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श्रीलंका की राह पर कई देश

  • प्रियंका यादव, प्रशिक्षु

काफी समय से राजनीतिक उथल-पुथल और भारी आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे देश छोड़ गए हैं। विदेशी कर्ज में फंसा श्रीलंका अब दिवालिया होने की कगार पर है। श्रीलंका जैसे हालात पहले भी कई देशों में बन चुके हैं और कई देश उसकी राह पर हैं

 

पिछले दो सालों से भी अधिक समय से पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जंग लड़ रही है। इस महामारी के चलते पूरा विश्व आर्थिक संकट से उभरा भी नहीं कि रूस-यूक्रेन युद्ध ने इस संकट में और इजाफा कर डाला है। हालत यह है कि कई देशों में भुखमरी जैसे हालात पैदा हो गए हैं। यही कारण है कि काफी समय से राजनीतिक उथल-पुथल और भारी आर्थिक संकट से जूझ रहे पड़ोसी देश श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे देश छोड़कर भाग गए हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने मालदीप में शरण ली है। इस संकट की घड़ी में देश को अकेला छोड़कर भागने की वजह से जनता राजपक्षे पर बुरी तरह भड़की हुई है। पूरे श्रीलंका में लोग सड़कों पर उतर आए हैं और सरकारी संपत्ति को आग लगा रहे हैं। लोगों के हिंसक विरोध को देखते हुए प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने देश में इमरजेंसी लगा दी है। गलत आर्थिक फैसलों, सस्ते ब्याज, मुफ्त की स्कीमों और 51 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज में फंसा श्रीलंका अब दिवालिया होने की कगार पर है। श्रीलंका जैसे हालात पहले भी कई देशों में बन चुके हैं और कई देश श्रीलंका की राह पर हैं।


श्रीलंका : श्रीलंका को अपना 7 करोड़ 80 लाख डॉलर चुकाने के लिए 30 दिनों की मोहलत मिली हुई थी। जिसकी अवधि बीते 18 मई को समाप्त हो गई और कर्जा न चुका पाने के कारण प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने देश को दिवालिया घोषित कर दिया था। गौरतलब है कि किसी भी देश का दिवालिया होना उसकी मुद्रा और अर्थव्यवस्था के लिए बेहद नुकसानदायक है। दिवालिया होने के बाद उस देश का किसी अन्य देश या अंतरराष्ट्रीय बाजार से पैसा लेना मुश्किल हो जाता है और ऐसी अवस्था देश की छवि को भी गहरा नुकसान पहुंचाती है। किसी भी देश को दिवालिया उस स्थिति में घोषित किया जाता है जब वह किसी अन्य देश या फिर अंतरराष्ट्रीय संगठनों से लिया हुआ पैसा या फिर उसकी किस्त को समय पर नहीं चुका पाता है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक श्रीलंका पर जितना कर्ज है, उसमें 47 फीसदी कर्ज तो बाजार से लिया गया है। इसके अलावा 15 फीसदी कर्ज चीन का, एशियन डेवलेपमेंट बैंक से 13 फीसदी, वर्ल्ड बैंक से 10 फीसदी, जापान से 10 फीसदी भारत से 2 फीसदी और अन्य जगहों का कर्ज 3 फीसदी है।


नेपाल : एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2022 के मध्य में नेपाल का विदेशी मुद्रा भंडार महज 975 करोड़ डॉलर रह गया है जबकि जुलाई 2021 में यह 1175 करोड़ डॉलर था। करीब कुछ ही महीनों में विदेशी मुद्रा भंडार में करीब 200 करोड़ डॉलर यानी 24 हजार करोड़ नेपाली रुपए कम हो गए हैं। पाकिस्तान : पाकिस्तान पर विदेशी कर्ज तेजी से बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2021-22 की पहली तिमाही में पाकिस्तान का विदेशी कर्ज पहले के मुकाबले बढ़कर 10.886 अरब डॉलर का हो गया है। जबकि 2021 के वित्त वर्ष में यह विदेशी कर्ज 13.38 अरब डॉलर था। वहीं अगर 2022 की पहली तिमाही में यह 1.653 अरब डॉलर है। जबकि 2020-21 की पहली तिमाही में यह कर्ज 3.51 अरब डॉलर का था। 2022 की दूसरी तिमाही में पाकिस्तान का कर्ज बढ़कर 4.357 अरब डॉलर हो गया था। वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में यह कर्ज बढ़ कर 4.875 अरब डॉलर हो गया।


