में आने पर वे आतंकवाद और कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ेंगे। इन दो मसलों ने पाकिस्तान का दुनिया में अलग-थलग कर काफी कमजोर किया है।

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ, ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ और ‘पाकिस्तान मुस्लिम लीग’ नवाज ने अपनी-अपनी चुनावी घोषणा पत्र में आतंकवाद, कट्टरवाद और चरमपंथी को देश के लिए अभिशाप बताया। इतना ही नहीं उन्होंने मुस्लिम बहुल इस देश में हजारों मदरसों में शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने का भी वादा किया। पूर्व क्रिकेटर और अब पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ प्रमुख इमरान खान ने कहा कि आतंकवाद से न सिर्फ पाकिस्तानी नागरिकों की बड़ी तादात में जान जा रही है। अलबत्ता समाज भी दहशत और नफरत में तब्दील हो रहा है। अपदस्थ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग का भी कहना है- ‘पार्टी सबकी परस्पर सहमति वाली एक सिस्टम के मार्फत मदरसों का उपयुक्त पंजीकरण सुनिश्चित करेगी।’ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का भी कहना है- ‘आतंकवाद के खिलाफ इसकी कुर्बानियों के बावजूद पाकिस्तान वैश्विक समुदाय में सबसे कट कर अलग-थलग पड़ गया है।’

इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान में जम्हूरियत को वहां की सेना ने सबसे ज्यादा लहूलुहान किया है। वहां लंबे समय तक सेना का शासन रहा है। लेकिन इस बार पाक की सेना का मन-मिजाज थोड़ा बदला हुआ सा लग रहा है। उसकी तरफ से बयान आया है कि देश की चुनाव प्रक्रिया में उसकी कोई सीधी भूमिका नहीं होगी। देश में 25 जुलाई को होने वाले चुनाव के स्वतंत्र और निष्पक्ष आयोजन के वास्ते 3 ़71 लाख सैनिक मतदान केंद्रों पर तैनात रहेंगे। असल में सेना पर ऐसे आरोप लग रहे थे कि वह मीडिया और सरकार पर चुनाव में हेरफेर करने का दबाव बना रही है। इस आरोप के मुद्देनजर ही सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने कहा-‘सशस्त्र बल चुनाव के आयोजन में सीधे तौर पर शामिल नहीं है।’ गफूर यह जरूर साफ किया कि सशस्त्र बल केवल पाकिस्तान चुनाव आयोग की मदद करेगा। कारण कि आयोग ने सेना की मदद मांगी है। इन चुनावों में तकरीबन दस करोड़ 5 लाख लोग अपने मदातन का इस्तेमाल करेंगे। इनमें लगभग 5 करोड़ 92 लाख पुरुष और 4 करोड़ 67 लाख महिलाएं हांगी।

यह चुनाव नवाज शरीफ के बगैर हो रहा है। नवाज शरीफ को अदालत ने पहले ही भ्रष्टाचार का दोषी पाया था। उन्हें प्रधानमंत्री के पद से हटना पड़ा था। अदालत ने नवाज शरीफ, उनकी बेटी मरियम नवाज और दामाद कैप्टन सफदर को आय से अधिक संपत्ति जमा करने का दोषी पाया। असल में शरीफ परिवार के नाम पर लंदन में स्वेनफील्ड अपार्टमेंट है। इसी मामले में उन पर मुकदमा चल रहा है। मरियम नवाज 13 जुलाई को पिता-नवाज शरीफ के साथ लाहौर पहुंच रही है। तब शायद वहां चुनावी माहौल परवान चढ़े। अमूमन पाक के चुनाव में भारत विरोध एक अहम चुनावी मुद्दा रहा है। हर दल भारत का विरोध कर वहां के लोगों की भावनाएं भड़काती है। यह काम पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने भी किया। इस बार के चुनाव में भारत विरोध का मुद्दा बनता है या नहीं, यह देखना होगा।

चुनाव पूर्व हुए कुछ सर्वे की मानें तो मुख्य मुकाबला पीएमएल(एन) और पीपीपी के बीच है। पिछले अप्रैल-जून के दरम्यान कराए गए सर्वेक्षण मे पंजाब में पीएमएल(एन) की स्थिति मजबूत है। यहां का 51 प्रतिशत वोट इस पार्टी के पक्ष में बताया जा रहा है। पीपीपी ने यहां भी अपना आधार मजबूत किया है। वर्ष 2013 में पीपीपी को महज 19 फीसदी वोट मिले थे। अब 30 प्रतिशत तक पहुंच गया है। कुछ भी हो पाकिस्तान में चुनाव को जम्हुरियत के जश्न के रूप में ही देखा जाता रहा है। देखना यह है कि जंग की शक्ल में होने वाले जश्न में जीत किसके नसीब होता है। कौन शहंशाह बनता है।

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