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बहुरे दिन शरीफ के हाशिए पर इमरान

पड़ोसी देश पकिस्तान में आठ फरवरी को होने जा रहे आम चुनाव की चर्चा जोरों पर है। सैन्य शासन और तानाशाही के इतिहास से देखा जाए तो देश के लिए यह बड़ी उपलब्धि है, हालांकि यह आम चुनाव कथित तौर पर सैन्य हस्तक्षेप से हो रहा है। यह चुनावी मुकाबला नवाज शरीफ की पार्टी ‘पाकिस्तान मुस्लिम लीग और इमरान खान की ‘तहरीक-ए-इंसाफ’ पार्टी के बीच है। लेकिन चुनावी खेल से पहले ही एक ओर जहां नवाज शरीफ सेना की सहायता से इमरान खान को क्लीन बोल्ड करते नजर आ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ इमरान खान जेल में बंद हैं। ऐसे में इमरान दिनोंदिन हाशिए पर चले जा रहे हैं तो नवाज के दिन बहुरने लगे हैं।

कहा जा रहा है कि साल 2018 के दौरान पाकिस्तानी राजनीति की जो प्रक्रिया रही वही प्रक्रिया पुनः दोहराई जा रही है। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को सत्ता से बाहर कर दिया गया था ,और सेना के समर्थन से इमरान खान ने नवाज शरीफ की जगह ली थी लेकिन इस बार मामला विपरीत हो गया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पूर्व प्रधानमंत्री नवाज सत्ता संभालेंगे या फिर इमरान खान के बिना उनकी पार्टी सत्ता के शीर्ष तक पहुंच पाएगी? या बिलावल भुट्टो जरदारी के नेतृत्व वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के हाथ लगेगी हुकूमत ? अगर पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पीटीआई की बात करें तो उसके लगभग 76 फीसदी ही उम्मीदवारों के नामांकन स्वीकार किए गए हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि एक बार फिर नवाज सत्ता संभालेंगे।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरह चुनाव आयोग ने पीटीआई के कुल 843 उम्मीदवारों में से 598 उम्मीदवारों के नामांकन स्वीकार किए हैं और उससे अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को एक के बाद एक मामले में सजा सुनाई जा रही है उससे उनकी मुश्किलें बढ़ रही हैं वहीं पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का चुनाव में भाग लेने का रास्ता साफ होते ही उनकी रह आसान होती जा रही है । गौरतलब है कि साल 2018 के दौरान पाकिस्तानी राजनीति की जो प्रक्रिया रही वही प्रक्रिया पुनः दोहराई जा रही है। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को सत्ता से बाहर कर दिया गया था ,और सेना के समर्थन से इमरान खान ने नवाज शरीफ की जगह ली थी लेकिन इस बार मामला विपरीत है।

एक के बाद एक मिली सजा


बीते 30 जनवरी को राज्य के रहस्यों को लीक करने के लिए इमरान खान और उनकी पार्टी के उपाध्यक्ष शाह महमूद कुरेशी को 10 -10 साल की सजा मिली। जिसे साइफर मामले के नाम से भी जाना जाता है। साइफर का अर्थ है सीक्रेट कीवर्ड में लिखा कोई संदेश। दो देशों के मध्य इस तरह के राजनयिक संचार होते रहते हैं, हालांकि इन्हें पूरी तरह से गुप्त और प्रतिबंधित रखा जाता है। यानी इसे लीक करना या फिर कॉपी करना पूरी तरह से गैरकानूनी होता है। लेकिन इमरान खान राजनयिक संचार की गोपनीयता को बरकरार नहीं रख सके। इसलिए इमरान खान को देश की गोपनीयता भंग करने का दोषी माना गया है। दरअसल, इमरान खान जनसभाओं में एक पर्ची दिखाकर ये बताते रहे कि अमेरिका में पाकिस्तान के तत्कालीन राजदूत असद ने उन्‍हें सूचना दी है, भेजी गई सूचना इसी पर्ची में है, उन्‍होंने जनसभाओं में पर्ची लहराते हुए आरोप लगाया था कि उनकी सरकार को गिराने की साजिश रची गई। ये साजिश उनके राजनीतिक विरोधियों और पाकिस्तान की सेना ने अमेरिका के साथ मिलकर रची है।

