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म्यांमार बना अफीम का सबसे बड़ा स्रोत

पड़ोसी देश म्यांमार इस समय गृह युद्ध से जूझ रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि म्यांमार का विघटन हो सकता है। म्‍यांमार की सेना और व‍िद्रोहियों की यह लड़ाई अब भारतीय सीमा पर हो रही है जिससे पूर्वोत्‍तर भारत की परेशानियां बढ़ गई है। इसी बीच संयुक्त राष्ट्र ने अपने एक सर्वेक्षण में पाया है कि म्यांमार में अफीम उत्पादन में तेजी से वृद्धि पाई गई है। इस वजह से अन्य देशों के मुकाबले म्यांमार अफीम को लेकर एक बड़ा स्रोत बन गया गया है।

 

संयुक्त राष्ट्र की मादक पदार्थ व अपराध नियंत्रण पर केन्द्रित एजेंसी ( यूएनओडीसी ) ने दक्षिण-पूर्व क्षेत्र पर जारी अफीम सर्वेक्षण की रिपोर्ट में दावा किया है कि गोल्डन ट्रायंगल क्षेत्र में, अफीम की खेती लगातार साल 2022 से बढ़ रही है। खास तौर पर अफीम की ज्यादातर वृद्धि म्यांमार में पाई गई है। 12 दिसंबर को जारी की गई इस रिपोर्ट में म्यांमार में, सैन्य तख्तापलट के बाद उपजी दूसरी फसल के समय एकत्र आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है, जो 40 हज़ार 100 से 47 हज़ार 100 हेक्टेयर यानि 18% की वृद्धि दर्शाते हैं।

साल 2001 के बाद म्यांमार में 1,080 मीट्रिक टन की सम्भावित अफ़ीम उपज अपने उच्त्तम स्तर पर है। संयुक्त राष्ट्र समाचार मुताबिक जेरेमी डगलस का कहना है, “फ़रवरी 2021 में सेना द्वारा सत्ता पलटने के बाद, आर्थिक, सुरक्षा एवं शासन सम्बन्धी व्यवधानों की वजह से किसानों को दूर दराज तक के इलाकों में आजीविका के लिए अफीम की खेती का सहारा लेना पड़ रहा है । शान प्रदेश और सीमावर्ती क्षेत्रों में संघर्ष की तीव्रता से इस अफीम की खेती में वृद्धि देखी गई है। शान राज्य में अफ़ीम खेती में 20 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसके बाद चिन और काचिन में 10 फीसदी और 6 फीसदी की वृद्धि हुई है । इसके अतिरिक्त भारत के साथ लगी म्यांमार की सीमा पर सागांग में, पर्याप्त मात्रा में अफीम की खेती के संकेत मिले हैं।

 

अफीम की खेती का प्रभाव

 

अफीम की खेती का विस्तार, मेकांग में बढ़ती अवैध अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे रहा है, जो निरन्तर उच्च स्तर के सिंथेटिक ड्रग उत्पादन और ड्रग तस्करी, मनी लॉन्ड्रिंग व जुआघरों एवं घोटाला संचालन जैसी ऑनलाइन आपराधिक गतिविधियों को आपस में जोड़ता है ,और इन सभी गतिविधियों से क्षेत्र में संगठित अपराध समूहों को लाभ मिलता है । म्यांमार में गृह युद्ध के चलते अपराध और शासन सम्बन्धी चुनौतियां और बढ़ गई हैं। दक्षिण पूर्व एशिया को पारम्परिक और उभरते, दोनों प्रकार के ख़तरों का समाधान खोजने के लिए एकजुट होने की ज़रूरत महसूस की जा रही है।

 

पडोशी देश में अफीम उत्पादन और भी बढ़ सकता है। “यूएनओडीसी’ के उप क्षेत्रीय प्रतिनिधि बैनेडिक्ट हॉफ़मैन का कहना है कि “मौजूदा स्थिति में, कृषक समुदाय असुरक्षा और आर्थिक कठिनाइयों के बीच जद्दोजहद कर रहे हैं। क़ानून के शासन के अभाव में अगर कोई विकल्प नहीं है, तो और भी अधिक लोग अफीम को एक व्यवहार्य फसल के रूप में देखने लगेंगे, परिणामस्वरूप म्यांमार और लाओस में इन समुदायों के बीच हमारा काम पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

 

अफीम उत्पादन में गिरावट

 

अफीम की उपज के मामले में म्यांमार ने अफगानिस्तान को भी पीछे छोड़ दिया है। दरअसल अफगानिस्तान अफीम उत्पादन के मामले में सबसे बड़ा देश माना जाता था। लेकिन अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद से अफीम उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है,जिसका दावा खुद संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपनी एक रिपोर्ट में किया है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद से अफीम उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है। अफगानिस्तान अब तक दुनिया में अफीम का सबसे बड़ा उत्पादक रहा है और यूरोप व एशिया में हेरोइन का सबसे बड़ा स्रोत भी रहा है । तालिबान शासन ने देश से नशीले पदार्थों का कारोबार खत्म करने का वादा किया था, जिसके चलते अप्रैल 2022 में तालिबान द्वारा अफीम की खेती पर रोक लगा दी गई। यूनाइटेड नेशन्स ऑफिस ऑन ड्रग्स एंड क्राइम (यूएनओडीसी) रिपोर्ट में यह पाया गया है कि पिछले साल अफीम की खेती में करीब 95 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है। 2022 के अंत में 2,33,000 हेक्टेयर क्षेत्र पर अफीम उगाई जा रही थी लेकिन 2023 के अंतिम महीनों तक आते-आते यह 10,800 हेक्टेयर पर सिमट चुकी थी। डी डब्लू की एक रिपोर्ट अनुसार अफगानिस्तान में अफीम की खेती में गिरावट आने से वहां मानवीय संकट भी गहराता जा रहा है।

 

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