अफगानिस्तान : तालिबानियों के नियंत्रण वाले अफगानिस्तान भी भारी आर्थिक संकट से जूझ रहा है। तालिबानियों के नियंत्रण के बाद से ही देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। भुखमरी के हालात उत्पन्न हो गए हैं। लोगों का हाल बेहाल हो गया। वे जीवन जीने के लिए बुनियादी चीजों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अमेरिका समेत दुनिया भर के अधिकतर देशों ने उस पर प्रतिबंध लगाए हुए हैं। जिसके कारण उसे व्यापक स्तर पर सहायता नहीं मिल पा रही है और न ही उसे विदेशी मुद्रा मिल रही है। प्रतिबंधों की वजह से वहां के बैंकिंग सिस्टम ठप हैं। अमेरिका ने अफगानिस्तान की 7 बिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा भी फ्रीज की हुई है। वहां के लाखों लोग खाने-पीने की कमी का सामना कर रहे हैं। सरकारी कर्मचारियों को वेतन तक नहीं मिल पा रहा।
मिस्र : यह देश भी आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा है। इसकी मुद्रास्फीति दर 15 फीसदी से अधिक हो गई है। मिस्र सेंट्रल बैंक ने इस पर नियंत्रण करने के लिए ब्याज दरें बढ़ा दी हैं। खर्च को रोकने के लिए देश की मुद्रा का बार-बार अवमूल्यन किया जा रहा है। इसकी वजह से देश विदेशी कर्ज चुकाने में सक्षम नहीं हो पा रहा है। देश में ईंधन पानी सहित बिजली पर मिलने वाली सब्सिडी पर कटौती की गई है। मिस्र का विदेशी भंडार भी खाली हो गया है। बढ़ती महंगाई की वजह से वहां के नागरिकों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। गरीबी का स्तर और भी बढ़ रहा है। हालांकि सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात ने 22 अरब डालर देकर मिस्र की मदद की है।


लाओस : लाओस की स्थिति भी श्रीलंका जैसी होती नजर आ रही है। लाओस की सरकार कर्जदाताओं से बिलियन डॉलर्स कर्ज चुकाने की बात कर रही है। इस देश के लिए भी आर्थिक हालात कठिन हो गए हैं। लाओस अपने विदेशी मुद्रा भंडार से ज्यादा से ज्यादा 2 महीनों तक विदेशों से मिलने वाली बुनियादी चीजों का आयात कर सकेगा। लाओस की मुद्रा में 30 फीसदी गिरावट दर्ज की गई है।


लेबनान : लेबनान में लोग आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। देश में मुद्रा का अवमूल्यन जारी है। आधारभूत वस्तुओं की कमी सहित ईंधन की कमी बढ़ रही है। जिसके कारण लेबनान अंधेरे से घिरा हैं ईंधन की कमी की वजह से बीते वर्ष देश में कुछ व्यापार बंद कर दिए गए थे। इसकी मुख्य वजह 15 साल चले गृह युद्ध और आतंकी हमलों को बताया जा रहा है। देश की स्थिति सुधारने में सरकार नाकाम हो रही है। भारी-भरकम करों के थोपे जाने से सरकार को जनता के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है। 2019 में देश पर 90 बिलियन का कर्ज था। इस कर्ज को लेकर सरकार ने माना कि लेबनान के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि वह अंतरराष्ट्रीय कर्ज नहीं चुका पाया। बीते वर्ष 2021 में लेबनानी मुद्रा की कीमत 90 फीसदी कम हो गई। विश्व बैंक के अनुसार बीते 150 सालों से लेबनान का संकट जारी है।