साइफर मामले में सजा मिलने के बाद इमरान खान को 31 जनवरी को भ्रष्टाचार के मामले में 14 साल की सजा मिली, जिसे तोशाखाना केस के रूप में जाना जाता है। गौरतलब है कि नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के तहत बनी गठबंधन सरकार ने साल 2022 में इमरान खान पर आरोप लगाते हुए मामला दर्ज करवाया था कि इमरान खान द्वारा तोशखाना को दिए गए उपहारों की किसी जानकारी का खुलासा नहीं किया गया है। इसी दौरान उनपर यह भी आरोप लगाया गया था कि उन्होंने उपहारों की अवैध बिक्री की है । साल 2018 के दौरान इमरान खान ने अन्य देशों से प्राप्त उपहारों का खुलासा करने के संबंध में प्रतिरोध दिखाया। खान ने कहा इससे विदेशी संबंधों पर गंभीर असर पड़ सकता है। सत्ता में रहते हुए इमरान खान ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर चार उपहारों को बेचने की बात को स्वीकार की थी, साथ ही उन्होंने दावा किया था कि सरकार को कीमत का एक प्रतिशत भुगतान करके उपहारों को खरीदा है।

8 फरवरी को होने वाले चुनाव से ठीक एक हफ्ते पहले न्यायालय द्वारा इमरान खान को सजा दी गई। दावा किया जा रहा है कि इमरान खान को आम चुनाव से पहले एक के बाद एक सजा इसलिए भी सुनाई जा रही है क्योंकि खान का देश के सबसे शक्तिशली इंसान आर्मी चीफ मुनीर से विवाद गहरा गया है। इमरान खान के खिलाफ सुनाए गए फैसले से खान और उनकी पार्टी पर कितना प्रभाव पड़ेगा यह कहना मुश्किल है। निष्पक्ष चुनाव की ज्यादा उम्मीद नहीं है क्योंकि सेना ही देश को नियंत्रित करती है और तय करती है कि कौन शासन करेगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब इमरान खान जनता के बीच बहुत लोकप्रिय होने लगे ,लगातार उपचुनाव और विधानसभा चुनाव जीतते रहे, उन्होंने सेना को चुनौती देना शुरू कर दिया। इसके बाद सत्ता परिवर्तन पाकिस्तानी सेना के लिए चिंता का विषय बन गया। जिससे सेना ने नवाज शरीफ को चुनावी मैदान में उतारना जरूरी समझा।

इमरान खान पाकिस्तान के लोकप्रिय नेता हैं । लेकिन लगातार दो मामलों में सजा मिलने के बाद उनके लिए चुनाव लड़ने के रास्ते बंद हो गए हैं। हालांकि इमरान खान के पास ऊपरी अदालत में इस फैसले को चुनौती देने रास्ता बचा है, लेकिन सेना के साथ चल रहे उनके खराब संबंधों को एक वजह माना जा सकता है कि ऊपरी अदालत में उन्हें राहत मिलना मुश्किल है। आम चुनाव से पहले इमरान खान की पार्टी ष्पीटीआईष् का चुनाव चिन्ह क्रिकेट ष्बैटष् चुनाव आयोग ष्ईसीपीष् द्वारा रद्द कर दिया गया। गौरतलब है कि साल 2018 में इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे, फिर अप्रैल 2022 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिये उन्हें सत्ता से हटा दिया गया था। वर्तमान काल में खान अपने ऊपर लगे आरोपों को श्राजनीतिक प्रतिशोधश् और श्षड्यंत्रश् बता रहे हैं।

