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ट्रूडो की यूक्रेन यात्रा के मायने

रूस और यूक्रेन की लड़ाई खत्‍म होने का नाम नहीं ले रही है। बल्कि बढ़ती ही जा रही है। इस बीच कनाडा ने यूक्रेन के लिए अपने समर्थन का स्तर और बढ़ाने की घोषणा की है। कनाडा के पीएम का यूक्रेन को यह समर्थन सिर्फ जुबानी न रहे इसलिए इसे अमली जामा पहनाने के लिए वे खुद यूक्रेन पहुंचे। इस दौरे पर उनके साथ उप-प्रधानमंत्री क्रिस्टिया फ्रीलैंड और विदेश मंत्री मेलानी जोली भी थे। युद्ध के समय में ऐसे दौरे पूर्व प्रचारित नहीं किए जाते हैं इसलिए इन्हें औचक दौरा कहते हैं। रूसी हमलों से जूझ रही यूक्रेन की राजधानी कीव के पास इरपिन इलाके का भी दौरा भी किया, जिसे रूसी फौजों के हमले ने इस इलाके को पूरी तरह से तबाह कर दिया था। लेकिन इस बीच कनाडा ने जो महत्वपूर्ण बातें और घोषणाएं की है वो यूक्रेन के लिए बेहद अहम है। हाल ही में कनाडा के पीएम द्वारा यूक्रेन को 40 करोड़ डॉलर का कर्ज देने का एलान किया गया था। साथ ही यूक्रेन को कनाडा की ओर से 30 किलोमीटर तक मार करने वाली एम-777 तोपों की खेप दी गई। कनाडा की अचानक बढ़ी इस सक्रियता को दो तरह से देखा जा रहा है। एक तो पिछले दिनों यह खबर रूसी मीडिया पर दिखाई दी थी कि रूस की सेना ने यूक्रेन से कनाडा की फौज के एक पूर्व अफसर लेफ्टिनेंट जनरल ट्रेवर केडू को गिरफ्तार कर लिया है। ट्रेवर केडू को कुछ विवादों के चलते पिछले महीने कनाडा की फौज से रिटायरमेंट लेना पड़ा, वरना वह कनाडा के सेनाध्यक्ष बनने की दौड़ में सबसे आगे थे। उनकी गिरफ्तारी का सच अभी पूरी तरह से पता नहीं चला है, लेकिन अचानक ही जिस तरह से कनाडा सक्रिय हुआ है, वह इस खबर के सच होने की ओर ही इशारा करता है। एक दूसरा कारण भी बताया जा रहा है, जो ज्यादा महत्वपूर्ण है। रूस जैसे महाबली देश से लड़ने के लिए जितने हथियार चाहिए, उतने यूक्रेन के पास नहीं हैं। पिछले कुछ दिनों से यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की अपने देश को लगातार आश्वस्त कर रहे हैं कि हथियारों की कोई कमी नहीं है और वे मित्र राष्ट्रों से जल्द ही वहां पहंुच जाएंगे। लेकिन मामला इतना आसान नहीं है। पिछले सप्ताह छपी कई रिपोर्ट से पता चलता है कि जितने हथियारों की जरूरत यूक्रेन को है, उतनी आपूर्ति अमेरिका नहीं कर पा रहा है। उसकी फैक्टरियों के गोदामों में रखे हथियार तो यूक्रेन पहुंच चुके हैं, लेकिन नए उत्पादन में समय लग सकता है। पिछले दो साल में महामारी के कारण इन फैक्टरियों ने उत्पादन की रफ्तार धीमी कर दी थी। अब अमेरिका ने नाटो के सहयोगियों को आपूर्ति की जिम्मेदारी सौंपी है। पश्चिमी यूरोप के कुछ देशों के बाद अब कनाडा को भी यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। मगर इसके साथ ही यह सब जो हो रहा है, वह एक और कहानी भी कहता है। इस जंग में यूक्रेन को रूस के आगे घुटने न टेकने पड़ें, इसकी कोशिश में तो कई देश दिखाई दे रहे हैं, लेकिन बम धमाकों के बीच युद्ध की आग को खत्म करने की जो कोशिशें होनी चाहिए, वे कहीं दिखाई नहीं दे रही हैं। जहां युद्ध का पागलपन हो, वहां शांति की जो जिद्द टिमटिमानी चाहिए, वह कहीं नजर नहीं आ रही। कनाडा के प्रधानमंत्री की यूक्रेन यात्रा और तमाम घोषणाएं यही बताती हैं कि फिलहाल दुनिया के तमाम बड़े देश शांति के लिए पसीना बहाने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। युद्ध में नए-नए देशों का कूदना दुनिया को किस खतरे की ओर ले जा रहा है, यह जरूर सोचना चाहिए।  

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