वेनेजुएला : वर्ष 2017 में वेनेजुएला में आए आर्थिक संकट ने देश को दिवालिया घोषित करवा दिया था। गलत आर्थिक नीतियों और जरूरत से ज्यादा विदेशी कर्ज लेने की वजह से वेनेजुएला की मुद्रा बेहद नीचे गिर गई थी। वेनेजुएला में करेंसी की वैल्यू इतनी ज्यादा गिर गई थी कि एक कप चाय या कॉफी की कीमत भी 25 लाख हो गई थी। वेनेजुएला की करेंसी में आई गिरावट की वजह से लोगों को दूध-आटा जैसे खाने-पीने की चीजों के लिए भी बोरे में भर-भरकर नोट देने पड़ते थे। वेनेजुएला के कुल निर्यात में 96 फीसदी हिस्सेदारी अकेले तेल की है।


अमेरिका-यूरोप के प्रतिबंधों के चलते जब तमाम देशों ने उससे तेल लेना बंद कर दिया तो उसकी इकोनॉमी एकदम बैठ गई।
अर्जेंटीना : अर्जेंटीना की भी आर्थिक हालत काफी खराब चल रही है। यहां हर 10 में से 4 नागरिक गरीब हैं। साल 2000 से लेकर 2020 तक दो बार वह डिफॉल्टर हो चुका है। इस दौरान उसके लिए विदेशों का कर्ज उतारना मुश्किल हो गया था। यहां की करेंसी अब कमजोर पड़ती जा रही हैं साथ ही विदेशी मुद्रा कोष खाली होता जा रहा हैं। अर्जेंटीना में इस वर्ष महंगाई दर 70 फीसदी बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा हैं। अर्जेंटीना की इकोनॉमी में इन्वेस्ट करने वाले विदेशी निवेशको ने बॉन्ड के
1.3 बिलियन डालर सरकार से वापस मांग लिए थे। बैंकों और दूसरे फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस ने इस कर्ज को लौटाने से साफ मना कर दिया। अर्जेंटीना में बढ़ती महंगाई ने लोगों का जीना दुश्वार कर दिया था।


जिम्बाब्वे : जिम्बाब्वे उन देशों में शामिल है, जहां हाइपर इन्फ्लेशन का सामना करना पड़ा था। 2008 में जब दुनिया मंदी के दौर से गुजर रही थी तो जिम्बाब्वे में हालात बेहद ज्यादा खराब हो गए थे। वहां महंगाई इस कदर बढ़ गई थी कि रिजर्व बैंक ऑफ जिम्बाब्वे को 100 लाख करोड़ डॉलर का नोट जारी करना पड़ा था। जिम्बाब्वे का विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो गया था और उसकी करेंसी जिम्बाब्वीयन डॉलर की वैल्यू रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गई थी। जिम्बाब्वे की मुद्रा इतनी कमजोर हो गई थी कि ब्लैक मार्केट में ब्रेड का एक टुकड़ा भी 1000 करोड़ जिम्बाब्वीयन डॉलर में मिलने लगा था।


आइसलैंड : आइसलैंड में भी कभी श्रीलंका जैसे हालात बन गए थे। आइसलैंड के तीन बैंकों ने 85 बिलियन डॉलर का विदेशी कर्ज लिया था, लेकिन वे इसे चुका नहीं पाए। बैंकों ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया, जिसका असर देश की इकोनॉमी पर पड़ा। लोगों की नौकरियां चली गई, लोग अपना कर्ज नहीं चुका पा रहे थे। दूसरी ओर बाजार में महंगाई बढ़ने से लोगों की जमा पूंजी भी खत्म होने लगी। इस आर्थिक संकट की प्रमुख वजह आइसलैंड में प्राइवेट बैंकों द्वारा बिना गारंटी और आसान शर्तों पर अंधाधुंध कर्ज देना था।

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