इमरान ख़ान के सत्ता में आने और जाने की कहानी दोनों सेना से जुड़ी है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हाल के वर्षों में इमरान खान की लोकप्रियता कम हुई है। वहीं नवाज शरीफ की लोकप्रियता करीब पिछले 6 महीने से बढ़ी है। गौरतलब है कि साल 2018 में हो रहे चुनाव के दौरान नवाज शरीफ उम्मीदवार नहीं थे ,वे जेल में थे। उन्हें करोड़ो रूपये के भ्रष्टाचार का दोषी माना गया था, इस वजह से वे चुनाव नहीं लड़ सकते थे। तबीयत बिगड़ने के बाद 2019 में वो इलाज के लिए लंदन गए और फिर वहीं रहने लगे। पिछले साल ही पाकिस्तान में उनकी वापिसी हुई है। दरअसल नवाज शरीफ की जब से स्वदेश वापिसी हुई है तब से पाकिस्तान में चर्चा के केंद्र में रहे हैं। नवाज शरीफ के दिन कुछ इस तरह से फिरे कि 2024 के चुनाव से कुछ माह पहले ही नवाज शरीफ को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया, यही नहीं उनके चुनाव लड़ने पर लगी आजीवन रोक भी असंवैधानिक करार दिया गया। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि पाकिस्तानी सेना और इमरान ख़ान के बीच बढ़ी दूरी ने नवाज़ शरीफ़ के लिए रास्ते तैयार किए हैं और वो चौथी बार प्रधानमंत्री बनने की रेस में आ गए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नवाज शरीफ को सुरक्षित रास्ता दे दिया जाना , उनकी सजा रद्द होना और सेना के समर्थन से उनका वतन वापिसी होना इसी ओर संकेत करते हैं कि पाकिस्तानी सेना ने पूर्व पीएम नवाज शरीफ के साथ रिश्ते सुधार लिए हैं। ऐसे में पूरी संभवना जताई जा रही है कि नवाज शरीफ एक बार फिर पाकिस्तान का तख़्त हांसिल कर सकते हैं। सेना द्वारा नवाज शरीफ के लिए सियासी रास्ता यह भी स्पष्ट करता है कि सेना समेत विपक्षी दल क्रिकेटर से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने इमरान खान के अस्तित्व को राजनीति से मिटा देना चाहते है। इमरान खान का सेना प्रमुख असीम मुनीर और इमरान खान के बीच भी मनमुटाव चल रहा है। दरअसल खान द्वारा असीम मुनीर को इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस के प्रमुख पद से हटा दिया था, तब से मुनीर यह साबित करने पर तुले हैं कि इमरान खान खेल में जीरो हैं। हालांकि पाकिस्तानी सेना कभी भी पाला बदल सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नवाज शरीफ को यह नहीं भूलना चाहिए कि सेना और शरीफ के बीच उनके तीसरे कार्यकाल (2013) से ही ख़ूब तनातनी रही और बाद में शरीफ़ सत्ता से बाहर भी हुए।

पूरा कार्यकाल नहीं कर पाती हैं सरकारें


पाकिस्तान में सत्तारूढ़ सरकारों के कार्यकाल पूरा नहीं कर पाने का इतिहास है। पाकिस्तान के इतिहास में सिर्फ 37 साल ही लोकतांत्रिक सरकारें रहीं, जिनमें कुल 22 प्रधानमंत्री हुए, लेकिन इन 22 में से कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया, पाकिस्तान में अब तक 32 साल सेना ने सीधे तौर पर शासन किया है और लगभग आठ सालों तक यहां की अवाम ने राष्ट्रपति शासन देखा है। ऐसे में सवाल है कि इस बार जो सरकार चुनकर बनेगी क्या वह अपना कार्यकाल पूरा कर पायेगी ? पकिस्तान के जानकारों की मानें तो सरकारों के कार्यकाल पूरा नहीं कर पाने के पीछे कई कारण हैं। इनमें सबसे बड़ा कारण है कि पाकिस्तान की राजनीति में सेना का दखल और पाकिस्तान की जनता का सरकारी संस्थानों पर विश्वास नहीं होना।

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